साक्षरता से उच्च शिक्षा तक पहुंचीं बेटियां
Barabanki Girls’ Education: अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस के मौके पर बालिका शिक्षा के लिए किए गए इन प्रयासों की चर्चा आज भी प्रासंगिक है। फतेहपुर के दौलतपुर गांव निवासी राम नरेश रावत को वर्ष 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हाथों राष्ट्रीय युवा पुरस्कार मिला था। उनका निधन हो चुका है, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में उनके प्रयास आज भी कई बेटियों के भविष्य में दिखाई देते हैं।
पारिजात के नीचे लिया संकल्प
राम नरेश रावत ने बालिकाओं को शिक्षा से जोड़ने का संकल्प लिया था। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए 18 अगस्त 1989 को पारिजात युवक समिति का गठन किया गया। समिति ने ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा से वंचित बच्चों, विशेषकर बालिकाओं को पढ़ाई से जोड़ने की दिशा में काम शुरू किया।
इसका सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव वर्ष 1999-2000 में आया, जब यूनिसेफ ने वैकल्पिक शिक्षा कार्यक्रम के तहत 10 से 14 वर्ष की उन बालिकाओं के लिए आवासीय शिक्षा शिविर ‘पहला कदम’ आयोजित करने की जिम्मेदारी पारिजात युवक समिति, सफदरगंज को सौंपी।
‘पहला कदम’ से बदली 800 बेटियों की जिंदगी
राम नरेश रावत, उनकी पत्नी सरोज रावत और समिति के सदस्यों रत्नेश कुमार, जगतजीत सहित अन्य लोगों ने 100 बालिकाओं का शिविर में दाखिला कराया। इन बेटियों को महज एक साल के भीतर साक्षर बनाने के साथ कक्षा पांच स्तर तक की शिक्षा देने का लक्ष्य रखा गया।
इसके बाद लखनऊ शिक्षा निदेशालय परिसर में भी इसी तरह का आवासीय शिविर संचालित किया गया। दोनों स्थानों पर करीब चार वर्षों के दौरान 800 बालिकाओं को साक्षर और शिक्षित होने का अवसर मिला। यह पहल उन परिवारों की बेटियों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण थी, जिनकी पढ़ाई किसी कारण से रुक गई थी।
शिक्षा से राजनीति तक रहा राम नरेश का सफर
बालिका शिक्षा के लिए काम करने वाले राम नरेश रावत विधायक और MLC भी रहे। उनके निधन के बाद उनकी पत्नी सरोज रावत इस अभियान को आगे बढ़ा रही हैं। सरोज रावत वर्तमान में राज्य संगीत नाटक अकादमी की सदस्य होने के साथ पारिजात युवक समिति का संचालन भी कर रही हैं।
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उनका कहना है कि इस अभियान की सफलता में वरिष्ठ IAS अधिकारी पार्थ सेन सारथी शर्मा का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। उस समय पार्थ सेन सारथी शर्मा अपर राज्य परियोजना निदेशक, साक्षरता एवं वैकल्पिक शिक्षा के पद पर तैनात थे। वर्तमान में वह अपर सचिव, माध्यमिक एवं बेसिक शिक्षा के पद पर हैं।
‘पहला कदम’ से निकली कस्तूरबा विद्यालयों की राह
आवासीय शिक्षा शिविर की सफलता ने बालिका शिक्षा के लिए बड़े स्तर पर स्थायी व्यवस्था की जरूरत को सामने रखा। सरोज रावत के मुताबिक, शिविर की सफलता से प्रेरित होकर केंद्र सरकार के सामने आवासीय बालिका विद्यालयों की स्थापना का प्रस्ताव रखा गया।
इसके बाद वर्ष 2007 से कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालयों का संचालन शुरू हुआ। इस तरह ‘पहला कदम’ जैसे छोटे प्रयास ने आगे चलकर बालिकाओं के लिए आवासीय शिक्षा की व्यापक व्यवस्था की राह तैयार करने में भूमिका निभाई।
किसी ने MA किया तो कोई बनीं स्वास्थ्य कार्यकर्ता
‘पहला कदम’ शिविर से जुड़ी कई बेटियों ने आगे की पढ़ाई जारी रखकर अपने सपनों को उड़ान दी। हरख ब्लॉक के मिर्जापुर गांव की प्रियंका पहले शिविर में साक्षर हुईं और फिर शिक्षा हासिल करते हुए शिक्षा शास्त्र से MA तक की पढ़ाई पूरी की। वह वर्तमान में पूर्व माध्यमिक विद्यालय इंधौलिया में अनुदेशक के पद पर कार्यरत हैं।
मुश्कीनगर की कांति ने स्नातक तक शिक्षा हासिल की और इसके बाद PRD में भर्ती हुईं। वहीं हमीदनगर की शांति ने शिक्षा के साथ स्वास्थ्य सेवा का रास्ता चुना। वह आशा कार्यकर्ता के रूप में सेवाएं दे रही हैं और ANM का कोर्स भी पूरा कर चुकी हैं।
एक संकल्प, जिसने कई घरों में रोशनी पहुंचाई
कभी स्कूल से दूर रहने वाली इन बेटियों के लिए ‘पहला कदम’ सिर्फ एक शिक्षा शिविर नहीं था, बल्कि आगे बढ़ने का पहला अवसर था। साक्षरता से शुरू हुआ यह सफर कई बेटियों को उच्च शिक्षा, रोजगार और समाजसेवा तक ले गया।
पारिजात वृक्ष के नीचे लिया गया एक संकल्प आज भी इन बेटियों की उपलब्धियों में जीवित है। राम नरेश रावत का प्रयास बताता है कि शिक्षा के लिए उठाया गया एक छोटा कदम भी आने वाली पीढ़ियों के लिए बड़े बदलाव की नींव बन सकता है।
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One thought on “पारिजात के संकल्प से बाराबंकी की बेटियां होंगी शिक्षित”
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