बालेन शाह,रवि लामिछाने और सुदन गुरूंग के फोटो वाले पोस्टर और बैनर से पटा पूरा काठमांडू शहर सार राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी का जन्म अभी पिछले चुनाव में ही हुआ है। पहली मर्तबा चुनाव में उत्तरी इस पार्टी को 20 सीटें हासिल हुई थी। इस बार के चुनाव में इस पार्टी की सुनामी थी जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री व माओवादी नेता पुष्प कमल दहाल उर्फ प्रचंड को छोड़कर पुरानी पार्टियों के सारे धुरंधर नेता धराशाई हो गए। देखा जाए तो नेपाल के लोकतांत्रिक इतिहास में सर्वथा पहली बार किसी पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनने जा रही है। बालेन सरकार के मंत्रिमंडल को लेकर नेपाल के पड़ोसी देशों में भी उत्सुकता देखी जा रही है। अपेक्षाकृत राजनीतिक रूप से बिल्कुल ही अपरिपक्व बालेन सरकार नेपाल के लिए क्या कुछ कर पाती है, यह देखना दिलचस्प होगा।
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उमेश चन्द्र त्रिपाठी
काठमांडू!नेपाल में 27 मार्च को गठन होने जा रही नई सरकार को लेकर नेपाली जनता में उत्सुकता का माहौल है। इसी के साथ हर वर्ग में आशा और विश्वास भी है। चारों ओर चर्चा है कि अब नेपाल को परिवर्तन की अनुभूति होगी। मायूसी और निराशा के बादल छटेंगे। अबकी बार बालेन सरकार का नारा हर तरफ गुंजायमान है। राष्ट्रपति राम चंद्र पौड़ेल नवनियुक्त प्रधानमंत्री और मंत्रियों को शपथ ग्रहण कराएंगे। काठमांडू में जगह-जगह बालेन शाह, रवि लामिछाने और सुदन गुरुंग के पोस्टर लगाए हैं। अंतरिम सरकार को प्रधानमंत्री सुशीला कोइराला नई सरकार को सत्ता सौंपने की तैयारी में व्यस्त हैं। प्रधानमंत्री और मंत्रियों के शपथ से पहले आज सभी सांसदों का शपथ ग्रहण होगा। गौरतलब है कि नेपाल करीब चार सौ सालों तक राजशाही के अधीन था। पृथ्वी नारायण शाह को नेपाल का जनक माना जाता है। राजशाही से मुक्ति के लिए राजनीतिक दलों ने यदा-कदा जनांदोलन जरूर चलाया लेकिन इसमें कामयाबी 2008 में जनयुद्ध नाम से चले हिंसक आंदोलन के बाद मिली।
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माओवादी नेता प्रचंड और उनके सहयोगियों के नेतृत्व में सालों साल चले इस आंदोलन में करीब 17 हजार लोग मारे गए। राजा समर्थक राजनेताओं और जमीदारों के घर तक जलाए गए। उनकी हत्याएं की गई। इस भारी खून खराबा से घबराए तत्कालीन नरेश ज्ञानेंद्र ने सत्ता त्यागने की घोषणा की। कहना न होगा नेपाल को लोकतंत्र के सूर्योदय के लिए भारी कीमत चुकानी पड़ी। 2008 में हुए संविधान सभा के चुनाव में अपूर्ण बहुमत के बावजूद प्रचंड प्रधानमंत्री बने लेकिन नौ माह बाद ही उन्हें सत्ता छोड़ने को मजबूर होना पड़ा। उसके बाद 2026 में संपन्न हुए चुनाव तक नेपाल को अस्थिर और गठबंधन सरकार का बोझ ढोने को मजबूर होना पड़ा। इस दौरान करीब 13 प्रधानमंत्री आए गए लेकिन नेपाल जस का तस रहा। भ्रष्टाचार इस स्तर तक चरम पर पहुंच गया कि सत्ता और विपक्ष के शीर्ष नेताओं तक के हाथ इसमें सने हुए मिले। नेपाली जनता खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगी। भ्रष्ट सरकारों की श्रृंखला में केपी शर्मा ओली अंतिम प्रधानमंत्री साबित हुए जिसे दुनिया ने देखा कि किस तरह जेन-जी आंदोलनकारियों ने भारी अपमान के बीच सत्ता छोड़ने को मजबूर किया। इसके अलावा अन्य दूसरी पार्टियों के वरिष्ठ नेता भी किस कदर भागकर अपनी जान बचा पाए, यह भी दुनिया ने देखा। किसी सरकार के प्रति जनता गुस्सा करती है तो उसका क्या हाल होता है, नेपाली जनता ने यह कर दिखाया।
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बहरहाल उसके बाद नेपाल में अंतरिम सरकार का गठन हुआ फिर छह महीने बाद चुनाव हुआ और इस चुनाव में सर्वथा पहली बार नेपाल को पूर्ण बहुमत की सरकार नसीब हुई। दरअसल नेपाली जनता को राजशाही से असल मुक्ति अब महसूस हुई, लेकिन अनुभूति होना अभी बाकी है। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी यानी जिस पार्टी की सरकार सत्तारूढ़ होने जा रही है, उससे जनता को बहुत ज्यादा उम्मीद है। इस उम्मीद पर खरा उतरना यद्यपि कि आसान नहीं है, लेकिन नई सरकार यदि पचास प्रतिशत ही जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतर पाई तो यह बड़ी कामयाबी होगी। नई सरकार का मुखिया बालेन शाह का ही बनना तय है। इस पद को लेकर चल रही कयासबाजी और शंका आशंका सब निर्मूल है। बालेन मंत्रिमंडल में फिलहाल उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के अध्यक्ष रवि लामिछाने होंगे। जेन जी आंदोलन के नायक सुदन गुरूंग का भी मंत्री बनना तय माना जा रहा है। तराई जो सरकार में अहम भागीदारी से अछूता रह जाता रहा, यहां से भी कम से कम चार मंत्री होंगे। काफी संभावना है भारतीय सीमा से सटे नेपाल के कपिलवस्तु जिले से सांसद चुने गए पूर्व पुलिस अधिकारी विक्रम सिंह थापा को बालेन शाह सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालय मिल सकता है। विक्रम सिंह थापा राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी से सांसद चुने गए हैं। बालेन मंत्रिमंडल में क्षेत्र और जाति संतुलन पर विशेष ध्यान होगा। बालेन मंत्रिमंडल में अपेक्षाकृत युवा चेहरे भी होंगे। इसे लेकर पार्टी के भीतर मंथन चल रहा है।
