नया लुक ब्यूरो
पूर्व डीजीपी प्रशांत कुमार (1990 बैच IPS) को उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग का अध्यक्ष बनाया जाना अब सिर्फ प्रशासनिक फैसला नहीं रहा, यह केंद्र बनाम प्रदेश की राजनीति का खुला संकेत बन गया है। डीजीपी पद से जून में रिटायर हुए प्रशांत कुमार को तीन साल का कार्यकाल देकर योगी सरकार ने बता दिया कि भरोसा किस पर है। गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने योगी आदित्यनाथ की इच्छा के बावजूद प्रशांत कुमार और मनोज सिंह को सेवा विस्तार नहीं दिया।
संदेश साफ था लेकिन यूपी सरकार ने भी उतनी ही साफ़ भाषा में जवाब दे दिया। जिन अफसरों को दिल्ली से हरी झंडी नहीं मिली, उन्हें लखनऊ ने सत्ता और सिस्टम के केंद्र में बैठा दिया। उच्च और माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन आयोग का विलय कर नया आयोग बनाना और उसकी कमान एक कड़े प्रशासक को सौंपना, यह सिर्फ शिक्षा सुधार नहीं बल्कि राजनीतिक रणनीति भी है। यह नियुक्ति बताती है कि योगी सरकार अब फैसले दिल्ली देखकर नहीं, ज़मीनी जरूरत और अपने राजनीतिक विज़न के हिसाब से कर रही है।
राजनीतिक गलियारों में इसे अमित शाह को सीधी चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है एक तरह से यह संदेश कि “प्रदेश सरकार सिर्फ आदेश मानने वाली नहीं, दिशा तय करने वाली भी है।” केंद्र और प्रदेश एक ही पार्टी के होते हुए भी जब आमने-सामने दिखें, तो समझिए मामला साधारण नहीं है। यह नियुक्ति आने वाले दिनों में पावर बैलेंस की नई लकीर खींच सकती है और दिल्ली को यह एहसास दिला सकती है कि यूपी अब सिर्फ मैदान नहीं, निर्णय का केंद्र है।
