ईरान युद्ध का असर: मजबूत अर्थव्यवस्था, लेकिन कमजोर प्रबंधन ने बढ़ाई चिंता

नया लुक डेस्क 

ईरान-इजराइल-अमेरिका तनाव के बीच वैश्विक और भारतीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमराई नहीं है, लेकिन मौजूदा हालात ने आर्थिक प्रबंधन की खामियों को उजागर कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार स्थिति की गंभीरता की ओर इशारा करते रहे हैं, लेकिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का हालिया बयान इससे अलग तस्वीर पेश करता है। वित्त मंत्री ने संसद में अर्थव्यवस्था को मजबूत बताते हुए रुपये की गिरावट को अन्य एशियाई देशों की तुलना में सीमित बताया। हालांकि जिस दिन रुपया डॉलर के मुकाबले 95 के स्तर तक पहुंचा, उसी दिन बाजारों में आई गिरावट और आर्थिक दबावों पर सरकार की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है।

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सरकार ने पेट्रोलियम कंपनियों को कीमत बढ़ाने की छूट दी, कमर्शियल गैस महंगी की और टैक्स कटौती वापस लेकर तेल कंपनियों को अतिरिक्त लाभ का रास्ता दिया। पहले यह राजस्व सरकारी खजाने में आता था, जिससे वर्षों में लाखों करोड़ की आय हुई। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि राज्यों के चुनाव न होते, तो अब तक पेट्रोल-डीजल और गैस की कीमतों में और तेज उछाल देखने को मिलता। वहीं, होर्मुज मार्ग से तेल आपूर्ति में कमी, बढ़ा बीमा खर्च और रूस से तेल आयात पर असर ने स्थिति को और जटिल बना दिया है।

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शेयर बाजार, करेंसी बाजार और सर्राफा बाजार-तीनों में अस्थिरता साफ नजर आ रही है। जानकार लंबे समय से भारतीय शेयर बाजार को ओवरवैल्यूड बताते रहे हैं, और मौजूदा गिरावट ने इस आशंका को सही साबित किया है। सरकार और संस्थागत निवेशकों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं, जिन्होंने बाजार को कृत्रिम रूप से ऊंचा बनाए रखा। युद्ध के वैश्विक असर के बावजूद भारत जैसे गैर-प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित देश में ज्यादा गिरावट चिंता का विषय है।

सोना-चांदी का बाजार मुनाफाखोरी और सट्टेबाजी का अड्डा बनता जा रहा है। चांदी की कीमतों में भारी गिरावट आई है, जबकि बाजार में इसकी कमी भी बनी हुई है। इसके बावजूद सरकार द्वारा वायदा बाजार में सख्ती नहीं दिखाना स्थिति को और बिगाड़ रहा है। गैस की कमी के चलते होटलों और रेस्तरां के मेन्यू बदल रहे हैं, खाने-पीने की चीजें महंगी हो रही हैं और कई उद्योग सीधे प्रभावित हो रहे हैं। इसका असर आम लोगों के घरेलू बजट पर भी साफ दिखने लगा है।

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सरकारी एजेंसियां अब सक्रिय जरूर हुई हैं, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यह तैयारी पहले होनी चाहिए थी। युद्ध के शुरुआती संकेतों के बावजूद समय पर रणनीति नहीं बन पाई, जिससे हालात और बिगड़े। करेंसी बाजार में रुपये को संभालने की कोशिश अब शुरू हुई है, लेकिन तब तक काफी नुकसान हो चुका है। अर्थव्यवस्था के कुछ मजबूत क्षेत्र सरकारी नियंत्रण से बाहर या हाशिये पर हैं, जबकि राजकोषीय अनुशासन ही एकमात्र सकारात्मक पहलू नजर आता है।

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