अमेरिका-ईरान डील:क्या यह सिर्फ इज्जत बचाने की कोशिश है? जानिए एक्सपर्ट्स की बड़ी राय

America Iran deal : हाल ही में United States और Iran के बीच हुए अस्थायी शांति समझौते ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता किसी ठोस जीत या स्थायी समाधान की बजाय सिर्फ एक “स्टेटस रिकवरी” यानी स्थिति को संभालने की कोशिश भर है। वेस्ट एशिया मामलों के जानकारों के अनुसार यह डील जंग से पहले की स्थिति में लौटने जैसा कदम है, जिसमें दोनों देश तनाव कम करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन मूल विवाद अभी भी अनसुलझे हैं। अमेरिका स्थित थिंक टैंक CSIS के विशेषज्ञ विल टॉडमैन के अनुसार इस समझौते का मुख्य उद्देश्य केवल दुश्मनी को कम करना और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को दोबारा खोलना है। यह वही इलाका है जहां से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल और गैस की सप्लाई होती है। इसके बंद होने से वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भारी असर पड़ता है। टॉडमैन का कहना है कि अमेरिका अपने घोषित लक्ष्यों को अब तक हासिल नहीं कर पाया है, जिनके आधार पर सैन्य कार्रवाई की गई थी। इसलिए यह समझौता एक रणनीतिक वापसी जैसा प्रतीत होता है।

60 दिनों की बातचीत बनेगी सबसे अहम चरण

इस डील में सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान 60 दिनों की बातचीत अवधि है। इस दौरान ईरान के परमाणु कार्यक्रम, विशेषकर हाई-लेवल यूरेनियम संवर्धन और स्टोरेज पर चर्चा होगी। यह चरण तय करेगा कि दोनों देश वास्तव में किसी स्थायी समाधान की ओर बढ़ रहे हैं या फिर यह सिर्फ एक अस्थायी शांति है। अगर इस दौरान कोई ठोस सहमति नहीं बनती, तो यह समझौता कमजोर पड़ सकता है।

खाड़ी देशों के साथ रिश्तों में तनाव

विशेषज्ञों के अनुसार इस लंबे संघर्ष ने अमेरिका के खाड़ी देशों के साथ संबंधों पर भी असर डाला है। कई अरब देशों को लगता है कि अमेरिका ने संकट के समय उनके हितों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया। इस वजह से अब ये देश अपनी सुरक्षा रणनीति में बदलाव कर सकते हैं और अन्य वैश्विक शक्तियों के साथ नए साझेदारी विकल्प तलाश सकते हैं। यह बदलाव पश्चिम एशिया की भू-राजनीति को लंबे समय तक प्रभावित कर सकता है।

अमेरिका-इजरायल संबंधों में दरार के संकेत

इस संघर्ष ने अमेरिका और इजरायल के रिश्तों में भी नई चुनौतियां पैदा की हैं। इजरायल को डर है कि यह समझौता ईरान के खतरे को पूरी तरह खत्म नहीं करता। इजरायली नेतृत्व मानता है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम भविष्य में फिर से क्षेत्रीय अस्थिरता पैदा कर सकता है। वहीं दूसरी ओर अमेरिकी नेतृत्व चाहता है कि क्षेत्र में नया युद्ध न बढ़े, ताकि मौजूदा समझौता सुरक्षित रह सके।


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