रायबरेली जेल में नहीं चलता कोई नियम-कानून! बंदी की मौत के बाद आए दिन हो रहे नए-नए खुलासे

  • पचासा होने के बाद समय पर नहीं लौटती बंदियों की कमान
  • बैरेक के बजाए दीवानी की ओर जाता दिखा था बंदी

राकेश यादव

लखनऊ। राजधानी से सटी रायबरेली जेल नियमों को ताक पर रखकर संचालित हो रही है। इस जेल में अधिकारियों का न तो सुरक्षाकर्मियों पर कोई नियंत्रण है और न ही बंदियों पर कोई नियंत्रण है। इस सच का खुलासा जेल में एक विचाराधीन बंदी की आत्महत्या के बाद हुआ है। जेल प्रशासन के अधिकारी खामियों को छिपाने के लिए बंदियों के बयान इत्यादि को बदलकर मामले की लीपापोती करने में जुटे हुए हैं। बीते सप्ताह रायबरेली जिला जेल में चक्की कमान में काम करने वाले विचाराधीन बंदी वारिस ने अस्पताल और महिला बैरेक के बीच बनी दीवानी के सामने लगे पेड़ पर लटककर आत्महत्या कर ली थी। मौत से पहले वारिस और कैंटीन कमान के बंदी से किसी बात को लेकर नोंकझोंक हुई थी। इसी के कुछ समय बाद ही बंदी वारिस ने फांसी लगाकर जान दे दी थी।

सूत्रों का कहना है कि जेल में प्रतिदिन काम (श्रम) करने के लिए बंदियों की कमान निकाली जाती है। जेल कार्यालय, गल्ला गोदाम,  कैंटीन, चक्की समेत अन्य कमान निकाली जाती हैं। जेल में बंदियों की कुशलता और गिनती के लिए प्रतिदिन पचासा (पचास बार घंटी बजाए जाने की) व्यवस्था है। पहला पचासा जेल खुलने पर सुबह साढ़े पांच बजे, दूसरा अदालत जाने के बाद सुबह 11 बजे, तीसरा दोपहर दो बजे और चौथा शाम साढ़े चार बजे लगता है। नियमानुसार शाम साढ़े चार बजे लगने वाले चौथा पचासा के बाद कमान में कार्य करने गए बंदियों के साथ समस्त बंदियों के बैरेक में पहुंच जाने का नियम है। इस नियम का जेल में कोई अनुपालन नहीं कराया जा रहा है।

आखिर जेल में हो रही बंदियों की मौत का जिम्मेदार कौन!

सूत्रों का कहना है कि नियमों को दर किनार कर बंदी चौथे पचास के बाद बैरेक में जाने के बजाए इधर उधर टहलते नजर आते है।  कैंटीन की बिक्री को बढ़ाने के लिए जेल अधिकारी बैरेक बंद होने तक कैंटीन को खोले रहते हैं। इस जेल में कैंटीन और बैरेक एक साथ बंद होती है। सूत्रों की मानें तो घटना के दिन आत्महत्या करने वाले बंदी वारिस को शाम करीब साढ़े पांच से पौने छह बजे के बीच अस्पताल और महिला बैरेक के बीच बनी दीवानी की ओर जाते भी देखा गया था। इसके कुछ देर बाद शाम करीब साढ़े सात बजे बंदी को पेड़ पर लटके हुए देखा गया था। हकीकत यह है कि कमाई की खातिर जेल अधिकारी नियमों को ताक पर रखकर जेल को चला रहे हैं। इस संबंध में जब लखनऊ परिक्षेत्र के डीआईजी रामधनी से बात करने का प्रयास किया गया तो उन्होंने फोन ही नहीं उठाया।

दोषियों को दंडित करने के बजाए बचा रहे आला अफसर!

कारागार विभाग के आला अफसर घटनाएं होने के बाद दोषी अधिकारियों को दंडित करने के बजाए बचा रहे है। यही वजह है कि अधिकारी बेलगाम हो गए हैं। इन अधिकारियों में कार्यवाही का भय ही खत्म हो गया है। झांसी और मैनपुरी जेल में दो दो बंदियों की मौत, प्रयागराज जिला जेल में गलत रिहाई और एक बंदी की मौत, वाराणसी जिला जेल में एक बंदी की मौत, राजधानी की जिला जेल में एक बंदी की मौत, मऊ, महोबा, इटावा समेत अन्य कई जेलों में सनसनीखेज घटनाएं होने के बाद शासन और मुख्यालय ने किसी भी दोषी अधिकारी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गई। रायबरेली जेल में भी आत्महत्या की घटना के बाद भी जेलर, डिप्टी जेलर को बचाया जा रहा है।

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बयान बदलने के लिए बनाया जा रहा दबाव

बंदी के आत्महत्या मामले में निलंबित हुए वार्डर पर दिए गए बयान को बदलने का दबाव बनाया जा रहा है। सूत्र बताते है चक्की कमान में काम करने वाले बंदी वारिस को कमान की सुरक्षा में लगे वार्डर ने पचासा के बाद बंदी को सर्किल प्रभारी अधिकारी के सुपुर्द कर दिया था। यही बात जब बयान में लिखी तो अधिकारियों बयान बदलने का दबाव बनाया। वार्डर का कहना था कि  सुपुर्दगी के बाद सुरक्षा की जिम्मेदारी प्रभारी अधिकारियों की होती है। सूत्रों की माने तो मृतक बंदी जेल के अंदर पान मसाला, बीडी, सिगरेट, तंबाकू समेत अन्य नशीले पदार्थों की बिक्री करता था। अधिकारियों ने मौत के बाद पेड़ के नीचे मिले बोरे का सामान तक बदल दिया था।

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