वाहवाही का चक्कर और महज एक पत्र, ब्राह्मणों के शत्रु बन गए पंकज

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मनोज श्रीवास्तव


लखनऊ। बहुत सारे लोगों का मानना है कि भाजपा के नव निर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने अपनी सांगठनिक अनुभवहीनता के चलते जाने-अनजाने बड़ी राजनैतिक अदावत मोल ले लिया। जो उनको अपना चेला बताते रोज माला-मिठाई का सत्कार उठा रहे हैं, वह ये नहीं समझा सकते हैं, कि मंथन करके विषयों पर टिप्पणी करिये। जो लोग टीम बन जाने तक हर नये अध्यक्ष की परिक्रमा को ही कार्यकर्ताओं के पराक्रम का आधार बना देते हैं क्या वह भी कुछ नहीं बता पा रहे हैं।या अनुभवहीनता के कारण सात बार के सांसदी, डिप्टी मेयर, सभासद व प्रदेश कार्यसमिति का सदस्य से सीधे प्रदेश अध्यक्ष होने के घमंड में प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी सबको धता बता दे रहे हैं। क्या वह किसी की सुनते ही नहीं? अपनी पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने बताया था कि वह आज तक ” हमेशा सबको साथ लेकर चले हैं, अपनी साफगोई व सहजता के चलते वे यह भी बोल दिये थे कि वह दंद-फंद वाले नेता नहीं हैं। बताते हैं उस दिन उनको प्रेस कॉन्फ्रेंस में उतारने से पहले उनकी बहुत तैयारी करवायी गयी थी। कुछ लोग यहां तक अस्वाशन दे दिये थे कि हम जो सवाल चाहते हैं वही पूछा जाता है।

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उन्होंने राजधानी की पत्रकारिता को न सिर्फ अपने प्रभुता के अधीन बता दिया था, बल्कि कुछ बड़े चैनल और बड़े अखबार व अपने सर्किल के लोगों से अध्यक्ष की व्यक्तिगत भेंट करवा के अपनी ताकत का प्रदर्शन भी करके दिखा दिया था। उसके कारण भी अध्यक्ष जी निश्चिंत थे। चूंकि सात बार सांसद रहे,वह चुनावी राजनीति के धुँधर हैं, अपने सिस्टम से अधिक से अधिक लोगों को सीधे संपर्क में साधा और तीर निशाने पर मार दिया। चुनाव जीत गये।उनके इसी भोला पन को इर्द-गिर्द के लोग अपना हथियार बना कर उनको छलनी कर रहे हैं। जिस अध्यक्ष को सांगठनिक अनुभव न के बराबर है उन्हें समझाने का काम किसका है? फिर वही फिक्स उत्तर, जो गॉड फादर बन कर बधाई उठा रहे हैं या जो गणेश बन कर सेवा दे रहे हैं। सब अपना-अपना साध रहे हैं, उनकी मुश्किलों का कोई अनुमान ही नहीं लगा पा रहा है। जो कार्य उन्हें गुपचुप तरीके से पटाक्षेप करना था उसका इतना विभत्स स्वरूप कैसे बन गया।

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भोजपुरी में एक प्रसिद्ध लोकायुक्त है “एक हाथ कपड़ा, दुई हाथ जरि गै, टोपी भर कै बचि गै”। अभी भी टोपी भर का कपड़ा बच गया इसी की प्रसन्नता की व्याख्या में सब डूबे हैं, मुझे ऐसा लगता है कि एकाएक इतनी बड़ी मात्रा में हो रही अपनी चमचागिरी की चकाचौंध ने अध्यक्ष जी का मन-मस्तिष्क इतना सुन्न कर दिया है कि कोई दो हाथ जल जाने का दर्द अनुभव ही नहीं होने दे रहा।न स्वयं ही वह इस जलन की अनुभूति कर पा रहे हैं। अभी भी वक्त है। सब लोग जल्दी से जिम्मेदार लोगों के साथ बैठ कर तय करिये कि आगे क्या रणनीति तैयार करनी चाहिये। आज की तारीख में पंकज चौधरी से जो भी अच्छा-बुरा होगा उसके उत्तरदायी सब लोग होंगे। उनसे कोई भी जुबानी-रूमानी गलती होगी, उनसे वैचारिक, सामाजिक, व्यक्तिगत, सांगठनिक किसी भी प्रकार से जुड़ा व्यक्ति अपने मन के सवालों से बच नहीं पायेगा। कि जिस समय किसी भी परिस्थिति में जब कोई मामला ही नहीं बनता था तब किसके रणनीति ने बिना विषय के विषयुक्त माहौल बना दिया? यह वह संगठन है जहां आपके उठने-बैठने-बोलने-करने के अलावा बहुत कुछ विषयों का प्रशिक्षण दिया जाता है।

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पंकज चौधरी जिस ब्राह्मण समाज के समर्थन से सात बार सांसद बने, बहुत बड़ा वर्ग आज उन्हें उसी ब्राह्मण समाज का दुश्मन बनाने का षड्यंत्र बुनने की कोशिश में हैं। आश्चर्यजनक तो यह है कि जिनका राजनैतिक संस्कार ही सार्वजनिक रूप से ब्राह्मणों को अपमानित करने का है, वह भी ब्राह्मण वर्ग को सम्मानित करने का ऑफर चला रहे हैं। केंद्र का मार्गदर्शन मिला या देश-प्रदेश के किसी पूर्व अध्यक्ष का, कल समाधान कितना ही सुंदर निकल जाये लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पूर्वांचल ही नहीं प्रदेश की राजनीति में पंकज चौधरी की बनी ब्राह्मण विरोधी छवि को धुलने में बहुत ताकत लगानी पड़ेगी। पार्टी के भीतर के सामान्य विषय को सनसनी बना कर मीडिया में परोसने वालों के गुनाह की भरपाई की कीमत बहुत चुकानी पड़ेगी।

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अभिवावक के सिंघासन पर बैठने वाले व्यक्ति को स्वार्थी सलाहकारों ने पार्टी बना दिया। कम से कम तीन वर्ष इनको हर दिन इसकी भरपाई करनी पड़ेगी। जानकारों का दावा है कि अब इनको ब्राह्मण पदाधिकारियों की संख्या बढ़ानी ही नहीं पड़ेगी बल्कि उन्हें प्रभावशाली दायित्वों से लैस करना पड़ेगा। जिस तरह सार्वजनिक वक्तव्यों में उनसे बड़ी-बड़ी चूक हो रही है और वह बुरी तरह ट्रोल हो जा रहे हैं इसकी जिम्मेदारी किसी पर तय करनी पड़ेगी। स्वयं अध्यक्ष व उनके लाइव मार्गदर्शक इससे बच नहीं सकते। जब उनको विभिन्न राजनैतिक दलों के राष्ट्रीय अध्यक्ष पर निशाना साधना था तब वह प्रदेश अध्यक्षों को निशाना बना कर खुद शिकार हो गये। परिवादी दलों के गुलाम उनकी बात को लेकर उड़ गये। फिलहाल अभी बहुत कुछ है। ऐसे दलों जिसके माई-बाप एक ही परिवार के लोग हैं उनकी अम्मा कितने दिन खैर मनायेंगीं। पंकज चौधरी उन राष्ट्रीय अध्यक्षों को फिर से निशाना बनावें जो अपनी जाति, अपने समाज, अपने प्रदेशों में अपनी समझ-संस्कार-संगठक क्षमता से नहीं बल्कि संतान होने कीमत वसूल रहे हैं।इसका उत्तर देने में चमचों को चक्कर आ जायेगा।

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भाजपा की तरफ से अभी तक यह साफ ही नहीं हो पाया कि पंकज चौधरी का संदेश पार्टी के कुछ विधायकों के लिये था, ब्राह्मण समाज के लिये नहीं। चूंकि पंकज चौधरी के अध्यक्षीय कार्यकाल के आरंभ में ही यह सवाल उठा तो उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व से मार्गदर्शन लेकर संगठन हित में यह कदम उठाया।पार्टी का यह सिद्धांत सभी जातियों के लिये है। परिस्थितियों को भुनाने के लिये ऐसे लोग ब्राह्मणों को सम्मान का निमंत्रण दे रहे हैं जिनकी पूंजी ही ब्राह्मणों को सार्वजनिक अपमानित करके खड़ी हुई है।भाजपा जल्द ही डैमेज कंट्रोल कर लेगी लेकिन उनका राजनैतिक भविष्य अंधकारमय हो जायेगा जो अपने मतलब से अपना परिवारवादी चेहरा पीडीए की आड़ में छुपा रहे हैं।इससे पहले वरिष्ठ, अनुभवी नेताओं के साथ विमर्श कर संगठन को विस्वास में लेकर चलने का अभ्यास करना पड़ेगा।पंकज चौधरी को यह जल्दी ही समझना पड़ेगा कि चुनाव में अपने और अपनों को चिन्हित करके विजय प्राप्त करना आसान होता है। संगठन में तो कार्यकर्ताओं पर विस्वास ही आपके सफलता की कुंजी बनेगी।यह लोकसभा, जिले या कमिश्नरी का कुंआ-तालाब नहीं, अब आप अथाह कार्यकर्ताओं का समुद्र में उतर चुके हैं। समर्थकों को भी जल्दी समझ में आ जायेगा कि किसी भी कारण से जिस मुद्दे पर पल भर के लिये पार्टी बैकफुट पर दिखायी पड़ रही है, जल्द ही वह इसी विषय पर बड़े हमले के साथ विपक्ष को फिर ढेर करेगी।

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