फूलपुर लोकसभाः 2014 में पहली बार खिला कमल, क्या भाजपा को फिर मिलेगी जीत

राजेश श्रीवास्तव

उत्तर प्रदेश में सभी दल अपने-अपने स्तर पर लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करने को लेकर समीकरण बनाने में लगे हुए हैं। प्रदेश का प्रयागराज जिला चुनाव के लिहाज से बेहद अहम माना जाता है। यहां की फूलपुर संसदीय सीट हाई प्रोफाइल सीटों में गिनी जाती है। इस सीट पर देश से पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू भी कई बार सांसद चुने गए। देश के एक अन्य पीएम विश्वनाथ प्रताप सिह भी यहां से सांसद चुने गए। यहीं से गैंगस्टर अतीक अहमद भी सांसद बना था। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के केशव प्रसाद मौर्य भी सांसद बने। अभी इस सीट पर बीजेपी का कब्जा है। लेकिन इस बार यहां पर कड़े मुकाबले के आसार हैं।

प्रदेश के बड़े जिलों में एक प्रयागराज शहर गंगा, यमुना और गुप्त सरस्वती नदियों के संगम पर बसा हुआ है। संगम स्थल को त्रिवेणी भी कहा जाता है और यह क्षेत्र हिदुओं के लिए पवित्र स्थल है। माना जाता है कि प्रयाग (अभी प्रयागराज) में आर्यों की प्रारंभिक बस्तियां स्थापित हुई थी। यह क्षेत्र महान ऋषि भारद्बाज, ऋषि दुर्वासा और ऋषि पन्ना की ज्ञानस्थली हुआ करता था। फूलपुर सीट से पंडित जवाहर लाल नेहरू तीन बार सांसद चुने गए थे और वह 1964 में निधन तक इस सीट से सांसद रहे। यह सीट एक समय में ‘नेहरू सीट’ के नाम से जानी जाती थी.

2019 के चुनाव परिणाम

फूलपुर संसदीय सीट के तहत पांच विधानभा सीटें आती हैं- जिसमें फाफामऊ, सोरांव, फूलपुर, प्रयागराज पश्चिम और प्रयागराज उत्तर सीट शामिल है। साल 2०22 के विधानसभा चुनाव में फूलपुर संसदीय सीट के तहत आने वाली पांच विधानसभा सीटों में से चार पर BJP को जीत मिली थी तो एक सीट समाजवादी पार्टी (SP) के खाते में आई थी। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में फूलपुर संसदीय सीट के चुनावी परिणाम को देखें तो यहां पर BJP और SP के बीच मुख्य मुकाबला था। बीजेपी की केशरी देवी पटेल को चुनाव में 544,701 वोट मिले तो सपा के पंधारी यादव के खाते में 372,733 वोट आए थे। केशरी देवी को चुनाव में 171,968 मतों के अंतर से जीत मिली।
तब फूलपुर सीट पर कुल 19,50,247 वोटर्स थे, जिसमें पुरुष वोटर्स की संख्या 1०,72,283 थी तो महिला वोटर्स की संख्या 8,77,763 थी. इसमें से कुल 9,78,236 (5०.6%) वोटर्स ने वोट डाले थे। नोटा के पक्ष में 7,882 वोट डाले गए।

फूलपुर सीट का संसदीय इतिहास

प्रदेश के हाई प्रोफाइल सीटों में गिने जाने वाले फूलपुर सीट के राजनीतिक इतिहास को देखें तो यहां के चुनाव पर हमेशा लोगों की नजर रही है। पंडित जवाहर लाल नेहरू के अलावा विजयलक्ष्मी पंडित, जनेश्वर मिश्रा, कमला बहुगुणा और केशव प्रसाद मौर्य भी यहां से सांसद चुने गए थे। इनके अलावा यहां से अतीक अहमद जैसे गैंगस्टर भी चुनाव जीत चुके हैं। डॉ. राम मनोहर लोहिया भी यहां से चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन तब उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।

पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने 1952 के लोकसभा चुनाव में फूलपुर सीट से किस्मत आजमाई थी। तब यहां से दो लोग सांसद चुने गए थे। हालांकि 1957 के चुनाव में तब की इलाहाबाद पूर्व और जौनपुर पश्चिम लोकसभा सीट को मिलाकर सीट का नाम फूलपुर कर दिया गया। 1957 में भी नेहरू को यहां से जीत मिली। 1962 में नेहरू के सामने दिग्गज समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया थे, लेकिन कोई उलटफ़ेर नहीं हो सका और नेहरू चुनाव जीत गए। हालांकि मई 1964 को नेहरू के निधन के बाद 1964 के उपचुनाव में नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित कांग्रेस के टिकट पर सांसद चुनी गईं। पंडित ने सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी जनेश्वर मिश्र को हराया था। साल 1967 के चुनाव में भी यही मुकाबला हुआ और विजयलक्ष्मी पंडित ने जनेश्वर मिश्र को फिर से हरा दिया।

वर्ष 1969 में विजयलक्ष्मी संयुक्त राष्ट्र में भारत की प्रतिनिधि के रूप में चली गईं। इस वजह से यह सीट खाली हो गई और उपचुनाव में जनेश्वर मिश्रा ने कांग्रेस के केशवदेव मालवीय को हराते हुए जीत हासिल की। 1971 के चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर विश्वनाथ प्रताप सिह चुनाव मैदान में उतरे और जीत हासिल की। इस बीच इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगा दी, और इससे फैली निराशा के दौर में 1977 में जब चुनाव कराए गए तो कांग्रेस को हार मिली और लोकदल की कमला बहुगुणा चुनाव जीत गईं। साल 198० में जनता पार्टी के बीडी सिह विजयी हुए। वर्ष 1984 के चुनाव में कांग्रेस के राम पूजन पटेल को जीत मिली।

बाद में राम पूजन पटेल कांग्रेस छोड़कर जनता दल में चले आए और 1989 तथा 1991 के चुनाव में भी वह विजयी रहे। 1996 के चुनाव में सपा का यहां से खाता खुला और जंग बहादुर पटेल चुनाव जीत गए। वह 1998 में भी सांसद बने। सपा की यहां पर पकड़ आगे भी जारी रही और 1999 में धर्मराज सिह पटेल तो 2००4 में गैंगस्टर अतीक अहमद सांसद बने थे। बीजेपी के लिए यह सीट हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा क्योंकि अब तक उसका खाता तक नहीं खुल सका था। साल 2009 में बसपा के कपिल मुनि करवरिया सांसद चुने गए थे।

जातीय समीकरण

फूलपुर लोकसभा क्षेत्र के जातीय समीकरण को देखें तो यहां कुल मतदाताओं की संख्या 2०.47 लाख से अधिक है। इनमें सबसे अधिक तीन लाख से ज्यादा कुर्मी मतदाता हैं। यादव मतदाताओं की संख्या भी दो लाख से अधिक है। वहीं, पिछड़ी जाति के अन्य मतदाताओं की संख्या तीन लाख से अधिक है। करीब ढाई लाख मुस्लिम व ढाई लाख से अधिक अनुसूचित जाति के मतदाता भी हैं। अगड़ी जातियों में ब्राह्मण वोटरों की संख्या करीब दो लाख है। शहर की दोनों विधानसभा क्षेत्रों शहर उत्तरी एवं पश्चिमी में कायस्थ मतदाताओं की संख्या भी दो लाख से अधिक है।

साल 2०14 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर में फूलपुर जैसी मुश्किल सीट पर बीजेपी को आखिरकार जीत मिल गई. बीजेपी के प्रत्याशी केशव प्रसाद मौर्य ने सपा के धर्मराज सिह को 3,०8,3०8 मतों के अंतर से हरा दिया. कांग्रेस की ओर से मैदान में उतरे मोहम्मद कैफ चौथे स्थान पर रहे थे. लेकिन 2०17 में प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनने के बाद मौर्य को डिप्टी सीएम बनाया गया और इस कारण उन्हें लोकसभा से इस्तीफा देना पड़ा. मौर्य के इस्तीफ़े से खाली हुई इस सीट पर उपचुनाव में बीजेपी को हार मिली. सपा के नागेंद्र पटेल को जीत मिली और संसद पहुंच गए। उपचुनाव में बसपा-सपा और कांग्रेस ने आपसी गठबंधन किया था।

हाई प्रोफाइल सीटों में गिनी जानी फूलपुर सीट पर जातिगत समीकरण को देखें तो यहां पर पटेल यानी कुर्मी वोटर्स की भूमिका अहम रही है. यहां पर पटेल बिरादरी के वोटर्स कई बार चुनाव जीत चुके हैं. अब इस बार यहां पर कड़ा चुनाव होने वाला है. चुनाव से पहले यूपी में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच गठबंधन हो चुका है, ऐसे में बीजेपी के लिए इस बार राह चुनौतीपूर्ण हो सकती है। चुनाव की तारीख नजदीक आने के साथ ही राजनीतिक दल भी पत्ते खोलने लगे हैं। इसी के साथ जीत-हार के समीकरण भी बनने लगे हैं। फूलपुर में निर्णायक भूमिका निभाने वाले पिछड़ों पर सभी दलों की नजर है। इस सीट पर पिछड़ों में भी चुनाव को कुर्मी बनाम अदर बैकवर्ड बनाने की जोड़तोड़ शुरू हो गई है।

11 बार पिछड़ी जाति के लोग दर्ज कर चुके हैं जीत

फूलपुर सीट पर पिछड़ों की निर्णायक भूमिका रहती है। इनमें भी कुर्मी मतदाताओं की बड़ी भूमिका होती है। इसका अनुमान इससे भी लगाया जा सकता है कि 1977 में कमला बहुगुणा जीती थीं। इसके बाद 12 चुनाव हुए और 11 बार पिछड़ी जाति के उम्मीदवार विजयी रहे। अगड़ी जाति से कपिल मुनि करवरिया की ही जीत हुई है। इनके अलावा 2००4 में अतीक अहमद की जीत हुई थी तो 2०14 में केशव प्रसाद मौर्य जीते थे।

गौर करने वाली बात यह है कि शेष नौ चुनावों में भी कुर्मी उम्मीदवार ही संसद पहुंचने में सफल रहे।इस जातीय समीकरण को देखते हुए भाजपा ने प्रवीण पटेल को उम्मीदवार बनाया है। वहीं, सपा ने यादव व मुस्लिम मतदाताओं के साथ अन्य पिछड़ी जातियों के ध्रुवीकरण को ध्यान में रखते हुए अमर नाथ मौर्य को प्रत्याशी बनाया है। सपा के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार पार्टी की पूरी कोशिश चुनाव को कुर्मी बनाम अदर बैकवर्ड बनाने की भी है।

हालांकि, डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के मजबूत दखल वाली इस सीट पर सपा की रणनीति कितनी सफल होगी यह तो चुनाव के नतीजे ही बताएंगे। बसपा की भी एक लाख से अधिक जाटव व मुस्लिम मतदाताओं के साथ अदर बैकवर्ड मतदाताओं पर नजर है। इस समीकरण को ध्यान में रख पार्टी ने जगन्नाथ पाल को उम्मीदवार बनाया है।

फूलपुर के सियासत की कहानी, मतदाताओं की जुबानी

नेहरू-गांधी परिवार के पैतृक निवास आनंद भवन से महज 5० कदम की दूरी पर महर्षि भारद्बाज आश्रम को कॉरिडोर का रूप दिया जा रहा है। इससे इलाके में पर्यटन तो बढ़ेगा, लेकिन तीन दर्जन से अधिक मकान इसकी जद में आने के कारण टूटे हैं। इससे लोगों में नाराजगी भी है और खुशी भी। नाराज वे हैं, जिनके मकान टूटे और खुश वे जो इस आश्रम के आसपास व्यवसाय करते हैं। उन्हें आस है कि आने वाले समय में उनका व्यवसाय फले-फूलेगा। आनंद भवन के पास एक चाय की दुकान पर कुछ स्थानीय लोग राजनीतिक मुद्दों को लेकर चर्चा में व्यस्त थे। कटरा के रहने वाले पीयूष जायसवाल भी इनमें से एक हैं। जब पीयूष से फूलपुर सीट के माहौल को लेकर बात शुरू की तो छूटते ही बोले, ‘बाकी सब तो ठीक है लेकिन रोजगार की हालत अच्छी नहीं है। कोरोना के बाद से ही व्यवसाय संभल नहीं पाया। हम गाड़ियों के कारोबार से जुड़े थे, लेकिन अब धंधा मंदा है। सरकार को इस पर कुछ सोचना चाहिए। बात वोट देने की है, तो देश को देखते हुए मतदान करेंगे।’

पास बैठे अधिवक्ता विनय तिवारी इस बीच बोल उठे, ‘प्रत्याशी तो कोई खास नहीं हैं, चाहे बीजेपी हो, सपा या बसपा। लेकिन गुंडागर्दी से तो कुछ राहत मिली ही है। फिर भी बेरोजगारी बड़ी समस्या है। सरकारी नौकरियां कम होती जा रही हैं।’ अंदावा के रहने वाले राम लखन पटेल इसी दौरान चाय की दुकान पर पहुंचे। जब उनसे स्थानीय मुद्दों पर चर्चा शुरू हुई, तो कहने लगे ‘ठीक ही है, गरीबों को राशन मिल रहा है लेकिन महंगाई कुछ कम होनी चाहिए। समस्या रोजगार की भी है। जहां तक मतदान की बात है, अभी समय है। प्रवीण पटेल ने भी अच्छा काम किया है, लेकिन बीजेपी और समाजवादी पार्टी में कांटे की टक्कर है।’

ग्रामीण क्षेत्र में मतदाताओं की नब्ज टटोलने के लिए हम फाफामऊ पहुंचे। गर्मी के कारण बाजार में भीड़भाड़ नहीं थी। एक बीज भंडार पर कुछ लोग बैठे दिखे। वहां जाकर पानी पिया और और थोड़ी देर में चर्चा शुरू हो गई चुनाव की। जानना चाहा कि मतदाता इस बार किसे संसद पहुंचाएंगे। सबसे पहले रमेश पांडेय अपनी बात रखते हुए बोले, ‘जीतेगी तो बीजेपी ही, भले जीत का अंतर कम हो। क्षेत्र के लिए काफी काम किया है।’ तभी राम लखन मौर्य बोल उठे, ‘2०22 के चुनाव में डिप्टी सीएम केशव मौर्य की हार के पीछे पटेल बिरादरी थी। इस बार हम भी देखेंगे कि उनका उम्मीदवार कैसे जीतता है।’ इसी बीच गद्दोपुर के नसीम दुकान पर पहुंच गए। नसीम का ट्रांसपोर्ट का व्यवसाय है। चर्चा में वह सीधे तो शामिल नहीं हुए लेकिन कहा कि 1० साल हो गए। अब दूसरे को भी मौका देना चाहिए। शायद उनका इशारा कांग्रेस गठबंधन की ओर था। इस क्षेत्र के लोगों की मानें तो यहां लड़ाई सपा और बीजेपी के बीच है। बीजेपी जहां विकास की बात कह रही है, वहीं सपा जनसमस्याओं और विरोध के सहारे जीत की ओर ताक रही है।

फूलपुर सीट के अंतर्गत आने वाले सलोरी इलाके में काफी प्रतियोगी छात्र रहते हैं। इनमें स्थानीय लोगों के साथ पूरे प्रदेश से आकर तैयारी करने वाले छात्र भी हैं। यहीं हॉस्टल चलने वाले सुरेंद्र पाल से जब हमने चुनाव पर चर्चा शुरू की तो कहने लगे, ‘लगातार पेपर लीक हो रहे हैं। कितनी मुश्किल से बच्चे एक-एक पाई जुटाकर परीक्षाओं के फॉर्म भरते हैं। पेपर लीक होने पर पैसे तो बर्बाद होते ही हैं जीवन का कीमती समय भी बर्बाद होता है।’ नाश्ते की दुकान चलाने वाले रामलखन कहते हैं कि जब भी पेपर लीक होता है, तो बच्चों का दुख देखकर कष्ट होता है। यही हाल रहा तो कैसे रोजगार मिलेगा। हमारा रोजगार भी बच्चों से ही है।

फूलपुर लोकसभा क्षेत्र में सबसे अधिक करीब तीन लाख कुर्मी मतदाता हैं। यादव मतदाताओं की संख्या दो लाख से अधिक है। वहीं, पिछड़ी जाति के अन्य मतदाताओं की संख्या भी करीब तीन लाख है। करीब ढाई लाख मुस्लिम और ढाई लाख से अधिक अनुसूचित जाति के मतदाता भी हैं। अन्य में ब्राह्मण वोटरों की संख्या करीब दो लाख है। शहर के दोनों विधानसभा क्षेत्र शहर उत्तरी और पश्चिमी में कायस्थ मतदाताओं की संख्या भी दो लाख से अधिक है।

फूलपुर सीट पर पिछड़ों की निर्णायक भूमिका रहती है। इनमें भी कुर्मी मतदाताओं की बड़ी भूमिका होती है। इस जातीय समीकरण को देखते हुए भाजपा ने प्रवीण पटेल को उम्मीदवार बनाया है। प्रवीण फिलहाल फूलपुर विधानसभा सीट से विधायक हैं। उनके पिता महेंद्र प्रताप भी 1984, 1989 और 91 में इसी लोकसभा क्षेत्र की झूंसी (अब फूलपुर विस सीट) विधानसभा सीट से विधायक रह चुके हैं। वहीं, सपा ने यादव और मुस्लिम मतदाताओं के साथ अन्य पिछड़ी जातियों के ध्रुवीकरण को ध्यान में रखते हुए अमर नाथ मौर्य को प्रत्याशी बनाया है। बसपा ने जगन्नाथ पाल और अपना दल (कमेरावादी) ने महिमा पटेल को प्रत्याशी बनाया है।

देश को पहला प्रधानमंत्री देने वाली फूलपुर लोक सभा सीट पर भाजपा, सपा गठबंधन और बसपा तीनों ने ऐसे चेहरों को मौका दिया है, जो पहली बार लोकसभा के रण में हैं। जानकार बताते हैं कि तीनों ही पुराने बसपाई हैं। प्रवीण पटेल 2०17 में बसपा छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए थे। अमरनाथ मौर्य भी बसपा से सपा में आए थे। 2००2 में वह शहर पश्चिम से बसपा के टिकट पर विधानसभा चुनाव भी लड़ चुके हैं। वहीं जगन्नाथ पाल पुराने बसपाई हैं और वह बसपा के संस्थापक कांशीराम के चुनाव एजेंट के रूप में भी काम कर चुके हैं।

दो बार मिला टिकट, दोनों बार छिन गया, गजब है फूलपुर के अमरनाथ मौर्य की सियासी कहानी

लोकसभा चुनावों का शंखनाद हो चुका है. सभी पार्टियों ने अपने-अपने प्रत्याशियों की घोषणा कर दी है और साथ ही लगभग सभी प्रत्याशी अपने क्षेत्रों में जनता के बीच जा रहे हैं और लोगों का विश्वास मत हासिल करने की कोशिश भी कर रहे हैं. लेकिन इसी बीच एक प्रत्याशी ऐसे भी हैं जिनको अबतक ये नहीं पता की आखिरकार उनको इस चुनाव को लड़ने का मौका दिया भी जाएगा या नहीं।

समाजवादी पार्टी ने 14 अप्रैल को लोकसभा चुनाव के लिए अपने जिन प्रत्याशियों की सूची जारी की उसमें प्रयागराज जिले की फूलपुर लोकसभा के लिए अमरनाथ मौर्य का भी नाम शामिल है. फूलपुर सीट कुर्मी बिरादरी बाहुल्य सीट है यही वजह है कि यहां अब तक इस बिरादरी से ताल्लुक रखने वाले सात प्रत्याशी निर्वाचित हुए हैं. भाजपा ने भी यहां पटेल बिरादरी से प्रवीण पटेल को मैदान में उतारा है. सपा भी इस सीट पर पटेल प्रत्याशी पर ही दांव लगाती आ रही है लेकिन अखिलेश यादव ने सबको चौंकाते हुए इस बार अमरनाथ मौर्य को टिकट दे दिया।

अमरनाथ मौर्य समाजवादी पार्टी के प्रदेश सचिव हैं और अपने सियासी सफर में उन्होंने सभी सियासी दलों से ताल्लुक रखा है. जनता दल, बसपा, भाजपा और सपा सब जगह वह जोर आजमाइश कर चुके हैं. लेकिन गजब विडंबना उनके साथ रही है. दो बार उन्हें टिकट दिया गया और दोनों बार नामांकन करने से पहले वापस ले लिया गया. प्रयागराज के प्रीतम नगर में 1969 में जन्मे अमरनाथ मौर्य के सियासी सफर की शुरुआत जनता दल में जिला संगठन मंत्री के रूप में हुई थी. लेकिन साल 1995 में बहुजन समाज पार्टी में शामिल हो गए.

साल 2००4 में बहुजन समाज पार्टी द्बारा ने उन्हें इलाहाबाद पश्चिम विधानसभा का प्रत्याशी बनाया, लेकिन उनका टिकट कट गया. अमरनाथ मौर्य जनवरी 2०22 को समाजवादी पार्टी में शामिल हुए. 2०22 के विधानसभा चुनाव में प्रयागराज के इलाहाबाद पश्चिम विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी ने उन्हें प्रत्याशी बनाया गया लेकिन फिर समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने उनका पत्ता काट दिया और उनका टिकट ऋचा सिह को थमा दिया जो खुद भी चुनाव हार गईं. भाजपा के सिद्धार्थनाथ सिह ने उन्हें 29 हजार मतों से हरा दिया।

वर्ष 2००2 में जनपद इलाहाबाद के इलाहाबाद पश्चिम (शहर-पश्चिमी) विधानसभा सीट से अपना दल प्रत्याशी बाहुबली अतीक अहमद के खिलाफ अमरनाथ मौर्य ने बहुजन समाज पार्टी से चुनाव लड़ा जिसमें उन्हें मात्र 24,००० वोट मिले थे. अतीक अहमद ने यह चुनाव जीता था. अतीक ने इस चुनाव में समाजवादी पार्टी के गोपाल दास यादव को 11 हजार 8०8 मतों से हराया था. बसपा से यह चुनाव लड़ने वाले अमरनाथ मौर्य बहुत पीछे रह गए थे. अमरनाथ मौर्य सपा प्रमुख अखिलेश यादव की तरह ही प्रयोग धर्मी रहे हैं. जनता दल, सपा ,बसपा सबको अमरनाथ ने आजमाया. 17 जुलाई 2०16 को लोकतांत्रिक बहुजन मंच का गठन किया गया और मौर्य को इलाहाबाद मंडल का प्रभारी बनाया गया. 2०16 में अमरनाथ भाजपा प्रदेश कार्यालय में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। माना जाता है की अमरनाथ केशव प्रसाद मौर्य के करीबी थे लेकिन मौका मिला तो स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ कमल का साथ छोड़कर साइकिल की सवारी करने लगे।

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