डंकनी-शंखनी संगम में गिरे मां सती के अधोदंत, 5000 साल पुराना माना जाता है दंतेश्वरी शक्तिपीठ

Jagdalpur

Jagdalpur: दक्षिण बस्तर में डंकनी और शंखनी नदियों के संगम पर स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर धार्मिक आस्था के साथ-साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार यह शक्तिपीठ करीब 5000 वर्ष से भी अधिक पुराना है। वर्तमान में मंदिर केंद्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के संरक्षण में है।

मंदिर परिसर में मौजूद शिलालेख के अनुसार करीब 708 वर्ष पहले वारंगल से आए पांडव अर्जुन कुल के अन्नम देव ने इस प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। इसके बाद से दंतेश्वरी धाम बस्तर की धार्मिक परंपराओं का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।

52 शक्तिपीठों में शामिल होने की मान्यता

पौराणिक कथा के अनुसार राजा दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था। भगवान शिव और माता सती के संबंधों को लेकर दक्ष के मन में नाराजगी थी। यज्ञ में भगवान शिव का अपमान किए जाने से माता सती बेहद आहत हुईं और उन्होंने यज्ञ कुंड में अपने प्राण त्याग दिए।

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माता सती की मृत्यु से भगवान शिव अत्यंत व्यथित हो गए और उनके पार्थिव शरीर को लेकर तांडव करने लगे। मान्यता है कि ब्रह्मांड का संतुलन बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के अंगों को अलग कर दिया। जहां-जहां उनके अंग गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध हुए।

दंतेवाड़ा में गिरा था माता सती का अधोदंत

धार्मिक मान्यता के मुताबिक माता सती का अधोदंत यानी नीचे का दांत दंतेवाड़ा क्षेत्र में डंकनी और शंखनी नदियों के संगम पर गिरा था। इसी वजह से यह स्थान आगे चलकर दंतेश्वरी शक्तिपीठ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

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बताया जाता है कि गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित ‘शक्तिपीठ’ नामक पुस्तक में भी इस मान्यता का उल्लेख मिलता है। इस धार्मिक स्थल को आठ भैरव भाइयों से जुड़ा हुआ भी माना जाता है। स्थानीय परंपरा के अनुसार नदी किनारे इन भैरवों के स्थान मौजूद हैं।

डंकनी और शंखनी नदियों से जुड़ी मान्यता

दंतेश्वरी धाम की धार्मिक पहचान डंकनी और शंखनी नदियों से भी जुड़ी है। स्थानीय मान्यता के अनुसार डाकिनी और शाकिनी नाम की दो यक्षणियों से इन नदियों के नाम जुड़े हुए हैं। दोनों नदियों का संगम मंदिर की धार्मिक महत्ता को और बढ़ाता है।

दंतेश्वरी धाम में मनाई जाती हैं तीन नवरात्रियां

दंतेश्वरी शक्तिपीठ की एक खास परंपरा यहां मनाई जाने वाली नवरात्रियों से जुड़ी है। आमतौर पर शक्तिपीठों में चैत्र और क्वांर नवरात्रि का आयोजन प्रमुख रूप से किया जाता है। वहीं दंतेश्वरी धाम में हर वर्ष तीन नवरात्रियां मनाने की परंपरा बताई जाती है। तीसरी नवरात्रि फागुन महीने में आखेट नवरात्र के रूप में मनाई जाती है। स्थानीय लोग इसे फागुन मड़ई कहते हैं। इस दौरान बस्तर की लोक परंपराओं और धार्मिक आस्था का विशेष संगम देखने को मिलता है।

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