महुआ की शराब बनाने मिली

  • छूट की होनी चाहिए विवेचना
  • 40 साल बाद भी नहीं हो पाई स्वास्थ्यगत विवेचना
  • बस्तर और सरगुजा के आदिवासियों को मिली हुई है पांच लीटर मंद रखने की छूट

हेमंत कश्यप

जगदलपुर । बस्तर और सरगुजा के आदिवासियों को महुआ की शराब बनाकर पीने की छूट दी गई है किंतु बीते 40 वर्षों में इस छूट का क्या परिणाम सामने आया?इसकी विवेचना अब तक नहीं हो पाई है। इधर आदिवासी समाज की महिलाएं और बच्चे ही खून की कमी के सबसे ज्यादा शिकार हैं। इन सब के बीच दोनों संभागों में महुआ की शराब बनाने मिली छूट बड़े व्यवसाय का बड़ा रूप ले चुकी है।

छूट देने का तर्क

वरिष्ठ अधिवक्ता तथा हल्बा समाज के संभागीय अध्यक्ष अर्जुन नाग बताते हैं कि वर्ष 1980 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के समक्ष कुछ आदिवासी नेताओं ने तर्क रखा था कि बस्तर और सरगुजा के आदिवासी प्रतिवर्ष लगभग 5 करोड रुपए की शराब पी जाते हैं। बस्तर और सरगुजा में महुआ वृक्षों की अधिकता है अगर इन्हें महुआ की शराब बनाकर पीने की छूट दे दी जाए तो शराब पर खर्च की जा रही यह राशि उनके बीवी – बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर काम आएगी।
इस तर्क के आधार पर ही आदिवासियों को महुआ शराब बनाकर पीने के छूट दी गई है। इस छूट के तहत हर आदिवासी परिवार पांच लीटर मंद अर्थात महुआ की शराब बना कर रख सकता है। अगर किसी आदिवासी परिवार को दिन विशेष के लिए अधिक शराब की जरूरत है तो वह आबकारी विभाग में स्वीकृति लेकर आवश्यकतानुसार अधिक शराब बन सकता है।

छूट का दुरुपयोग

धुर्वा समाज के पूर्व कोषाध्यक्ष तथा सेवानिवृत्त प्राचार्य मंगलू राम नाग कहते हैं कि बस्तर में महुआ की अधिकता है और प्रतिवर्ष यहां करोड़ों रुपए का महुआ का कारोबार होता है।आदिवासियों को महुआ की शराब बनाकर पीने की छूट है, किंतु वह इसे बेच नहीं सकता लेकिन यहां के हाट – बाजारों और मुर्गा बाजारों में खुले आम महुआ की शराब बेची जा रही है। ऐसे स्थल मंद पसार के नाम से चर्चित है। यह सब पुलिस और जनप्रतिनिधियों की जानकारी में हो रहा है।

छूट की समीक्षा जरुरी

भतरा समाज के संभागीय अध्यक्ष व सेवानिवृत्त एसडीओ (वन) रतनराम कश्यप ने बताया कि स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार सबसे ज्यादा रक्त अल्पता (एनीमिया) की शिकायत बस्तर की महिला और बच्चों में हैं। इसका कारण कुपोषण को माना जा रहा है। बस्तर में 70 फीसदी ग्रामीण महुआ की शराब पीते हैं, किंतु जिस हिसाब से वे पीते हैं, उस हिसाब से खाते नहीं है। ऐसे में शरीर को पोषक तत्व कैसे मिलेगा ? बीते 40 वर्षों में शासन- प्रशासन ने यह जानने का प्रयास नहीं किया कि महुआ की शराब बनाकर पीने दी गई छूट का क्या परिणाम सामने आया। इस दिशा में प्रदेश सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए।

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