राजेन्द्र गुप्ता
हिंदू धर्म में होली को केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि आनंद, प्रेम और भक्ति का महापर्व माना जाता है। जहां देश के अधिकतर हिस्सों में होली फाल्गुन मास की पूर्णिमा को दिन मनाई जाती है, वहीं ब्रजमंडल में इस उत्सव की शुरुआत बसंत पंचमी से ही हो जाती है। यहां होली का रंग पूरे 40 दिनों तक भक्तिभाव और उल्लास के साथ बिखरा रहता है। ब्रज की होली अपनी अलग-अलग परंपराओं के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है, लेकिन इनमें सबसे अनोखी और आकर्षक होली बरसाना और नंदगांव में खेली जाने वाली लट्ठमार होली मानी जाती है।
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लड्डू होली और राधा सखी का नंदगांव निमंत्रण
इस दिन सुबह राधा सखी रथ पर सवार होकर ढोल-ताशों और जयकारों के साथ नंदगांव जाएंगी। वहां नंदबाबा मंदिर में श्रीकृष्ण को होली खेलने का निमंत्रण देंगी। शाम को बरसाना के लाडलीजी मंदिर में विश्व प्रसिद्ध लड्डू होली होगी। सेवायत पांडे बनकर समाज गायन करेंगे और भक्तों पर टनों अबीर-गुलाल के लड्डू बरसाएंगे। यह होली पूरी तरह प्राकृतिक रंगों से खेली जाती है और हजारों भक्त इसमें शामिल होते हैं।
लट्ठमार होली का धार्मिक महत्व
ब्रज क्षेत्र में मनाई जाने वाली लट्ठमार होली एक बहुत ही खास और अनोखी परंपरा है। इस होली में नंदगांव के पुरुष और बरसाना की महिलाएं मिलकर भाग लेती हैं। होली के दिन महिलाएं पारंपरिक कपड़ों में घूंघट ओढ़कर पुरुषों पर प्रतीक के रूप में लट्ठ चलाती हैं, जबकि पुरुष ढाल लेकर खुद को बचाते हैं। इस उत्सव में सिर्फ रंग और गुलाल ही नहीं होते, बल्कि चारों ओर भजन-कीर्तन, ढोल-नगाड़ों की आवाज़ और नाच-गाने से माहौल भक्तिमय हो जाता है। लट्ठमार होली का यह पर्व खुशी और मस्ती के साथ-साथ भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी के प्रति गहरी श्रद्धा और भक्ति को भी दर्शाता है।
