
Garhiya Shiva Temple : बस्तर के इतिहास में छिंदक नागवंश का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इसी कालखंड की ऐतिहासिक धरोहरों में लोहंडीगुड़ा-कोड़ेनार मार्ग पर ग्राम गढ़िया में स्थित प्राचीन शिव मंदिर भी शामिल है। करीब 966 वर्ष पुराने इस शिवालय का निर्माण छिंदक नागवंशीय नरेश जगदेक भूषण धारावर्ष ने क्षेत्र के संपन्न किसानों से दान में प्राप्त एक-एक स्वर्ण मुद्रा से कराया था।
मंदिर के निर्माण के साथ ही दानदाताओं के नाम और जनता के प्रति राजा का आभार एक शिलालेख पर अंकित कराकर उसे मंदिर के सामने स्थापित कराया गया था। विडंबना यह है कि कभी आस्था और इतिहास का केंद्र रहा यह शिवालय आज पुरातत्व विभाग की उपेक्षा के चलते जर्जर हालत में पहुंच चुका है। मंदिर के सामने स्थापित वह ऐतिहासिक शिलालेख भी सुरक्षित नहीं रह सका। शरारती तत्वों ने शिलालेख को तोड़कर 16 टुकड़ों में तब्दील कर दिया, जो आज भी बिखरे पड़े हैं।
किसानों ने दान की थीं स्वर्ण मुद्राएं
इतिहास के अनुसार, अपनी मृत्यु से करीब पांच वर्ष पहले जगदेक भूषण धारावर्ष ने गढ़िया क्षेत्र के किसानों से एक-एक स्वर्ण मुद्रा दान के रूप में प्राप्त की थी। इन्हीं दान की गई स्वर्ण मुद्राओं से गढ़िया में भगवान शिव का मंदिर बनवाया गया। मंदिर निर्माण के बाद राजा ने दानदाताओं के नाम और जनता के प्रति अपना आभार शिलालेख में दर्ज कराया था। यह तथ्य इस मंदिर को खास बनाता है, क्योंकि इसके निर्माण में तत्कालीन शासक के साथ क्षेत्र के किसानों की भी महत्वपूर्ण सहभागिता रही थी। इस लिहाज से गढ़िया का शिवालय केवल धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि बस्तर के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास का भी महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
शिव उपासक थे छिंदक नागवंशी शासक
छिंदक नागवंशीय नरेश भगवान शिव के उपासक माने जाते हैं। यही वजह है कि उनके शासनकाल में बस्तर के विभिन्न क्षेत्रों में कई शिवालयों का निर्माण कराया गया। वर्ष 1060 ईस्वी के आसपास जगदेक भूषण धारावर्ष की मृत्यु हुई थी। इसके बाद पांच अक्टूबर 1065 के पूर्व नागवंशीय नरेश मधुरांतक देव ने चित्रकोट क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था। गढ़िया का शिवालय इसी ऐतिहासिक कालखंड की महत्वपूर्ण निशानी माना जाता है।
सड़क किनारे पड़ा रहा शिलालेख
मंदिर के सामने स्थापित शिलालेख लंबे समय तक सड़क किनारे ही पड़ा रहा। इसे सुरक्षित रखने के लिए संग्रहालय ले जाने का प्रयास भी हुआ, लेकिन ग्रामीणों के विरोध के चलते ऐसा नहीं हो सका। इसके बाद संरक्षण के अभाव में शिलालेख असामाजिक तत्वों की करतूत का शिकार हो गया और उसे तोड़कर 16 टुकड़े कर दिए गए। आज यह शिलालेख अपने मूल स्वरूप में नहीं है। यदि समय रहते इसके टुकड़ों को सुरक्षित कर उनका वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण किया जाए, तो संभव है कि इस ऐतिहासिक धरोहर से बस्तर के इतिहास से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकें।
कभी भी ढह सकता है मंदिर
लगातार उपेक्षा और देखरेख के अभाव में गढ़िया का प्राचीन शिव मंदिर भी जर्जर हो चुका है। मंदिर की वर्तमान स्थिति ऐसी है कि यह कभी भी ढह सकता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के बावजूद मंदिर के संरक्षण की दिशा में ठोस पहल नहीं की जा रही है। क्षेत्रवासियों ने लंबे समय से गढ़िया शिवालय और उसके ऐतिहासिक शिलालेख को संरक्षित करने की मांग की है।
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