आखिर जेल में हो रही बंदियों की मौत का जिम्मेदार कौन!

  • बगैर पैसा दिए नहीं होता बंदियों का जेल अस्पताल में उपचार
  • शासन और मुख्यालय की लापरवाही से हो रही मौतें
  • जेलों पर तैनात डॉक्टर और फार्मासिस्ट के नहीं होते तबादले
  • एक ही जेल पर 10-15 साल से जमे डॉक्टर फार्मासिस्ट

राकेश यादव

लखनऊ। प्रदेश की जेलों में बंदियों की मौत का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। जेलों में आए दिन हो रही मौतों का जिम्मेदार कौन है। यह सवाल विभाग में चर्चा का विषय बना हुआ है। चर्चा है कि बंदियों की मौत के शासन और मुख्यालय के  साथ जेल पर तैनात डॉक्टर और फार्मासिस्ट भी कम जिम्मेदार नहीं है। जेलों पर तैनात डॉक्टर और फार्मासिस्ट के तबादले ही नहीं होते हैं। तमाम जेलों पर डॉक्टर और फार्मासिस्ट 1015 सालों से जमे हुए है। डॉक्टर सिर्फ उन्हीं बंदियों का उपचार करते है जो उन्हें मुंहमांगी रकम देते है। पैसा नहीं देने वाले बंदियों को उनके हाल पर ही छोड़ दिया जाता है। उधर विभाग के आला अफसर इसे मेडिकल का मामला  बताते हुए इस पर कोई भी टिप्पणी करने से बचते नजर आए।

प्रदेश की जेलों में बंदियों के त्वरित इलाज के लिए अस्पताल बनवाए गए है। इन अस्पतालों में चिकित्सा विभाग की ओर से डॉक्टर और फार्मासिस्ट तैनात किए जाते है। सूत्रों का कहना है पहली बात तो कि पहले कोई भी डॉक्टर जेल में आने को तैयार नहीं होता है और जो डॉक्टर एक बार जेल में आ जाता है तो फिर वह वहां से हटने को तैयार ही नहीं होता है। यही वजह है प्रदेश की तमाम जेलों में डॉक्टर और फार्मासिस्ट बीते 10-15 साल से एक ही जेल में जमे हुए है। चिकित्सा विभाग और स्थानीय सीएमओ इनका तबादला ही नहीं करते हैं। इससे जेलों को चिकित्सा व्यवस्था पूरी तरह से चौपट हो गई है।

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सूत्रों का कहना है जेल अस्पताल में सिर्फ उन्हीं धनाढ्य बंदियों का उपचार होता है। जो डॉक्टरों और फार्मासिस्टों को मुंहमांगी रकम देते है। पैसा नहीं देने वाले बंदियों नीली पीली गोलियां देकर टरका दिया जाता है। जेल डॉक्टरों और फार्मासिस्टों ने उपचार के लिए बकायदा दाम निर्धारित कर रखे हैं। राजधानी की जिला जेल में बंदियों को जमानत तक अस्पताल में रहने के 20 हजार रुपए वसूल किए जा रहे है। इसी प्रकार एक सप्ताह तक जेल अस्पताल में रहने के पांच हजार रुपए की दर निर्धारित है।

जेल अस्पताल से जेल के बाहर जिला अस्पताल जाने के लिए बंदियों से हैसियत के हिसाब से लाखों रुपए की वसूली की जा रही है। सूत्रों की माने तो लाखों रूपये की वसूली का हिस्सा स्थानीय जिला अस्पताल के सीएमएस तक को पहुंचाया जाता है। बंदियों के इलाज के लिए वसूल की गई धनराशि में जेल प्रशासन की भी हिस्सेदारी होती है। यही वजह है जेल में बंद गरीब और असहाय बंदी पैसे के अभाव में समय पर उपचार नहीं मिल पाने की वजह से जेलों में दम तोड़ रहे है। डॉक्टर और फार्मासिस्ट सिर्फ जेब भरने में लगे है जेलों में गरीब कैदियों और बंदियों का कोई पुरसाहाल नहीं है।

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दो माह में करीब डेढ़ दर्जन बंदियों की हुई मौत

बीते दो दिनों में प्रदेश की दो जिलों में एक-एक बंदी की मौत हो गई है। दो माह के अंतराल में प्रदेश की जेलों में करीब डेढ़ दर्जन से अधिक बंदियों की मौत हो चुकी है। दो दिन पहले वाराणसी की जिला जेल में बंदी मुकुल जायसवाल की मौत हो गई। परिजनों का आरोप है कि समय पर उपचार नहीं मिल पाने की वजह से बंदी की मौत हुई है। इस मामले में आक्रोशित परिजनों को थप्पड़ मार देने पर लोगो ने दारोगा की पिटाई तक कर दी। रविवार को इटावा जिला जेल में भी एक कैदी की मौत हो गई। इससे पहले मैनपुरी और झांसी जेल में 48 घंटे के अंतराल में दो-दो बंदियों की मौत हो चुकी है।

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