ईयू-इंडिया FTA : साल के अंत तक फाइनल हो सकती है डील

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नई दिल्ली। भारत और यूरोपियन यूनियन (ईयू) ने इस साल के अंत तक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर बातचीत पूरी करने और इन्वेस्टमेंट प्रोटेक्शन एग्रीमेंट तथा जियोग्राफिकल इंडिकेशन पर एग्रीमेंट पर बातचीत में तेजी लाने की अपनी साझा इच्छा को फिर से दोहराया है। विदेश मंत्रालय ने 25 नवंबर को एक आधिकारिक बयान में यह जानकारी दी। विदेश मंत्रालय ने हाल ही में ब्रसेल्स में आयोजित 11वीं इंडिया-ईयू फॉरेन पॉलिसी और सिक्योरिटी कंसल्टेशन तथा 6वीं स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप रिव्यू मीटिंग की जानकारी साझा करते हुए बताया कि मीटिंग में दोनों पक्षों के बीच रिश्तों के पूरे दायरे का मूल्यांकन किया गया और ‘इंडिया-ईयू स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप : ए रोडमैप टू 2025’ को लागू करने का रिव्यू किया गया, जो इस साल पूरा हो रहा है।

इस दौरान दोनों पक्षों ने ईयू-इंडिया रिश्तों में बहुत सकारात्मक रफ्तार का स्वागत किया, जिसमें फरवरी में कॉलेज ऑफ कमिश्नर्स का भारत का ऐतिहासिक दौरा, जून में एचआरवीपी कैलास और विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर द्वारा ब्रुसेल्स में आयोजित पहली ईयू-भारत रणनीतिक वार्ता तथा सितंबर में ईयू द्वारा भारत पर रणनीतिक एजेंडा पर संयुक्त संचार को अपनाना शामिल है। मंत्रालय ने कहा चर्चा में कई टॉपिक शामिल थे, जिनमें इकोनॉमिक सिक्योरिटी, मजबूत सप्लाई चेन, ट्रेड और इन्वेस्टमेंट, ग्लोबल गेटवे, इंडिया-ईयू कनेक्टिविटी पार्टनरशिप और इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (आईएमईसी) शामिल थे। साथ ही इनोवेशन, साइंस और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में सहयोग, एजुकेशन एवं रिसर्च में लोगों के बीच संपर्क को गहरा करने के मौके भी शामिल थे।

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दोनों पक्षों ने एफटीए पर अंतिम वार्ता को तेजी से आगे बढ़ाने के साथ ही मल्टीलेटरल लेवल पर सहयोग और सप्लाई चेन डाइवर्सिफिकेशन सहित इकोनॉमिक मुद्दों पर लगातार बातचीत के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने इंडिया-ईयू ट्रेड एंड टेक्नोलॉजी काउंसिल (टीटीसी) में हुई प्रोग्रेस पर भी ध्यान दिया। बता दें कि यह ट्रेड डील मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रणाली की अस्थिरता को देखते हुए भारत के लिए काफी मायने रखती है। ईयू भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। वित्त वर्ष 2023-24 में भारत-ईयू का द्विपक्षीय व्यापार 135 अरब अमेरिकी डॉलर था। एफटीए लागू होने पर भारतीय निर्यातकों के लिए यूरोपीय बाजार में शुल्क बाधाएं कम होंगी और निवेश प्रवाह में वृद्धि होगी। सप्लाई चेन अधिक स्थिर होंगी और रक्षा और टेक्नोलॉजी साझेदारी भी मजबूत होगी। दोनों पक्ष वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को स्थिर बनाने तथा व्यापारिक जोखिमों को कम करने की सामूहिक रणनीति पर भी काम कर रहे हैं।

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