योगी सरकार का स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से सवाल, आप क्यों लिखते हैं शंकराचार्य

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अजय कुमार                               
अजय कुमार

प्रयागराज में चल रहे माघ मेले के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और मेला प्रशासन के बीच विवाद ने नया मोड़ ले लिया है। मेला प्राधिकरण ने उन्हें शंकराचार्य पद के उपयोग पर नोटिस जारी कर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया है, जिससे संत समाज में हलचल मच गई है।  माघ पूर्णिमा पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपनी शोभायात्रा लेकर संगम स्नान के लिए पहुंचे थे, लेकिन प्रशासन ने उन्हें रोका।

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उनके शिष्यों के साथ कथित धक्का मुक्की और मारपीट के आरोप लगे, जिसके बाद वे बिना स्नान किए लौट आए और धरने पर बैठ गए। स्वामी ने प्रशासन पर लठैतों और गुंडों का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया, जबकि मेलाधिकारी ऋषिराज ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के 14 अक्टूबर 2022 के आदेश के तहत उन्हें शंकराचार्य प्रोटोकॉल नहीं दिया जा सकता। नोटिस में ज्योतिष पीठ शंकराचार्य पद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रहे केस का जिक्र है, जिसमें स्वामी को पद का दावा करने से रोका गया है।

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यह विवाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के पुराने संघर्षों की याद दिलाता है। 2022 में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद उनकी वसीयत से ज्योतिषपीठ शंकराचार्य घोषित हुए, लेकिन अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद और अन्य संन्यासी अखाड़ों ने इसे नियमों के खिलाफ बताकर अस्वीकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने भी उन्हें नया शंकराचार्य बनाने पर रोक लगा दी, फिर भी वे ज्योतिर्मठ का प्रतिनिधित्व करते रहे। 2015 में वाराणसी में गणेश विसर्जन के लिए गंगा स्नान की मांग पर हाईकोर्ट के आदेश तोड़ने पर पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज किया, जिसमें वे घायल हुए। राजनीतिक मोर्चे पर भी स्वामी विवादों से अछूते नहीं रहे। 2024 में अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण ठुकरा दिया, इसे आधा-अधूरा बताते हुए पीएम मोदी की आलोचना की। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर निर्माण में मूर्तियों के अपमान पर ‘मंदिर बचाओ यात्रा’ निकाली और मोदी सरकार पर निशाना साधा। पिछले साल प्रयागराज महाकुंभ में भगदड़ कांड पर सीएम योगी आदित्यनाथ का इस्तीफा मांग लिया।

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माघ मेले का यह नया नोटिस संत समाज और प्रशासनिक तनाव को बढ़ा रहा है। स्वामी ने कहा कि वे मेला क्षेत्र में रहेंगे लेकिन शिविर में प्रवेश नहीं करेंगे, जब तक माफी न मांगी जाए। कांग्रेस जैसे राजनीतिक दलों ने इसे संत अपमान बताया है। स्वामी का इतिहास बताता है कि वे धार्मिक परंपराओं और राजनीतिक हस्तक्षेप के खिलाफ मुखर रहते हैं, जो बार-बार विवादों को जन्म देता है। मामला सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर निर्भर करता दिख रहा है, जबकि मेला जारी है।

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