पूर्वांचल की राजनीति में हरिशंकर तिवारी के बाद अमर मणि त्रिपाठी वह ब्राह्मण चेहरा हैं जिनके 2027 के चुनाव में उतरने की घोषणा मात्र से ही राजनीतिक हल्कों में मची है खलबली

अमर मणि त्रिपाठी जिस भी गठबंधन से लड़े सत्ता की चाभी उसी दल के पास होगी!

हरिशंकर तिवारी को गुरु मानकर राजनीति की दुनिया में अमर मणि त्रिपाठी ने रखा था कदम

2001 में बस्ती के कारोबारी के बेटे का हुआ अपहरण, भाजपा ने लगाया था किनारे

राजनीति में आने से पहले अमर मणि त्रिपाठी का था अपराध की दुनिया में बड़ा नाम

मधुमिता शुक्ला हत्याकांड के बाद राजनीतिक रसूख पर लगा था सबसे बड़ा दाग

उमेश चन्द्र त्रिपाठी

Uttar Pradesh : की राजनीति में एक अलग ही माहौल बनता दिखने लगा है। लोकसभा चुनाव से पहले कई बड़े संदेश देने की कोशिश की जा रही है। पिछले दिनों में बाहुबलियों को जेल से बाहर आता देखा जा रहा है। पिछले दिनों बिहार सरकार ने कानून में बदलाव कर गोपालगंज के डीएम रहे जी. कृष्णैया हत्याकांड मामले में करीब 16 साल से जेल में बंद आनंद मोहन सिंह की रिहाई का रास्ता साफ कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद यूपी की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल की अनुमति के बाद कवियत्री मधुमिता शुक्ला हत्याकांड के आरोपी पूर्व मंत्री अमर मणि त्रिपाठी की रिहाई हो गई। जिस प्रकार से आनंद मोहन की रिहाई पर बिहार से लेकर यूपी तक राजनीतिक विवाद गहराया था, उसी प्रकार की स्थिति यूपी में भी दिख रही है। हालांकि, आरोपों और पीड़ा प्रदर्शित करने का सिलसिला पीड़ित पक्ष की तरफ से ही दिख रहा है।

विपक्षी दल लोकसभा चुनाव से पहले अमर मणि त्रिपाठी पर बड़ा राजनीतिक हमला कर एक वर्ग के वोटरों की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहते हैं। अमर मणि त्रिपाठी की रिहाई की चर्चा के बाद से अब तक कोई बड़ा बयान विपक्षी पार्टियों की ओर से नहीं आया है।

राजनीतिक कद रखता है मायने

यूपी की राजनीति में अमर मणि त्रिपाठी का राजनीतिक कद काफी मायने रखता है। 14 फरवरी वर्ष 1956 में जन्मे अमर मणि त्रिपाठी ने अपराध की दुनिया से राजनीति तक का सफर तय किया। अमर मणि त्रिपाठी की राजनीति में एंट्री से पहले ही उन पर हत्या, मारपीट, किडनैपिंग जैसे आरोप लग चुक थे। जैसे-जैसे अपराध का ग्राफ बढ़ता गया, अमर मणि त्रिपाठी के नाम की गूंज लखनऊ तक सुनाई देने लगी। दरअसल, तब पूर्वांचल में ब्राह्मण और राजपूत के बीच वर्चस्व की लड़ाई चल रही थी। ब्राह्मणों का नेतृत्व हरिशंकर तिवारी कर रहे थे वहीं ठाकुरों के बीच वीरेंद्र प्रताप शाही अपनी पकड़ बनाए हुए थे। गोरखपुर में छात्र राजनीति चरम पर थी। ऐसे में दोनों गुट लगातार आमने-सामने आ रहे थे। इलाके पर वर्चस्व की लड़ाई में हर प्रभावशाली वर्ग किसी न किसी किनारे पर लगा हुआ था। ऐसे ही दौर में अमर मणि त्रिपाठी की एंट्री हुई। उन्होंने हरिशंकर तिवारी का साथ देना शुरू किया। देखते ही देखते अमर मणि त्रिपाठी ने हरिशंकर तिवारी के खास होने का तमगा हासिल कर लिया।

हरिशंकर तिवारी को भी एक ऐसे ही हथियार की तलाश थी, जो वीरेंद्र प्रताप शाही को टक्कर दे सके। हरिशंकर तिवारी ने अमर मणि त्रिपाठी को साल 1981 के उपचुनाव में वीरेंद्र शाही के खिलाफ 190 लक्ष्मीपुर सीट से चुनावी मैदान में उतार दिया। अमर मणि त्रिपाठी रोजा देश पांडे की कम्युनिस्ट पार्टी और कांग्रेस पार्टी के गठबंधन से चुनाव लड़ गए। हालांकि वीरेंद्र प्रताप शाही से मामूली अंतर से चुनाव हार गए। 1985 में वीरेंद्र प्रताप शाही के सामने एक बार फिर वे कांग्रेस के टिकट पर लक्ष्मीपुर से चुनावी मैदान में उतरे। इस बार भी उन्हें हार मिली। महाराजगंज की लक्ष्मीपुर सीट वर्ष 2008 के परिसीमन के बाद नौतनवां कही जाने लगी।

बन गए राजनीतिक दलों की जरूरत

अमर मणि त्रिपाठी दो चुनावों में हारने के बाद भी हिम्मत नहीं हारे और 1989 में पुनः कांग्रेस के टिकट पर चुनाव में उतरे और पहली बार जीत हासिल की। अमर मणि त्रिपाठी पहली बार विधायक बने। हालांकि, वर्ष 1991 और 1993 के विधानसभा चुनाव में फिर अमर मणि त्रिपाठी को पुनः हार का सामना करना पड़ा। दोनों बार समाजवादी पार्टी के कुंवर अखिलेश सिंह ने अमर मणि को पराजित दिया। हालांकि, वर्ष 1996 में एक बार फिर कांग्रेस के टिकट पर उतरे अमर मणि त्रिपाठी ने जीत हासिल की। तब यूपी में भाजपा-बसपा गठबंधन की सरकार बनी। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़कर भाजपा की सदस्यता हासिल की। भाजपा ने उन्हें पार्टी में आते ही मंत्री बना दिया। बाद में वे पार्टी से निकाले गए, लेकिन पूर्वांचल में अमर मणि त्रिपाठी की धमक और पकड़ बढ़ती गई। ब्राह्मण वोट बैंक के बीच मजबूत होते अमर मणि त्रिपाठी राजनीतिक दलों की जरूरत बन गए। हर सरकार में उन्हें मंत्री बनाया जाने लगा।

2001 में बस्ती के राहुल मद्देसिया अपहरण कांड ने बदली राजनीति

अमर मणि त्रिपाठी पर हत्या और अपहरण के केस लगातार चल रहे थे। इसी बीच वर्ष 2001 में बस्ती से एक बड़े कारोबारी के 15 वर्षीय पुत्र राहुल मद्देसिया का अपहरण हो गया। मामला लखनऊ से होते हुए दिल्ली तक पहुंच गया। तब यूपी में राजनाथ सिंह और केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार थी। मामला जैसे ही दिल्ली तक पहुंचा, प्रदेश सरकार पर दबाव बढ़ा। सीएम राजनाथ सिंह ने अपहृत राहुल मद्देसिया को हर हाल में ढूंढ़ निकालने का आदेश पुलिस को दिया। पुलिस ने इसके बाद एक्शन तेज किया। राहुल मद्देसिया को आखिरकार बरामद कर लिया गया। जांच में जानकारी सामने आई कि राहुल मद्देसिया को अपहरण के बाद अमर मणि त्रिपाठी के बंगले में रखा गया था। भाजपा सरकार पर सवाल उठाए जाने लगे। विवाद गहराया तो सीएम राजनाथ सिंह ने अमर मणि त्रिपाठी को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया।

बसपा की बदली रणनीति का बने हथियार

बहुजन समाज की बात करने वाली बसपा ने अपने रुख में बदलाव शुरू कर दिया था। वर्ष 2002 में विधानसभा चुनाव की तैयारी थी। भाजपा से किनारे किए गए अमर मणि त्रिपाठी ने तब बसपा का दामन थामा। बसपा ने उन्हें नौतनवां से उम्मीदवार बना दिया। वे फिर वहां से जीते। मायावती की सरकार बनी, उसमें वे शामिल रहे। हालांकि, बसपा-भाजपा सरकार एक साल तक ही चली। इसके बाद राज्य की सत्ता में सपा पावर में आई। मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने।

अमर मणि त्रिपाठी ने फिर पाला बदला और मुलायम सिंह यादव के करीब हो गए। अमर मणि त्रिपाठी को मुलायम ने अपनी कैबिनेट में शामिल किया। इसी दौरान अमर मणि त्रिपाठी की लखीमपुर खीरी की वीर रस की कवियत्री मधुमिता शुक्ला से पहचान बढ़ी। इसके बाद अमरमणि का बुरा दौर शुरू हो गया।

घर में हुई थी मधुमिता की हत्या

कवियत्री मधुमिता शुक्ला की हत्या उसके घर में हुई थी। 9 मई 2003 को लखनऊ की पेपर मिल कॉलोनी में रहने वाली मधुमिता शुक्ला के घर में दो बदमाश घुसे। गोलियों की बौछार कर उसकी हत्या कर दी। इस हत्याकांड का आरोपी बाहुबली अमर मणि त्रिपाठी को बनाया गया। उनकी पत्नी मधुमणि त्रिपाठी को भी इस मामले में आरोपी बनाया गया था। मधुमिता की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उसके गर्भवती होने का जिक्र था। इसके बाद शक अमर मणि पर गहरा गया।

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CBI की जांच में राजनीति से अपराध की दुनिया तक को अपने कदमों में रखने वाले अमर मणि त्रिपाठी को आरोपी बनाया गया। कोर्ट में चार सालों तक केस चला। वर्ष 2007 में सजा का ऐलान किया गया। कोर्ट ने अमर मणि त्रिपाठी और मधुमणि को उम्र कैद की सजा सुनाई।

संदेश तो जाएगा…

कोर्ट की उम्र कैद की सजा को 16 साल बाद राज्यपाल की अनुमति के बाद खत्म करने का निर्देश दिया गया है। अमर मणि त्रिपाठी और मधुमणि की उम्र, सजा की अवधि और सजा के दौरान जेल में अच्छे आचरण को देखते हुए सजा माफ की गई। राज्यपाल की अनुमति के बाद जेल प्रशासन और सुधार विभाग ने रिहाई के आदेश जारी किया। करीब 20 साल बाद 25 अगस्त 2025 को अमर मणि त्रिपाठी जेल से रिहा कर दिए गए।

जेल से बाहर आने के बाद पूर्वांचल में राजनीतिक समीकरण बदल सकता है। दरअसल, कभी भाजपा के साथ में रहे अमर मणि त्रिपाठी की रिहाई को लेकर इस इलाके के ब्राह्मण वोट के बीच संदेश जाएगा।

भले वर्ष 2007 के बाद अमर मणि त्रिपाठी ने चुनाव नहीं लड़ा हो, लेकिन उनकी राजनीतिक विरासत को बेटे अमन मणि त्रिपाठी ने आगे बढ़ाया। एक बड़े वर्ग में उनका रसूख आज भी कायम है।

राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि पूर्वांचल में भाजपा ने अनुप्रिया पटेल, डॉ संजय निषाद,ओम प्रकाश राजभर और दारा सिंह चौहान जैसे चेहरों को साधकर ओबीसी वोट बैंक में अपनी पैठ बढ़ाई है। वहीं अमर मणि त्रिपाठी के जरिए ब्राह्मणों के बीच पार्टी के आधार के और जमने का संदेश जाना तय माना जा रहा है।

इधर अमर मणि त्रिपाठी ने बीते 30 अगस्त को महराजगंज जनपद के फरेंदा कस्बे के कृष्णा मैरेज हॉल में आयोजित के कार्यक्रम में स्वयं को फरेंदा विधानसभा सीट से और बेटे पूर्व विधायक अमन मणि त्रिपाठी को नौतनवां विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने का मंच से ऐलान कर दिया तभी से राजनीतिक हल्कों में खलबली मची हुई है। निश्चित तौर पर अगर अमर मणि त्रिपाठी के चुनाव लड़ने में कोई अड़चन नहीं आया तो जिस दल से वह लड़ेंगे सरकार उसी की बनेगी?

राजनीति विश्लेषकों का मानना है कि अमर मणि त्रिपाठी अगर लड़ते हैं तो उनका असर गोरखपुर और बस्ती मंडल के 41 विधानसभा सीटों पर सीधे-सीधे पड़ेगा जहां आज भी हर सीट पर उनके नाम पर पांच से दस हजार वोटों का पार्टी को इजाफा होगा?

हालांकि कि वह पीडीए से लड़ेंगे या एनडीए से यह तो आने वाला समय बताएगा पर भाजपा से नजदीकियों को देखते हुए लोगों का कहना है कि एनडीए से लड़ना उनके लिए काफी मुफीद साबित हो सकता है?

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