
Bastar Shiva Temple : छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और आदिवासी संस्कृति के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि यहां हजारों साल पुरानी शिव-शक्ति उपासना की समृद्ध परंपरा भी देखने को मिलती है। मान्यता है कि जहां शक्ति का वास होता है, वहां शिव की उपस्थिति भी होती है। इसी आस्था और परंपरा ने बस्तर को एक अनोखी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान दी है। बस्तर की धरती पर नदी, पहाड़ और जंगलों के बीच शिव की आराधना के कई प्रमाण मिलते हैं। प्राचीन काल से ही इस क्षेत्र में शिव और शक्ति की पूजा होती रही है। यही वजह है कि इतिहासकार और पुरातत्व विशेषज्ञ बस्तर को शिव उपासना की महत्वपूर्ण भूमि मानते हैं।
छिंदक नागवंशियों के शासन में मजबूत हुई शैव परंपरा
बस्तर में लंबे समय तक छिंदक नागवंशी राजाओं का शासन रहा। ये शैव मत के अनुयायी थे और भगवान शिव तथा उनके परिवार की पूजा करते थे। इतिहास के अनुसार, वर्ष 1023 ईस्वी में छिंदक नागवंशी शासक नृपतिभूषण ने बारसूर क्षेत्र पर अपना अधिकार स्थापित किया था। इसके बाद करीब 289 वर्षों तक (1023 से 1313 ईस्वी तक) इस क्षेत्र में छिंदक नागवंशियों का शासन रहा। इस दौरान उन्होंने कई शिव मंदिरों और देवी-देवताओं की प्रतिमाओं का निर्माण कराया। आज भी कांकेर से लेकर भद्रकाली और भोपालपट्टनम तक कई स्थानों पर शिव-पार्वती, शिवलिंग, गणेश, कार्तिकेय, स्कंदमाता, भैरव, नंदी और नाग रुद्र जैसी प्राचीन प्रतिमाएं देखने को मिलती हैं।

गांव-गांव में मौजूद हैं प्राचीन मंदिर और प्रतिमाएं
बस्तर की धार्मिक धरोहर में बारसूर का बत्तीसा मंदिर, गणेश मंदिर, दंतेवाड़ा का भैरव मंदिर, नारायणपाल का विष्णु मंदिर, चित्रकोट का विशाल शिवलिंग, समलूर, भैरमगढ़, बस्तर का शिव मंदिर, बोदरागढ़, राजपुर, तुमनार, चंद्रगिरी और तीरथगढ़ जैसे प्रमुख स्थान शामिल हैं। इन स्थानों पर मौजूद मंदिर और मूर्तियां बस्तर की प्राचीन कला, स्थापत्य और धार्मिक आस्था का प्रमाण देती हैं।
उमा-महेश्वर की 72 प्रतिमाएं बनीं आकर्षण का केंद्र
बस्तर में शिव परिवार से जुड़ी कई दुर्लभ प्रतिमाएं मिली हैं, लेकिन इनमें सबसे विशेष स्थान उमा-महेश्वर प्रतिमाओं का है। पूरे क्षेत्र में उमा-महेश्वर की करीब 72 प्रतिमाएं मौजूद हैं। जगदलपुर स्थित जिला पुरातत्व संग्रहालय में ही उमा-महेश्वर की 10 प्राचीन प्रतिमाएं सुरक्षित रखी गई हैं। इसके अलावा चित्रकोट के खाल्हेपारा, बारसूर, दंतेवाड़ा, आसना, बस्तर और पूर्वी टेमरा जैसे क्षेत्रों में भी इन प्रतिमाओं के दर्शन होते हैं।
शिवधाम के रूप में पहचान बना चुका है बस्तर
बस्तर में शिव परिवार से जुड़ी बड़ी संख्या में मौजूद मूर्तियां और मंदिर इस क्षेत्र की प्राचीन धार्मिक परंपरा को दर्शाते हैं। यही कारण है कि बस्तर को शिवधाम के रूप में भी पहचान मिली है। प्रकृति, संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत का संगम बस्तर को देश के अन्य क्षेत्रों से अलग बनाता है।
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