
- कई विदेशी गाड़ियों का है काफिलाः पोर्शे, डिफेंडर सभी बाबा के बेड़े में शामिल
- योगी के सबसे विश्वस्त लोगों की सूची में शुमार है इनका नाम….

बड़ी-बड़ी जटाएं। गेरूआ वस्त्र। चेहरे पर त्याग और वैराग्य की साफ-साफ झलक। तेज और ओज इतना कि बरबस लोग देखने को मजबूर ऊपर से चेहरे पर शानदार मुस्कराहट। ये प्लेन से नहीं चलते हैं, प्राइवेट जेट से ये यात्रा करते हैं। ये कोई बिजनेसमैन, नौकरशाह या जज नहीं है, भारत देश के संत हैं। नाम है सतुआ बाबा। इनके शिष्य इन्हें जगदगुरु सतुआ बाबा कहते हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के काफी करीबी इन्हें कहा जाता है। लकदक गाड़ियां, चमकती कारों से सजा इनका काफिला देखकर हर कोई दंग हो जाता है। प्रयागराज के माघ मेले में भले ही सतुआ बाबा ने खुद ऊंट की सवारी की, लेकिन उनके पीछे चल रही डिफेंडर पर सभी की नजरें बार-बार अटक जाती थीं। माघ मेले में यह युवा संत अपनी तीन करोड़ रुपये वाली लैंड रोवर व डिफेंडर कार की वजह से चर्चा में छाए हुए हैं। जगतगुरु महामंडलेश्वर संतोष दास उर्फ सतुआ बाबा ने माघ मेला परिसर में इस कीमती कार में बैठकर इंट्री की। युवा संत सतुआ बाबा वैसे तो बिल्कुल तरीके से जीवन यापन करते हुए दिखते हैं।
खबरों के मुताबिक सतुआ बाबा की डिफेंडर कार का उत्तराखंड में रजिस्टर्ड है। कार का रजिस्ट्रेशन हरिद्वार में कराया गया है। कार पर ‘विष्णु स्वामी जगतगुरु सतुआ बाबा काशी’ लिखा हुआ है। उनकी कहानी काफी मजेदार है। उत्तर प्रदेश के ललितपुर के संतोष तिवारी ने 11 साल की उम्र में घर-द्वार छोड़ा और अध्यात्म के रास्ते पर निकल गए, इसलिए उनका नाम संतोष तिवारी से संतोष दास हो गया। जैसे हर कोई अपने करियर में सीढ़ी दर सीढ़ी आगे बढ़ता है, ऐसे ही संतोष दास भी बढ़े। वो विष्णु सम्प्रदाय से जुड़े और यमुनाचार्य महाराज की मौत के बाद संतोष दास को सतुआ पीठ का प्रमुख बना दिया गया। पीठाधीश्वर बने तो संतोष दास को लोग जगतगुरु महामंडलेश्वर सतुआ बाबा कहने लगे। संतोष तिवारी के सतुआ बाबा बनने की कहानी बिल्कुल अजय सिंह बिष्ट के योगी आदित्यनाथ बनने जैसी है। बस दोनों का सम्प्रदाय अलग हैं। गौरतलब है कि योगी आदित्यनाथ नाथ सम्प्रदाय से ताल्लुक रखते हैं और गोरक्षनाथ पीठ के पीठाधीश्वर हैं।

बताया जाता है, एक संत थे रणछोड़ दास। गुजरात से आए थे और बनारस के मणिकर्णिका घाट पर भूखे लोगों को सत्तू खिलाते थे इसलिए उनकी पीठ का नाम सतुआ पीठ पड़ गया था। उसी पीठ के प्रमुख अब संतोष दास उर्फ सतुआ बाबा हैं। सतुआ बाबा सीएम योगी के सबसे भरोसेमंद बताए जाते हैं। वो उनके साथ साए की रहते हैं, लेकिन लाइमलाइट से दूर। लेकिन माघ मेले में सतुआ बाबा का तीन करोड़ की डिफेंडर लेकर पहुंचना, और चर्चा में आना। सीएम योगी जैसे ही सतुआ बाबा के आश्रम गए वो चर्चा में आ गए। उसके बाद उन्हें और चर्चित किया यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने। उन्होंने प्रयागराज डीएम पर कटाक्ष करते हुए कहा था कि सतुआ बाबा की रोटियां बेलने की बजाय काम पर ध्यान दो।

इन तीन बातों के क्या मायने हैं? ‘सम्प्रदायों’ में अपने भरोसेमंद आदमी को गद्दी सौंपने की परंपरा रही है तो जैसा अनुमान लगाया जा रहा है कि योगी आदित्यनाथ को 29 में दिल्ली की गद्दी मिल सकती है तो फिर योगी यूपी की गद्दी किसे सौंपेंगे? कहीं वो नाम सतुआ बाबा का तो नहीं। राजनीति के जानकार कहते हैं कि बाबा होने के साथ-साथ संतोष तिवारी ब्राह्मण हैं, अब योगी आदित्यनाथ उनको साथ रखकर एक तीर से दो निशाने साध रहे हैं। एक तरफ वो ब्राह्मणों को अपने पक्ष में करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं, वहीं साधु-संत की अपनी परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए भी सतुआ बाबा को साध रहे हैं।

