Headline

दिल्ली‑NCR की हरियाली और सुरक्षा की ढाल अरावली पर्वतमाला को बचाने की निर्णायक लड़ाई

Untitled 12 copy 14
अजय कुमार

दिल्ली‑NCR और आसपास के क्षेत्रों की पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए अरावली पर्वतमाला हमेशा से ही एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। यह न केवल वायु और जल संरक्षण में योगदान देती है, बल्कि वर्षा जल के ग्राउंड वाटर में प्रवाह को बनाए रखने और मिट्टी कटाव को रोकने का भी कार्य करती है। वर्षों से विभिन्न राजनीतिक दलों, बिल्डरों और अधिकारियों की कोशिशें इस प्राकृतिक ढाल को कमजोर करने की रही हैं। हरियाणा और राजस्थान की जमीन पर अरावली की भूमि को रियल एस्टेट और खनन के लिए खोलने की कई योजनाएं बनती रही हैं, लेकिन पर्यावरणविदों, सुप्रीम कोर्ट और NCR प्लानिंग बोर्ड ने अपने सख्त फैसलों से इसे बचाया है। अगर ये फैसले नहीं होते, तो आज दिल्ली और आसपास के शहरों में अरावली पर हाई‑राइज बिल्डिंगें खड़ी होतीं और पर्यावरणीय संकट और गंभीर रूप ले चुका होता। हरियाणा में फरीदाबाद और गुड़गांव के आसपास अरावली का बड़ा हिस्सा आता है। पिछले वर्षों में राज्य सरकारों ने कई बार इस भूमि को वन क्षेत्र की परिभाषा से बाहर करने की कोशिश की, ताकि बिल्डरों को फायदा पहुँच सके। NCR प्लानिंग बोर्ड ने दिसंबर 2017 में फरीदाबाद क्षेत्र की 17,000 एकड़ भूमि को वन भूमि के दायरे से बाहर करने का प्रस्ताव खारिज कर दिया। बोर्ड ने स्पष्ट किया कि अरावली का दायरा केवल हरियाणा और राजस्थान तक सीमित नहीं होगा, बल्कि पूरे NCR क्षेत्र में इसे मान्यता दी जाएगी। इस निर्णय से अरावली पर्वतमाला को छेड़छाड़ और विनाश से बचाया गया। DRDO के लिए जमीन बेचने का मामला भी अरावली की संवेदनशीलता को दर्शाता है। फरीदाबाद नगर निगम ने रक्षा मंत्रालय को 407 एकड़ जमीन बेच दी, जो पंजाब भूमि संरक्षण अधिनियम की धारा 4 और 5 के तहत आती थी।

ये भी पढ़े

तिरुवनंतपुरम में सत्ता परिवर्तन 45 साल का वाम राज खत्म भाजपा के हाथ नगर निगम

इस अधिनियम के अनुसार, किसी भी गैर-वन गतिविधि पर रोक लगती है। नगर निगम ने शर्त रखी थी कि DRDO पर्यावरण मंजूरी स्वयं लेगा। सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी और पर्यावरण मंत्रालय ने निर्माण की अनुमति नहीं दी, जिससे संरक्षित पहाड़ी में निर्माण को रोका गया। भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक ने भी इस अविवेकपूर्ण फैसले के लिए रक्षा मंत्रालय की फटकार की दरअसल, DRDO ने फरवरी 2004 में 700 एकड़ जमीन खरीदने की प्रक्रिया शुरू की थी, जिसे अगस्त 2005 में बढ़ाकर 1,100 एकड़ कर दिया गया। बाद में DRDO ने वन भूमि को गैर-वन उपयोग के लिए डायवर्ट करने का प्रयास किया, लेकिन नवंबर 2005 में क्षेत्रीय वन संरक्षक ने बताया कि यह भूमि वन क्षेत्र में आती है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुसार, इसे गैर-वन उपयोग के लिए केंद्र से मंजूरी लेना आवश्यक था। मई 2007 में DRDO ने अपनी जरूरत घटाकर 407 एकड़ कर दी और नगर निगम ने जमीन आवंटित करने की स्वीकृति दी। अप्रैल 2008 में DRDO ने जमीन पर कब्जा किया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी ने अनुमति नहीं दी। हुड्डा सरकार द्वारा मांगर क्षेत्र में यूरोपियन टेक्नॉलोजी पार्क के लिए 500 एकड़ भूमि को मंजूरी देने का मामला भी अरावली संरक्षण का उदाहरण है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने इस परियोजना पर रोक लगा दी थी। 2012 में मांगर डेवलपमेंट प्लान-2031 के मसौदे में 23 गांवों की 10,426 हेक्टेयर भूमि शामिल थी, लेकिन NCR प्लानिंग बोर्ड ने वन क्षेत्र को बचाने के लिए इसकी मंजूरी देने से मना किया। इस तरह कांग्रेस सरकार की कई कोशिशें नाकाम रही और बाद में आने वाली बीजेपी सरकार की नीतियों पर भी सुप्रीम कोर्ट और पर्यावरणविदों ने निगरानी रखी। हरियाणा विधानसभा ने 27 फरवरी 2019 को पंजाब भूमि संरक्षण (हरियाणा संशोधन) विधेयक पास किया, जिससे अरावली क्षेत्र की लगभग 60,000 एकड़ वन भूमि रियल एस्टेट और खनन के लिए खोली जा सकती थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगाई और पर्यावरणविदों की चिंता को सही ठहराया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जंगलों को खत्म नहीं किया जा सकता और PLPA के तहत आने वाली भूमि को ‘वन’ माना जाना चाहिए।हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अरावली की नई परिभाषा जारी की, जिसमें केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊँचाई वाले हिस्सों को पहाड़ माना जाएगा। इस फैसले से छोटे ढलानों की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि छोटे‑छोटे ढलान भी पानी रिचार्ज, हवा की शुद्धता और मिट्टी कटाव को रोकने में महत्वपूर्ण हैं। यदि इन्हें संरक्षण से बाहर किया गया, तो न केवल दिल्ली‑NCR की हवा प्रदूषित होगी, बल्कि पानी की कमी और धूलभरी हवाओं में भी वृद्धि होगी। राजस्थान और हरियाणा में जनता और पर्यावरण संगठनों ने विरोध प्रदर्शन और आंदोलन शुरू कर दिया है। NSUI  जैसे छात्र संगठन और नागरिक समाज की संस्थाएं “अरावली बचाओ पैदल मार्च” जैसी गतिविधियों का आयोजन कर रही हैं। लोगों का कहना है कि अरावली केवल एक पहाड़ नहीं है, बल्कि यह जीवन, जल, हवा और जैव विविधता का घर है। इसे खोखला करने का प्रयास आने वाली पीढ़ियों के लिए गंभीर संकट पैदा करेगा। अरावली की सुरक्षा पर अब देश की राजनीति, न्यायपालिका और आम जनता की नजरें टिक चुकी हैं। सरकार का कहना है कि कोई नया खनन पट्टा जारी नहीं होगा और सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में भूमि का प्रबंधन किया जाएगा।

ये भी पढ़े

कर्नाटक का एंटी-हेट बिल नफरत रोकने की मंशा या अभिव्यक्ति पर सियासी शिकंजा?

पर्यावरणविदों और जनता का कहना है कि परिभाषा में बदलाव से संरक्षण कमजोर हो सकता है। इस बीच कोर्ट ने कई प्रस्तावों को रद्द किया है, जो वन भूमि को गैर-वन घोषित करने का प्रयास करते थे।अरावली पर्वतमाला का संरक्षण अब एक निर्णायक जंग बन चुका है। यह केवल भूमि और वन्य जीवन का मामला नहीं है, बल्कि यह हमारे पर्यावरण, सामाजिक सुरक्षा और भविष्य की पीढ़ियों के जीवन से जुड़ा हुआ है। अगर अरावली की रक्षा नहीं हुई, तो वायु प्रदूषण, जल संकट और जैव विविधता संकट का सामना दिल्ली‑NCR और आसपास के राज्यों को करना पड़ेगा। इसलिए अरावली का मामला न केवल पर्यावरण सुरक्षा का प्रतीक है, बल्कि यह न्याय, नीति और सार्वजनिक हित की परीक्षा भी है। जनता, सरकार, न्यायपालिका और पर्यावरणविदों का ध्यान इस पर टिका है कि कैसे इस प्राकृतिक ढाल को बचाया जाए। आने वाले समय में यह संघर्ष भारत के भविष्य के लिए निर्णायक सिद्ध होगा।अरावली को बचाने के लिए संघर्ष केवल आज की राजनीति का विषय नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों, किसानों, शहरों और ग्रामीण इलाकों की जीवन-रेखा की रक्षा का प्रतीक है। यही वजह है कि देशभर की निगाहें अब इस पर्वतमाला पर टिकी हैं, ताकि दिल्ली‑NCR और आसपास के क्षेत्रों में एक स्वस्थ, सुरक्षित और स्वच्छ पर्यावरण सुनिश्चित हो सके।

Hong Kong
homeslider Technology

हांगकांग में खुली रोबोट वाली दुकान, बिलिंग से लेकर सामान सजाने तक करते हैं काम

Hong Kong: टेक्नोलॉजी की दुनिया में तेजी से हो रहे बदलावों के बीच हांगकांग से एक अनोखी खबर सामने आई है। यहां एक ऐसा कन्वीनियंस स्टोर शुरू किया गया है, जहां दुकान के रोजमर्रा के काम इंसानों के बजाय ह्यूमनॉइड रोबोट संभाल रहे हैं। स्टोर में सामान व्यवस्थित करने से लेकर ग्राहकों के ऑर्डर और […]

Read More
Chhath Mahaparv
Entertainment homeslider

बॉलीवुड में पहली बार छठ की भव्य झलक, ‘द वैन’ में दिखेगी बिहार की संस्कृति

Chhath Mahaparv: हिंदी सिनेमा में त्योहारों को बड़े पर्दे पर भव्य अंदाज में दिखाने का चलन काफी पुराना है। होली, दिवाली और लोहड़ी जैसे पर्व फिल्मों की कहानियों का हिस्सा बन चुके हैं। अब पहली बार बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में विशेष आस्था रखने वाले महापर्व छठ पूजा को भी बड़े स्तर पर दर्शकों […]

Read More
National Religion

‘हरे कृष्ण’ का जाप करता रहा शख्स, नौ दिन बाद मिली नई जिंदगी

‘हरे कृष्ण’ जाप से नहीं टूटा हौसला Sanjay Sah Rescue: नेपाल में त्रिशूली-3A हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की सुरंग में आई भीषण बाढ़ के बाद नौ दिनों तक फंसे दो कर्मचारियों को आखिरकार सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। इनमें 30 वर्षीय संजय साह भी शामिल हैं। रेस्क्यू के बाद उन्होंने बताया कि सुरंग के अंदर मुश्किल हालात […]

Read More