आवश्यकता है…BJP में एक अदद दलित नेता की

Uttar Pradesh politics

वैसे भी पार्टी में अपनों से ज्यादा ‘स्टपनी’ पर भरोसा

अनुप्रिया, संजय, ओमप्रकाश, ब्रजेश सभी के सभी बाहरी

 

                                                                                                                       राकेश तिवारी

Uttar Pradesh politics : उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के कई चौक-चौराहों पर बड़े-बड़े हरफों में एक पोस्टर चस्पा दिख रहा है। ‘क्यों मांगे उधार, जब अपना नेता तैयार।’ पोस्टर में लोक जनशक्ति पार्टी (रामबिलास) के नेता चिराग पासवान उसमें भीड़ के बीचोंबीच अकेले खड़े हैं। वो लोगों से हाथ जोड़े खुद को यूपी की लड़ाई में खुद को झोंकने के लिए तैयार दिख रहे हैं। चर्चा है कि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (BJP) मायावती के हाथ से छिटक रहे दलित वोट बैंक पर एकाधिकार जमाने के लिए एक दलित नेता की तलाश कर रही है। पार्टी के जानकारों का कहना है कि उधार के लोगों पर ज्यादा विश्वास दिखाने वाली BJP बिहारी नेता चिराग पासवान को भी यूपी में लॉंच कर सकती है। शायद यही कारण है कि मायावती और चंद्रशेखर रावण के बाद चिराग की आमद ने यूपी बीजेपी को एक और उम्मीद दी होगी।

गैरों पर करम अपनों पर सितम BJP  की पुरानी आदत

अपने मूल काडर के नेताओं की बजाय दूसरों पर बीजेपी आलाकमान को भरोसा ज्यादा होता है। विनय कटियार, ओमप्रकाश सिंह, रामकुमार वर्मा और स्वतंत्र देव सिंह जैसे धाकड़ नेताओं के बाद भी BJP ने साल 2014 में अपना दल की अनुप्रिया से गठबंधन किया और उनसे लखनऊ से लेकर दिल्ली तक सीट बांटनी पड़ी। अपना दल के कोटे से यूपी में आशीष पटेल जहां काबीना मंत्री हैं, वहीं दिल्ली में खुद अनुप्रिया पटेल केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री की भूमिका निभा रही हैं। जबकि विनय कटियार और ओमप्रकाश सिंह के सुपुत्र अनुराग सिंह कहीं कोने में पड़े आज भी जय श्रीराम के नारे लगाने को मजबूर हैं। भले ही भाजपा शीर्ष नेतृत्व अपना दल में भरोसा दिखा रहा है, लेकिन साल 2024 के लोकसभा चुनाव में एक भी कुर्मी वोट बीजेपी के खाते में नहीं गया।

संजय केवल मछुआरों के ‘भगवान’, बीजेपी के लिए शो ब्वॉय

निर्बल इंडिया शोषित हमारा आम दल यानी निषाद पार्टी के मुखिया संजय निषाद पूर्वांचल के कुछ जिलों के नेता हैं। गोरखपुर, संतकबीरनगर, अम्बेडकरगर के बाहर आजमगढ़, मऊ और बस्ती के कुछ हिस्सों में इनका प्रभाव है। लेकिन ये और इनके दो पुत्र ही पार्टी के आलाकमान हैं और पार्टी के सर्वेसर्वा हैं। गोरखपुर और संतकबीरनगर से संसद तक की यात्रा करने वाले इंजीनियर प्रवीण निषाद अभी खाली हैं तो उन्हीं के हाथों से पार्टी का संचालन हो रहा है। दूसरे बेटे श्रवण निषाद विधायक हैं और गोरखपुर जिले की चौरीचौरा सीट की शोभा बढ़ा रहे हैं। लेकिन इनके खाते में भी BJP ने एक कैबिनेट मंत्रालय दे रखा है। खुद निषादों के ‘भगवान’ संजय निषाद इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं।

मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी ने एक्स पर पर उनकी आरती का वीडियो शेयर किया। सपा हैंडल से पोस्ट हुआ कि स्वयं की आरती उतरवाते स्वयंभू स्वघोषित भगवान बीजेपी सरकार में मंत्री संजय निषाद को देख लीजिए। ये योगी सरकार के मंत्रियों का चाल चरित्र चेहरा है। भगवान में आस्था रखने के बजाय बीजेपी सरकार के मंत्रीगण अब खुद भगवान बन जाने पर उतारू हैं। शर्म आती है कि ऐसे नेता बीजेपी के मंत्री हैं। अब साल 2027 के विधानसभा में संजय निषाद अपना नफा-नुकसान जोड़ते हुए पार्टी के लिए टिकट की मांग रहे हैं।

‘पल्टू राजभर’ भी पूर्वांचल में बीजेपी के बड़े हिस्सेदार

दलित वोटों में सेंधमारी करने का जुगाड़ लगा रही बीजेपी कई नेताओं के मकड़जाल में फंसी हुई है। निषाद पार्टी के बाद राजा सुहेलदेव के पदचिन्हों पर चलने का दंभ भरने वाली सुहेलदेव समाज पार्टी (SBSP) के मुखिया खुद तो काबीना मंत्री हैं, लेकिन अपने बेटे को ‘माननीय’ बनाने के लिए तड़प रहे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में उनके सुपुत्र अरविंद राजभर बुरी तरह से हार गए थे। लेकिन पंचायत जैसे बड़ा महकमा संभालने वाले राजभर के कंधे पर बीजेपी ने पूर्वांचल में दलित वोट जुटाने की जिम्मेदारी दे रखी है। उनके प्रभाव के चलते गाजीपुर, मऊ, बलिया और आजमगढ़ के कई बड़े दलित मूल काडर के नेता दबे हुए पड़े हैं। सोनभद्र के छोटेलाल खरवार, इटावा के अशोक दोहरे और बीजेपी की फायरब्रांड दलित नेता सावित्री बाई फुले भी बीजेपी के खिलाफ कई बार आग उगल चुके हैं। लेकिन बीजेपी आलाकमान को इससे कोई फर्क पड़ता नहीं दिख रहा है। वो अपने साथी नेताओं के सहारे ही पार्टी की नैया पार लगाना चाह रहे हैं।

माया के सहारे दलित वोटरों तक पहुंचने की नाकाम कोशिश

भारतीय जनता पार्टी (BJP) तीन बार यूपी में अपने बहुमत के दम पर बीएसपी सुप्रीमो मायावती को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा चुकी है। दोनों बार पार्टी ने आधा-आधा बंटवारा किया था, लेकिन उनका यह बंटवारा तब जमींदोज हो गया था, जब माया ने भाजपा से राजनीतिक तलाक कर लिया था। साल 2002 में सूबे की राजनीति में नए सियासी रिश्तों के बनने-बिगड़ने का खेल दिखा था। यह वो दौर था, जब सिद्धांतों की शहादत पर सियासत की नई इबारत लिखते हुए BJP  ने तीसरी बार समर्थन देकर उन्हीं मायावती की सरकार बनवा दी, जिनसे वह दो बार धोखा खा चुकी थी। इसी दौर में मुलायम व कल्याण की राजनीतिक दोस्ती व दुश्मनी के नए फलसफे लिखे गए। जो खासे दिलचस्प भी रहे और सिद्धांतों को शूली पर लटकाने की मिसाल भी। दोस्ती दुश्मनी में बदली तो दुश्मनी दोस्ती में।

तीसरी बार BJP- RLD व BSP गठबंधन से मायावती तीन मई 2002 को तीसरी बार प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। वहीं BJP के नेता लालजी टंडन, ओमप्रकाश सिंह, कलराज मिश्र, हुकुम सिंह, रामप्रकाश त्रिपाठी सहित अन्य कुछ नेता उनके मंत्रिमंडल में शामिल हुए। लेकिन मायावती ने मुख्यमंत्री बनते ही ऐसे काम फिर शुरू कर दिए कि भाजपा का बसपा से तीसरा साथ भी लम्बे समय तक नहीं टिका। मायावती ने कुंडा के विधायक रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया को गिरफ्तार कराकर जेल में बंद कर दिया। वर्ष 2003 की शुरुआत ही BJP व BSP के बीच सीधे टकराव से हुई। मायावती ने राजा भैया पर आतंकवाद निरोधक अधिनियम (पोटा) के तहत केस लगा दिया। उसके बाद राजा भैया और धनंजय सिंह सहित 20 विधायकों ने राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री से मिलकर मायावती सरकार को बर्खास्त करने की मांग कर डाली थी। तब से आज तक BJP मायावती से दलित वोटर हड़पना चाहती है, लेकिन तीन बार सत्ता से हाथ धोने के बाद कई बार वोटरों से भी मुंह की खानी पड़ी थी।


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