मोबाइल फोन का मायाजाल

कौन फंसा है हम, आप या नन्हा बचपन?


बच्चे अपराधी नहीं होते। उनके हाथ में इतना ‘स्टुपिड’ आइटम आ गया है कि वो उम्र से कई गुना आगे की बातें जान लेते हैं। ऊपर से ‘बोलने से सब होता है’ गूगल की यह बातें बच्चों ने दिल में बसा लिया और बोल-बोलकर वो सब देख डाला, जिससे उनके कदम कई जगह डगमगा गए तो कई बच्चे बहुत आगे निकल गए। अधिकतर माता-पिता अपना समय बचाने के लिए बच्चों को ‘कार्टून’ प्रेम में ऐसा फाँसा कि वह आकंठ डूब गए। बच्चे और युवा इस सूचना तकनीक के प्रभाव से इस कदर प्रभावित हैं कि एक पल भी वे स्मार्ट फोन से खुद को अलग रखना गंवारा नहीं समझते। इनमें हर समय एक तरह का नशा सवार रहता है। वैज्ञानिक भाषा में इसे ‘इंटरनेट एडिक्शन डिस्ऑर्डर’ कहा जाता है।


आशीन दुबे


आज कल के इंटरनेट लविंग बच्चों का बचपन रचनात्मक कार्यों की जगह डेटा के जंगल में गुम हो रहा है। वो बाहर खेलने नहीं जाते बल्कि घरों में मोबाइल, लैपटॉप और टैब के ज़रिए गेम खेलने में व्यस्त रहते हैं। आज देश भर में बच्चे या तो साइबर अपराधियों के शिकार होते हैं या खुद अपराधी होने की राह पर चल पड़ते हैं। मुझे हमेशा से लगता आया है कि हम अपने बच्चों में नैतिकता के संवर्धन को जीवन के सबसे बड़े निवेश, सबसे बड़े सृजन और सबसे बड़े खतरे के रूप में क्यों नही देखते? मुझे ये मालूम नही कि यह आलेख माता-पिता को सचेत और सतर्क करेंगे या नहीं, लेकिन एक भी घर में या एक भी बच्चे को सही दिशा मिल जाए तो मेरी मेहनत सार्थक साबित होगी।

पिछले दो साल के अखबारों में छपी ये खबरें शायद आप में से कुछ को बोरिंग लगें, क्योंकि इनमें कही भी फाइव स्टार कल्चर वाले लोग शामिल नहीं हैं। इनमें बॉलीवुड की मसाला खबरें नहीं हैं या किसी पॉलिटिकल पार्टी के धार्मिक पक्ष पर भडक़ाऊ कमेंट नहीं है। लोग अपने-अपने व्हाट्सऐप ग्रुप में पॉलिटिकल पार्टियों के पक्ष में लड़ते-झगड़ते हैं। खबरिया चैनलों पर आ रही न्यूज़ को सोफे पर बैठकर सुबह से शाम तक बार-बार देखते हैं। उन्हीं खबरों को दोहराते एंकरों को देखकर भी बोर नहीं होते। लेकिन एक समस्या जो उनके अपने घर के भीतर बड़ी होती जा रही है, वे उससे बेखबर हैं। क्या आप जानते हैं 10 साल के 40 फीसदी बच्चे सोशल मीडिया (इंस्टाग्राम, फेसबुक, स्नैपचैट, टेलीग्राम और वॉट्सऐप) पर ऐक्टिव है? क्या आप जानते है कि 50 फीसदी किशोरों को मोबाइल फोन की लत लग चुकी है? ये आधिकारिक आंकड़े हैं जबकि असल संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है। दरअसल कोरोना की वजह से पिछले दो साल से चल रही ऑनलाइन क्लासेज ने पैंरट्स को मजबूर कर दिया कि बच्चों के हाथ में स्मार्ट फोन देना ही पड़ा।

लेकिन आजकल माता-पिता यहां तक की दादा-दादी, नाना-नानी भी जब खुद घंटों तक मोबाइल पर मनोरंजक वीडियो देखते रहते हैं तो उन्हें बच्चे का मोबाइल में व्यस्त रहना सुविधाजनक लगने लगा है। हम खुद 24 घंटे मोबाइल में बेहद बिजी रहने के बाद बच्चों को उपदेश नहीं दे सकते। उनकी तो उम्र है टेक्नॉलजी की तरफ आकर्षण की। क्या खाया, कहां घूमे, यह सब अपडेट करने की या फिर अपने हम उम्र के आकर्षण में इनबॉक्स पर चैट करने की चाह। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज महज़ 12 साल तक के 80 फीसदी बच्चे कभी न कभी अडल्ट कंटेंट वीडियो देख चुके होते हैं और माता-पिता इस बात से बेखबर होते हैं कि कब उन्हीं की मोबाइल गैलरी खंगालते हुए बच्चे का कोमल मन असमय इस मानसिक मादकता की चपेट में आ गया।

बीते कुछ सालों में यौन अपराधों में 10 से 15 साल के लडक़ों का बढ़ता ग्राफ देखकर साइकॉलजिस्ट हैरत में हैं। आप में से कोई भी अपने किशोर बच्चे के टीचर से बात करके देखिए कि उनकी ऑनलाइन क्लास में जूम मीटिंग पर किसी दूसरी आईडी से बच्चे को एंट्री क्यों नही मिलती? आप सोचेंगे कि टीचर का यह जवाब होगा कि किसी दूसरे स्कूल का स्टूडेंट हमारे स्कूल की क्लास का फायदा न उठा ले। अगर आप ऐसा सोचते हैं तो आप गलत हैं। अगर हम क्लास सात से लेकर क्लास 10 के बीच के टीचर्स से बात करेंगे तो उनसे कुछ ऐसे जवाब मिलेंगे। किसी बच्चे ने अनजान आईडी से क्लास में अडल्ट कंटेंट का वीडियो चला दिया या अश्लील भाषा में क्लास में लगातार कमेंट या गालियां टाइप करने लगा और हमें फौरन उस आईडी को क्लास से बाहर करना पड़ा। ये अनजान आईडी कभी भी किसी आउटसाइडर अडल्ट की न होकर उसी क्लास के किसी बच्चे की होती है जो पाँच मिनट पहले जूम लिंक शेयर होते ही क्लास में एंट्री करता है।

यह चिंता की बात है कि कच्ची उम्र का ‘वर्चुअल मेंटल पल्यूशन’ अपने चरम पर है और कई पैरंट्स इससे बेखबर हैं। मोबाइल गेम की लत ने कितने ही बच्चों की मानसिक और शारीरिक सेहत को खराब कर रखा है। वे बच्चे जिन्हें इसकी लत लग चुकी है, वे लंच टाइम से लेकर डिनर तक टॉयलेट से लेकर सडक़ तक या फिर अपने बेडरूम में पूरी-पूरी रात जागकर गेम खेलते हैं। सोशल लाइन, क्रिएटिविटी और खेल के मैदान से दूर हुए बच्चों की इस बीमारी पर बात करने की किसी को फुर्सत नहीं जबकि अब वक्त आ चुका है कि इस पर खुली चर्चा पेरेंटिंग का हिस्सा होना चाहिए। हमारे देश को अच्छे नागरिक देना किसका कर्तव्य है? शिक्षकों, अभिभावकों, सरकार और मनोवैज्ञानिकों के सहयोग से इस उम्र के सभी बच्चों के लिए लगातार चलनेवाली साझा काउंसलिंग जरूरी है।

कई बार जब शिक्षक शिकायत करते हैं कि आप अपने बच्चे को किसी अच्छे साइक्रेटिस्ट से दिखवा लीजिए तो अभिभावक को लगता है कि उनके बच्चे को दिमागी रूप से अक्षम बताया जा रहा है। वह इस बारे में सोचने या कुछ करने की बजाय उलटे शिक्षक से ही लड़ जाते हैं। लेकिन ऐसा नहीं होता। कोई भी शिक्षक अपने छात्र को बीमार नहीं देख सकता और ये बीमारी केवल वो नजरें ही देख पाती हैं, जो बच्चों को गहनता से देखती हैं।

ऑनलाइन क्लास की जरूरत के बावजूद इनके साइड इफेक्ट भी हैं। बच्चे ‘बिहाइंड द स्क्रीन’ क्या कर रहे हैं, उस पर लगातार निगरानी जरूरी है। सिर्फ रोक ही एकमात्र उपाय नहीं है। अपनी लत पर रोक लगने की वजह से बच्चा माता-पिता से नफरत करने लगेगा। इसलिए बच्चे के साथ दोस्ती करके उसके साथ भी ‘क्वालिटी टाइम’ गुजारना होगा। घर से बाहर निकलकर खेलने जाने के लिए प्रेरित करना होगा। उसके साथ उसकी पसंदीदा फिल्में देखकर, यौन आकर्षण पर बेझिझक चर्चा करनी होगी। बच्चे को उसके शौक पर काम करने के लिए प्रेरित करना होगा। कच्ची उम्र की गलतियों के बुरे नतीजों का उदाहरण देकर ही हम अपना बच्चा सुरक्षित रख सकते हैं। यकीन मानिए वे अपराधी नहीं है। सिर्फ लापरवाह परवरिश से गलत राह की ओर बढ़ते राही हैं, जिन्हें प्यार भरे हाथों से थामा जा सकता है।

लोकसभा की तैयारी या मुस्लिम मतों के ‘आकाओं’ को चिढ़ाने की बारी…

डालें एक नजर इन खबरों पर…

  • महोबा निवासी देवतादीन के 14 साल के बेटे ने मोबाइल पर खेलने से मना करने पर छत से कूदकर खुदकुशी की।
  • मध्यप्रदेश में 12 साल के लडक़े कोमल ने पिता द्वारा मोबाइल पर गेम खेलने से मना करने पर फांसी लगाई।
  • जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में 13 साल के कादिर ने मोबाइल पर गेम खेलने से मना करने पर खुदकुशी की।
  • हरियाणा में सात लडक़ों ने 10 साल की लडक़ी से गैंगरेप किया, अपराधी छह लडक़ों की उम्र 10 से 12 साल के बीच।
  • बैंगलोर में सॉफ्टवेयर इंजीनियर पिता के 12 साल के बेटे ने मोबाइल गेम खेलने से मना करने पर 12वीं मंजिल से कूदकर जान दी।
  • छतरपुर में गेम खेलने से मना करने पर बच्चे ने फांसी लगाकर आत्महत्या की। उसे भी कई ऑनलाइन खेलों की लत लग गई थी।
  • बरेली कैंट एरिया में 12 साल के बच्चे ने चार साल की लडक़ी से रेप किया। जांच हुई तो पता लगा कि वह मोबाइल में गंदी-गंदी चीजें देखना का आदी था।
  • जयपुर में सैन्य अधिकारी का 14 साल का बेटा ऑनलाइन क्लास में टीचर को प्राइवेट पार्ट दिखाने पर गिरफ्तार हुआ।

 

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