छिंदगांव: जहां माता पार्वती ने इंद्राणी को इंद्र से मिलाया

तीनों ने मिलकर नदी किनारे की शिवलिंग की स्थापना

इंद्र और पार्वती के सानिध्य की वजह से नाम पड़ा इंद्रावती

हेमंत कश्यप/जगदलपुर

Chhindgaon Shivling : इंद्रावती नदी के किनारे स्थित छिंदगांव का शिवलिंग हजारों साल पुराना है। लोग मान्यता है कि शबरी नामक युवती के प्रेम में आसक्त इंद्र को समझा बुझाकर माता पार्वती ने इंद्राणी से मिलवाया और तीनों ने मिलकर नदी किनारे शिवलिंग की स्थापना की थी। नदी तट पर देवराज और माता पार्वती के सानिध्य में यह पुनीत कार्य हुआ था इसलिए मंदाकनी नदी का नाम बदल कर इंद्रावती हो गया। वह शिवलिंग की आज भी नदी किनारे मौजूद है। अब यह स्थल पुरातत्व विभाग के अधीन है।
जगदलपुर चित्रकोट मार्ग पर स्थित ग्राम बड़ाजी से करीब 6 किमी दूर छिंदगांव है । यहां के शिवालय और इंद्रावती नामकरण के संदर्भ में लोक कथा प्रचलित है कि एक बार इंद्र भ्रमण करने धरती पर उतरे थे। वह स्थान बस्तर था। यहां उनकी मुलाकात दो युवतियों से हुई। एक का नाम मंदाकिनी और दूसरे का नाम शबरी था। इंद्र शबरी के साथ रहने लगे। कई दिनों तक जब इंद्र स्वर्ग नहीं लौटे तो इंद्राणी उन्हे खोजते हुए धरती पर आई और इन्द्र के बारे में पूछने लगी। काफी प्रयास के बाद उन्हे लोगों से जानकारी मिली कि उनका पति शबरी के साथ है। यह सुनकर इंद्राणी रोने लगी और सहायता के लिए माता पार्वती का स्मरण करने लगी।

*ऐसे बदला नदी का नाम*

माता पार्वती वहां आई और इंद्र को बुलाकर समझाया तथा इंद्र और इंद्राणी का पुनः मिलन कराया। इस घटना के बाद शबरी विपरीत दिशा में चली गई। इंद्र और पार्वती संवाद के समय मन्दाकनी भी वहां मौजूद थीं। उस दिन माता पार्वती और इंद्र इन्द्राणी ने छिंदगांव में नदी किनारे शिवलिंग की स्थापना की थीं। साक्षी बतौर वहां उपस्थित रहने के कारण मन्दाकनी का नाम (इन्द्र-पार्वती की मौजूदगी की वजह से) इंद्रावती हो गया।

*छिंदक नागवंशी ने बनवाया मंदिर*

इधर पुरातत्ववेत्ता बताते हैं कि छिंदगांव का शिवलिंग काफी पुराना है। करीब एक हजार साल पहले छिंदक नागवंशी राजाओं ने यहां शिवालय बनवाया। यह शिवालय छत्तीसगढ़ पुरातत्व विभाग के संरक्षण में हैं। मंदिर के बगल में काकतीय राजाओं द्वारा बनवाया गया एक और शिवालय है। मंदिर परिसर में काली कंकालीन सहित अन्य देवी-देवताओं की प्राचीन प्रतिमाएं हैं।

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