श्रीभारत सावित्री : महाभारत के श्लोकचतुष्टय को अवश्य जानिए

               संजय तिवारी
संजय तिवारी

‘भारत सावित्री’ नाम महाभारत के अन्त में आया है। जैसे वेदों का सार गायत्री मन्त्र या सावित्री है, वैसे ही सम्पूर्ण महाभारत का सार धर्म शब्द में है। गायत्री भी सविता देवता की स्तुति है और वही सविता देवता महाभारत ग्रंथ के भी हेतु हैं जिनमे भारत सावित्री की स्थापना है। सविता , भर्गोदेवस्य ही सावित्री स्वरूप उपस्थित हैं और नित्य हैं। श्रीमहाभारत के स्वर्गारोहणपर्व के अन्तिम अध्याय के अन्तिम श्लोकचतुष्ट्य को श्रीभारत-सावित्री की संज्ञा दी गयी है।

य इमां संहितां पुण्यां पुत्रमध्यापयच्छुकम्।

जिन भगवान् वेदव्यास ने इस पवित्र संहिता को प्रगट करके अपने पुत्र शुकदेवजी को पढ़ाया था , वही महाभारत का सारभूत उपदेश का वर्णन श्लोकचतुष्ट्य ‘‘भारत-सावित्री’ हैं। जिस प्रकार वेदों का सार ‘श्रीसावित्री’ है, उसी प्रकार पञ्चम वेद स्वरूप ‘महाभारत’ का सार ‘श्रीभारत-सावित्री’ है। लक्षश्लोकात्मक महाभारत पारायण करने का सौभाग्य बहुतों को नहीं होता, परन्तु इस श्लोकचतुष्ट्य का पाठ करके तथा इसके अनुसन्धान से अनायास ही श्रीमहाभारत पारायण का फल कोई भी आस्तिक बुद्धिशाली प्राप्त कर सकता है। श्लोकचतुष्ट्य इस प्रकार है-

मातापितृसहस्त्राणि पुत्रदारशतानि च ।

संसारेष्वनुभूतानि यान्ति यास्यन्ति चापरे।।

मनुष्य इस जगत में हजारों माता-पिताओं तथा सैकड़ों स्त्री-पुत्रों के संयोग-वियोग का अनुभव कर चुके हैं, करते हैं और करते रहेगें ।।

हर्षस्थानसहस्त्राणि भयस्थानशतानि च ।

दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ।।

अज्ञानी पुरूष को प्रतिदिन हर्ष के हजारों और भय के सैकड़ों अवसर प्राप्त होते रहते हैं; किन्तु विद्वान् पुरुष के मन पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चित् श्रीणोति मे ।

धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते ।।

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मैं दोनों हाथ ऊपर उठाकर पुकार-पुकार कर कह रहा हूँ, पर मेरी बात कोई नहीं सुनता। धर्म से मोक्ष तो सिद्ध होता ही है; अर्थ और काम भी सिद्ध होते हैं, तो भी लोग धर्म का सेवन क्यों नहीं करते ?

न जातु कामान्न भयान्न लोभाद् धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतो: ।

नित्यो धर्म: सुखदुःखे त्वनित्ये जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्य:।।

‘कामना से, भय से, लोभ से अथवा प्राण बचाने के लिये भी धर्म का त्याग न करे। धर्म नित्य है और सुख-दुःख अनित्य। इसी प्रकार जीवात्मा नित्य है और उसके बन्धन का हेतु अनित्य’।

फलश्रुति:

इमां भारतसवित्रीं प्रातरुत्थाय यः पठेत् ।

स भारतफलं प्राप्य परं ब्रह्माधिगच्छति ।।

महाभारत का यही सारभूत उपदेश ‘भारत-सावित्री’ के नाम से प्रसिद्ध है। ऐसी स्थापना है कि जो व्यक्ति प्रतिदिन ब्रह्मवेला में इसका पाठ करता है वह सम्पूर्ण महाभारत के पारायण का फल पाकर परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त कर लेता है। (महाभारत, स्वर्गा०, अ०- 5, 60 – 64) जन्म-जन्मांतर की क्रमिक जन्मयात्रा को समाप्त करने के लिये श्रीभारत-सावित्री ने प्रथम और द्वितीय श्लोकों में वैराग्य का उपदेश किया है। तृतीय श्लोक से धर्माचरण के अभ्यास का उपदेश दिया है और चतुर्थ श्लोक से अनित्य संसार, अनित्य सम्बन्ध, अनित्य सुख-दुःख तथा अनित्य भीतिका परित्याग करने का उपदेश किया है। धर्म नित्य वस्तु है, प्रतिदिन इस नित्य धर्म के किसी भी प्रकार से साधनाभ्यास से समय व्यतीत करना चाहिये। निरन्तर साधना से यह धर्म अपना छद्मवेश त्यागकर ‘तुम और मैं ‘ इस व्यवधान का नाश करके परम धर्मरूप से प्रकट होगा और जीव का चिरविफल जन्म तथा जीवन सफल हो जायेगा। भारत सावित्री की इस महत्ता को प्रो वासुदेव शरण अग्रवाल ने बहुत गहरे देखा है और इस बारे में बहुत कुछ लिखा भी है। वह भारत सावित्री नामक अपनी पुस्तक में लिखते भी हैं- भारत-युद्ध की कथा तो निमित्त मात्र है, इसके आधार पर महाभारत के मनीषी लेखक ने युद्ध-कथा को धर्म-संहिता के रूप में परिवर्तित कर दिया था। जैसा कि ऊपर लिखा गया है , धर्म की नित्य महिमा को बताने के लिए ग्रन्थ के अन्त में यह श्लोक है…

न जातु कामान्न भयान्न लोभाद् धर्म त्यजेज्जीवितास्यापि हेतोः।

नित्यो धर्मः सुखदुःखे त्वनित्ये नित्यो जीपो धातुरस्य त्वनित्यः।।

अर्थात-काम से, भय से, लोभ से अथवा प्राणों के लिए भी धर्म को छोड़ना उचित नहीं। धर्म नित्य है, सुख और दुःख क्षणिक हैं। जीव नित्य है और शरीर (धातु) अनित्य है। इस श्लोक की संज्ञा भारत सावित्री है। यही महाभारत का निचोड़ या उसका गायत्री मन्त्र है। विश्व की प्रेरक शक्ति का नाम सविता है। महाभारत-ग्रन्थ का जो धर्मप्रधान उद्देश्य है, वही उसका सविता देवता है। वेदों में सृष्टि के अखण्ड विश्वव्यापी नियमों को ऋत कहा गया था। ऋत के अनुसार जीवन का व्यवहार मानव के लिए श्रेष्ठ मार्ग था। ऋत के विपरीत जो कर्म और विचार थे, उन्हें वरुण का पाश या बन्धन समझा जाता था। वैदिक परिभाषाओं का आने वाले युग में विकास हुआ। उस समय जो शब्द सबसे ऊपर तैर आया, वह धर्म था। धर्म शब्द भारतीय संस्कृति का सार्थक और समर्थ शब्द बन गया। महाभारतकार ने धर्म की एक नई व्याख्या रखी है, अर्थात प्रजा और समाज को धारण करने वाले, नियमों का नाम धर्म है। जिस तत्त्व में धारण करने की शक्ति है, उसे ही धर्म कहते हैं। धर्म शब्द विशुद्ध भारतीय है और इसका पश्चिम के रिलीजन, मजहब, पंथ या किसी अन्य उपासना पद्धति से कोई संबंध नहीं। यह शब्द तब से अस्तित्व में है जब पृथ्वी पर अथवा सृष्टि में सनातन सत्ता के अतिरिक्त कोई गढ़ित पद्धति नहीं थी। भारतीय ज्ञान परंपरा में यह निहित रहा किंतु पश्चिमी अनुवादों और उन्हें पढ़ कर ज्ञानी कहलाने वाले अज्ञानियों ने धर्म शब्द की विराट चेतना को समझे बिना ही इसको अनुवादित भाषाओं की सीमा में डाल दिया।

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