उत्पन्ना एकादशी आज है जानिए शुभ तिथि व पूजा विधि और महत्व

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राजेन्द्र गुप्ता

मार्गशीर्ष माह के कृष्णपक्ष की ग्यारस को भगवान विष्णु से एकादशी तिथि प्रकट यानी उत्पन्न हुई थीं। इस लिए इसे उत्पन्ना एकादशी कहते हैं। एकादशी ने समस्त देवगणों की मुj नामक राक्षस से रक्षा की थी, इसलिए श्रीविष्णु ने उन्हें वरदान दिया। भगवान विष्णु को एकादशी तिथि बहुत प्रिय है। ऐसा कहा जाता है कि जो एकादशी के दिन व्रत करता है, उसे श्रीहरि की कृपा मिलती है। भगवान्‌ श्रीकृष्ण कहते हैं कि युधिष्ठिर! भगवान विष्णु से वर पाकर महात्रता एकादशी बहुत प्रसन्न हुई। पुराणों में लिखा है कि दोनों पक्षों की एकादशी समान रूप से कल्याण करने वाली है। इसमें शुक्ल और कृष्ण का भेद नहीं करना चाहिए। दोनों एकादशी एक समान हैं, और दोनों में व्रत करना चाहिए।

उत्पन्ना एकादशी तिथि कब और पारण कब होगा?

जो मानव हर समय एकादशीके माहात्म्यका पाठ करता है, उसे पुण्य फल प्राप्त होता है। एकादशीके समान पापनाशक व्रत दूसरा कोई नहीं है। इस साल एकादशी पर उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र और विष्कुंभ योग का संयोग बन रहा है। इस साल एकादशी तिथि15 नवम्बर 2025 को 12:49 आधी रात को एकादशी तिथि शुरू होगी और अगले दिन 16 नंवबर को रात को 02:37 ए एम बजे समाप्त होगी। इसका पारण 16 नवंबर को 01:10 पी एम से 03:18 पी एम पारण तिथि के दिन किया जाएगा। इस दिन हरि वासर 09:09 ए एम बजे तक है।

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उत्पन्ना एकादशी व्रत की पूजा विधि

एकादशी के नियम एक दिन पूर्व से ही शुरू हो जाते हैं। यही वजह है कि अगर आप एकादशी का व्रत रखना चाहते हैं तो एकादशी से एक दिन पहले एक समय भोजन करना चाहिए। वहीं शाम के समय चावल या तामसिक भोजन से बचना चाहिए। व्रत के दिन सुबह उठकर स्नान के बाद भगवान ध्यान जरूर करें। पीले वस्त्र धारण कर भगवान श्रीविष्णु की विधि-विधान से पूजा करें।

उत्पन्ना एकादशी महत्व

हर एकादशी का अलग-अलग महत्व बताया गया है। मार्गशीर्ष में आने वाली एकादशी तिथि को मुर राक्षस योग निद्रा में लीन भगवान विष्णु पर प्रहार करने वाला था, तभी देवी एकादशी प्रकट हुईं और उन्होंने मुर से युद्ध किया और उसका अंत कर दिया। इस दिन देवी एकादशी की उत्पत्ति हुई, इस वजह से इस एकादशी को उत्पन्ना एकादशी कहा गया, जो लोग एकादशी व्रत का प्रारंभ करना चाहते हैं, वे उत्पन्ना एकादशी से एकादशी व्रत शुरू कर सकते हैं। भगवान विष्णु की कृपा से पाप मिटते हैं और जीवन के अंत में उनके  चरणों में स्थान मिलता है।

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