दशामाता व्रत आज: परिवार की सुख-समृद्धि के लिए सुहागिन महिलाओं का विशेष व्रत

राजेन्द्र गुप्ता

नवरात्रि से पांच दिन पहले दशा माता की पूजा की जाती है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने परिवार की सुख समृद्धि के लिए रखती हैं। हर साल दशा माता का व्रत चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को रखा जाता है। इस साल दशा माता व्रत 13 मार्च को रखा जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन महिलाएं डोरे से पीपल के पेड़ की पूजा करती है। ऐसा माना जाता है कि इस व्रत को करने से घर की दशा सुधरती है और दरिद्रता दूर होती है।

दशा माता व्रत 2026 कब है ?

पंडित राकेश झा ने बताया कि पंचांग की गणना के अनुसार, 13 मार्च को दशमी तिथि का आरंभ सुबह में 6 बजकर 30 मिनट पर आरंभ होगा और 14 मार्च को सुबह में 8 बजकर 11 मिनट पर समाप्त हो जाएगी। उदय तिथि के अनुसार, दशा माता का व्रत 13 मार्च को ही करना शास्त्र सम्मत सामान जाएगा। मान्यता है कि जब भी कोई तिथि सूर्योदय के दौरान लगती है। तभी वह मान्य होती है।

दशा माता व्रत में डोरे का महत्व

डोरा माता के व्रत में महिलाएं एक रेशमी डोरे लेकर उसमें 10 धागों को जोड़कर एक बनाती हैं और उसमें 10 गांठ लगाई जाती हैं। इसके बाद उस डोरे को माता के सामने रखकर उनसे आशीर्वाद लेकर पूजा करने के बाद उसे महिलाएं पहन लेती हैं। माता की पूजा के लिए एक दिन पहले ही उनकी प्रतिमा बनाई जाती है। इसके बाद पूजा करने के बाद उनकी प्रतिमा को विसर्जित कर दिया जाता है।

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दशा माता व्रत में डोरे से जुड़े नियम

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता की पूजा के बाद इस डोरे को कम से कम एक साल तक पहनना चाहिए। इसके बाद वैशाख मास में किसी शुभ तिथि पर इस डोरे को खोल दिया जाता है। ऐसी मान्यता है यह धागा आपकी जिंदगी में सुख समृद्धि लेकर आता है। साथ ही रिश्तों में खुशहाली बनी रहती है और घर में धन संपत्ति बनी रहती है। दशा माता व्रत में अन्न ग्रहण नहीं किया जाता है इसमें मीठा खाया जाता है। एक समय गेहूं का सेवन आप चाहे तो कर सकते हैं। इस व्रत की पूजा पीपल के पेड़ के पास की जाती है। सभी महिलाएं एक साथ बैठकर दशा माता व्रत कथा का पाठ करती हैं।

मुख्य विधि-विधान

  • प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल को शुद्ध करें।
  • चौकी पर वस्त्र बिछाकर कलश स्थापित करें और दशामाता का आवाहन करें।
  • रोली, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें।
  • स्थानीय परंपरा अनुसार डोरा-विधि करें और व्रत कथा सुनें या पढ़ें।
  • दिनभर सात्त्विक आचरण रखें और क्रोध, कटु वचन व विवाद से बचें।
  • अंत में आरती कर प्रसाद वितरित करें और परिवार की सुरक्षा व समृद्धि के लिए प्रार्थना करें।

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