जेडीयू में निशांत की एंट्री परिवारवाद या सियासी जरूरत?

अजय कुमार

बिहार की राजनीति में कभी-कभी ऐसे मोड़ आते हैं जो केवल एक व्यक्ति की एंट्री नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक ढांचे की दिशा बदलने की क्षमता रखते हैं। जनता दल यूनाइटेड में निशांत कुमार का औपचारिक प्रवेश भी ऐसा ही एक क्षण है। लंबे समय तक राजनीति से दूरी बनाए रखने वाले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे का पार्टी की सदस्यता लेना महज पारिवारिक घटना नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक युग के अंत और दूसरे युग की शुरुआत का संकेत भी माना जा रहा है जिसमें जेडीयू की पहचान पूरी तरह नीतीश कुमार के व्यक्तित्व से जुड़ी रही है। करीब दो दशकों तक बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार निर्णायक भूमिका में रहे। 2005 में जब उन्होंने सत्ता संभाली तो राज्य की पहचान अव्यवस्था, अपराध और कमजोर बुनियादी ढांचे से जुड़ी हुई थी। उसके बाद सड़क, बिजली, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण जैसे क्षेत्रों में कई योजनाएं लागू की गईं। पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण, साइकिल योजना और छात्रवृत्ति कार्यक्रम जैसे फैसलों ने उन्हें “सुशासन बाबू” की छवि दी। 2010 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू ने 115 सीटें जीतकर अपने राजनीतिक चरम को छुआ था। लेकिन समय के साथ समीकरण बदले। 2020 के चुनाव में पार्टी 43–45 सीटों तक सिमट गई। हालांकि 2025 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू ने लगभग 85 सीटें जीतकर वापसी की, फिर भी यह स्पष्ट हो गया कि पार्टी की ताकत अब पहले जैसी नहीं रही।इसी पृष्ठभूमि में निशांत कुमार का राजनीति में आना महत्व रखता है। 40 वर्ष के इंजीनियर निशांत अब तक सार्वजनिक जीवन से दूर रहे। उनका स्वभाव अंतर्मुखी बताया जाता रहा है और वे लंबे समय तक आध्यात्मिक रुचियों में व्यस्त रहने के कारण भी चर्चा में रहे। ऐसे व्यक्ति का अचानक सक्रिय राजनीति में उतरना स्वाभाविक रूप से जिज्ञासा और संदेह दोनों पैदा करता है। लेकिन राजनीति में अक्सर परिस्थितियां व्यक्ति को आगे धकेल देती हैं। जेडीयू भी उसी दौर से गुजर रही है जहां संगठन को भविष्य का चेहरा चाहिए।

नया लुक के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें  

ये भी पढ़ें

मिडिल ईस्ट में जंगः इजरायल का दावा, मर गया खामनेई

बिहार की राजनीति में क्षेत्रीय दलों का अनुभव बताता है कि जब कोई पार्टी लंबे समय तक एक नेता पर निर्भर रहती है तो उसके बाद नेतृत्व का संकट पैदा हो जाता है। राष्ट्रीय जनता दल में लालू प्रसाद यादव के बाद तेजस्वी यादव का उभार इसी कारण हुआ। समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव के बाद अखिलेश यादव का नेतृत्व सामने आया। तमिलनाडु में करुणानिधि के बाद एम.के. स्टालिन ने पार्टी संभाली। इन उदाहरणों से यह भी स्पष्ट है कि पारिवारिक उत्तराधिकार भारतीय राजनीति की एक स्वीकृत वास्तविकता बन चुका है। यही वजह है कि नीतीश कुमार, जो वर्षों तक परिवारवाद की आलोचना करते रहे, अंततः उसी रास्ते पर चलते दिखाई दिए।जेडीयू का सामाजिक आधार भी इस निर्णय को समझने में मदद करता है। पार्टी की ताकत मुख्यतः कुर्मी, कोइरी और अति पिछड़ा वर्ग के वोटों पर टिकी रही है। 2010 के चुनाव में जेडीयू-भाजपा गठबंधन को लगभग 39 प्रतिशत वोट मिले थे, जिसमें जेडीयू का बड़ा हिस्सा इन वर्गों से आया। लेकिन पिछले कुछ चुनावों में यह आधार धीरे-धीरे खिसकने लगा। भाजपा का प्रभाव बढ़ा और कई इलाकों में उसका संगठन जेडीयू से ज्यादा मजबूत होता गया। राजनीतिक विश्लेषण बताते हैं कि बिहार में भाजपा का वोट प्रतिशत 2010 के लगभग 16–17 प्रतिशत से बढ़कर हाल के वर्षों में 25 प्रतिशत के आसपास पहुंच गया है। ऐसे में जेडीयू के सामने दोहरी चुनौती है अपना सामाजिक आधार बचाना और गठबंधन की राजनीति में अपनी पहचान बनाए रखना।यहीं पर निशांत कुमार की भूमिका अहम हो सकती है। जेडीयू के भीतर यह धारणा बन रही है कि अगर पार्टी के पास नीतीश कुमार के परिवार से कोई चेहरा रहेगा तो संगठन में एकजुटता बनी रहेगी। क्षेत्रीय दलों के इतिहास में यह अक्सर देखा गया है कि करिश्माई नेता के बाद पार्टी बिखर जाती है। बिहार में भी कई छोटे दल इसी कारण खत्म हो गए। इसलिए जेडीयू के नेताओं को लगता है कि निशांत की मौजूदगी कम से कम पार्टी को एक धुरी दे सकती है।

नया लुक के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें  

ये भी पढ़ें

आजम का समय खराब तो अखिलेश का नये चेहरे पर दांव

हालांकि चुनौतियां कम नहीं हैं। बिहार की राजनीति में गठबंधन की प्रकृति बेहद जटिल है। भाजपा और जेडीयू का रिश्ता पिछले डेढ़ दशक में कई बार टूटा और जुड़ा है। 2013 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को लेकर दोनों दल अलग हुए। 2017 में फिर साथ आए। 2022 में जेडीयू ने महागठबंधन का रास्ता चुना और 2024 में एक बार फिर एनडीए में लौट आई। इन उतार-चढ़ावों ने जेडीयू के कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच भी असमंजस पैदा किया। अगर भविष्य में भाजपा बिहार में अपना मुख्यमंत्री चेहरा आगे बढ़ाती है तो जेडीयू का राजनीतिक महत्व और घट सकता है।निशांत कुमार को इसी परिस्थिति में अपनी पहचान बनानी होगी। उनके सामने पहला काम संगठन को मजबूत करना होगा। जेडीयू के पास आज भी कई अनुभवी नेता हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश की पहचान क्षेत्रीय स्तर तक सीमित है। यदि युवा नेतृत्व को आगे लाकर संगठन में नई ऊर्जा भरी जाती है तो पार्टी को लाभ हो सकता है। बताया जा रहा है कि युवा विधायकों और करीबी सहयोगियों की एक टीम पहले से तैयार की जा रही है जो राजनीतिक प्रशिक्षण और रणनीति में निशांत की मदद करेगी।इतिहास बताता है कि राजनीति में शुरुआती छवि अंतिम नहीं होती। ओडिशा के नवीन पटनायक इसका उदाहरण हैं। 1997 में जब वे राजनीति में आए थे तो उन्हें भी अनुभवहीन और संकोची कहा जाता था। लेकिन कुछ ही वर्षों में उन्होंने अपनी शैली विकसित की और 24 साल तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे। बिहार की परिस्थितियां अलग जरूर हैं, पर यह भी सच है कि राजनीति में धैर्य और समय बहुत कुछ बदल देते हैं।

नया लुक के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें  

ये भी पढ़ें

क्यों हो रही है योगी की छवि धूमिल करने की राजनीति

फिलहाल निशांत कुमार के सामने सबसे बड़ी कसौटी यही है कि वे खुद को केवल “नीतीश कुमार के बेटे” से आगे साबित करें। अगर वे संगठन में संवाद बढ़ा सके, सामाजिक आधार को मजबूत कर सके और गठबंधन की राजनीति में संतुलन बना सके तो जेडीयू को नई दिशा मिल सकती है। लेकिन अगर वे केवल प्रतीकात्मक नेता बनकर रह गए तो पार्टी के भीतर खींचतान बढ़ना तय है।बिहार की राजनीति हमेशा व्यक्तित्वों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और अब तेजस्वी यादव इन सभी ने अपने-अपने दौर में राज्य की राजनीति को दिशा दी है। निशांत कुमार का राजनीतिक सफर अभी शुरू हुआ है। यह कहना जल्दबाजी होगी कि वे अपने पिता की विरासत संभाल पाएंगे या नहीं। लेकिन इतना तय है कि उनकी एंट्री ने बिहार की राजनीति में एक नई बहस और नई प्रतीक्षा जरूर पैदा कर दी है। आने वाले वर्षों में यह साफ होगा कि यह कदम जेडीयू को स्थिरता देगा या पार्टी को एक नए संघर्ष के दौर में ले जाएगा।

नया लुक के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें  

Spread the love

मुंबई
Crime News homeslider Maharastra National

घर पर टूटा कहर, एक साथ कुनबा साफ़

बिरियानी खाने से एक परिवार के चार लोगो की मौत मोहल्ले में पसरा मातम, सकते में प्रशासन मुंबई। मुंबई के पायधुनी इलाके में एक ही परिवार के चार सदस्यों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत से हड़कंप मच गया है। बताया जा रहा है कि शनिवार रात बिरयानी खाने और उसके बाद तरबूज खाने के कुछ […]

Spread the love
Read More
परशुराम
homeslider Religion

परशुराम द्वादशी आज: जानें पूजा विधि व शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व

राजेन्द्र गुप्ता हर वर्ष वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को परशुराम द्वादशी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के छठवें अवतार परशुराम जी की पूजा की जाती है। परशुराम द्वादशी व्रत भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम को समर्पित है। वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी […]

Spread the love
Read More
Horoscope
Astrology homeslider

मंगलवार के दिन इन राशियों को मिलेगा कारोबार में बड़ा लाभ…जानें आज का राशिफल

ये बात सौ फीसदी सच है कि जीवन कर्म के हिसाब से चलता है, पर ये भी इतना ही सच है कि ग्रहों का साथ और इसकी दिशा-दशा भी आपके उतार-चढ़ाव, सफलता और कारोबार को आगे बढ़ाने में मदद करती हैं। ग्रहों की दिशा और दशा बदलती रहती है और उसी हिसाब से भविष्य फल […]

Spread the love
Read More