राजेन्द्र गुप्ता
भारतीय संस्कृति की रचना का श्रेय हिंदू धर्म के ऋषियों और महात्माओं को ही दिया जाता है। इन्हीं में से एक महान ऋषि हुए हैं याज्ञवल्क्य और आज उनकी जयंती है। वह ब्रह्मज्ञानी थे, महान अध्यात्मिक वक्ता, योगी थे। इन्हीं के जन्म दिवस को याज्ञवल्क्य जयंती के रूप में प्रतिवर्ष मनाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं में ऋषि याज्ञवल्क्य को ब्रह्मा का अवतार माना जाता है। मान्यता है कि भगवान सूर्य की कृपा से इन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। जीवन के सातवें वर्ष में ही याज्ञवल्क्य ने अपने मामा वैशंपायन से शिक्षा ग्रहण करके समस्त वेदों के बारे में ज्ञान प्राप्त कर लिया था।
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वैवाहिक जीवन : युवावस्था में महर्षि याज्ञवल्क्य का विवाह कात्यायनी नामक युवती से हो गया था और इस विवाह से इन्हें एक पुत्र हुआ कात्यायन। उसके बाद ऋषि मित्र की कन्या मैत्रेयी से भी इनका विवाह हुआ था। उसके बाद कात्यायनी और मैत्रेयी बहनों की तरह प्यार से जीवन व्यतीत करने लगीं। महर्षि याज्ञवल्क्य को ‘वाजसनी’ भी कहा गया है, क्योंकि प्रतिदिन भोजन, दान के बाद ही अन्नग्रहण करते थे।
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ऐसे प्राप्त हुआ वेदों का ज्ञान
एक बार उन्होंने कठोर जप और तप करके सूर्यदेव को प्रसन्न कर लिया। सूर्यदेव ने प्रसन्न होकर उन्हें वरदान मांगने को कहा तो याज्ञवल्क्य ने कहा कि मुझे आपसे यजुर्वेद का ज्ञान प्राप्त करना है। सूर्यदेव का निवेदन स्वीकार करके मां सरस्वती याज्ञवल्क्य के मुख में प्रविष्ट हुईं। जैसे ही देवी सरस्वती उनके मुख में आईं तो उनके पूरे शरीर में जलन होने लगी और वह जलाशय में कूद गए। यह देखकर सूर्यदेव प्रकट हुए और उन्होंने आश्वासन दिया कि इस पीड़ा के समाप्त होते हैं कि याज्ञवल्क्य के मस्तिष्क में समस्त वेदों का ज्ञान समा जाएगा। सूर्यदेव के जाते ही ऐसा हुआ और याज्ञवल्क्य संपूर्ण वेदों के ज्ञाता बन गए। इसके बाद याज्ञवल्क्य ने अपने जीवन में कई महत्वपूर्ण रचनाएं लिखीं। इनकी कृतियों में शुक्ल यजुर्वेद संहिता, याज्ञवल्क्य स्मृति, याज्ञवल्क्य शिक्षा, प्रतिज्ञा सूत्र, शतपथ ब्राह्मण, योगशास्त्र आदि का विशेष महत्व है।
