सामूहिकता में विश्वास करती थीं आयरन लेडी इंदिरा गाँधी

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डॉ. कन्हैया त्रिपाठी
प्रो. कन्हैया त्रिपाठी

 (लेखक राष्ट्रपति के विशेष कार्य अधिकारी रह चुके हैं और केंद्रीय विश्वविद्यालय पंजाब में चेयर प्रोफेसर हैं।)

  • शहादत दिवस पर विशेष स्मरण 

देश आज इंदिरा गाँधी को स्मरण कर रहा है। आज ही के दिन इंदिरा गाँधी की शहादत हुई थी। भारत को अपने तरह से समझने और विकसित करने वाली गाँधी ने अपने होने का एहसास केवल भारत को नहीं अपितु पडोसी देशों व विश्व के बहुत से देशों को भी करवाया था। उनकी अपनी देश के प्रति निष्ठा, ईमानदारी, दूरदर्शिता की मिसाले बहुत से देश दिया करते थे और अब भी उनकी आत्मशक्ति व निर्णयशक्ति को लोग स्मरण करते हैं। उनके सुप्रसिद्ध शब्द आज भी पूरा भारत स्मरण करके सोचता है और गाँधी की प्रशंसा करता है। वे शब्द थे मैं आज यहां हूं, हो सकता है कि कल मैं यहां न रहूं…मुझे चिंता नहीं…मेरा पूरा जीवन अपने लोगों की सेवा में बीता है, और मैं अपनी आखिरी सांस तक ऐसा करती रहूंगी। जब मैं मरूंगी तो मेरे खून का एक-एक कतरा भारत को मजबूत करने में लगेगा। इन शब्दों के साथ 30 अक्टूबर, 1984 को भुवनेश्वर, ओडिशा में थीं और उसके अगले दिन यानि 31 अक्टूबर, 1984 को उनकी हत्या कर दी गयी।

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गाँधी के विचार बहुत ही असरदार थे। वह एक दिन पूर्व कैसे ऐसा बोल सकती थीं, यह उनको पूर्वाभास कैसे हुआ, आज भी सभी लोग सोचने को बाध्य होते हैं, हमें स्मरण आ रहा है इसी के साथ के नटवर सिंह के भी शब्द। उन्होंने कहा था कि जब सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, तब उन्हें हमसे छीन लिया गया। उस दिन मेरे जीवन से बहार चली गई, लेकिन उसकी यादें ज़िंदा हैं और साथ ही उसकी हत्या से एक दिन पहले कहे गए उसके दिल को झकझोर देने वाले, भविष्यसूचक, भाग्यसूचक शब्द भी। वह अपने पैरों पर खड़ी होकर मरीं। ज़ाहिर है उन्हें अपनी मौत का पूर्वाभास हो गया था कि अगर मेरी मौत हिंसक होती है, जैसा कि कुछ लोग आशंका जता रहे हैं और कुछ लोग साजिश रच रहे हैं, तो मुझे पता है कि हिंसा हत्यारे के विचारों और कार्यों में होगी, मेरे मरने में नहीं, क्योंकि कोई भी नफ़रत इतनी गहरी नहीं है कि वह मेरे लोगों और मेरे देश के प्रति मेरे प्यार की सीमा को ढक सके, कोई भी ताकत इतनी मज़बूत नहीं है कि मुझे मेरे उद्देश्य और इस देश को आगे ले जाने के मेरे प्रयास से विचलित कर सकें। इसे पार्लियामेंट ने एक पुस्तक में प्रकाशित भी किया।

अब समय बदल गया है। अब विचार लोगों के बदलते जा रहे हैं। अब लोगों के भीतर हिंसा व मृत्यु के डर हैं। गाँधी भी डर सकती थीं और अपने आपको जैसे चाहतीं, बचा सकती थीं लेकिन वह न डरीं न खुद को बचाने का यत्न कीं। वह यही प्रयास करती रहीं कि जो उन्हें मारने की सोच रहे हैं, वे पुनर्विचार करें। वे सुधर जाएँ। वे सही रास्ते पर आ जाएँ। वे किसी हत्या के विचार त्याग दें। आजकल भारत की पूर्व प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी को स्मरण करने से लोग कतराते हैं। उस त्यागी आत्मा के पुण्यस्मरण से लोग खुद को बचाते हैं। यह वही देश है जिस देश के नागरिक गाँधी पर गर्व करते थे और उन्हें आयरन लेडी के रूप में व्याख्यायित करते थे। इतने कम समय में लोग गाँधी के स्मरण करने से इस तरह से कतराएंगे, यह कल्पना से परे की बात है। सत्ता और पार्टी के लिए किसी महापुरुष व महानविभूति को अपनी स्मृतियों से निकाल देने वाले इस भारत को यह नहीं भूलना चाहिए कि जब इंदिरा गाँधी जी ने बंगलादेश को एक अलग देश का दर्ज़ा दिलवाया था और पाकिस्तान के टुकड़े कर दिए थे तो उन पर भारतीय लोगों को गर्व था। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि विपरीत परिस्थितियों में भी इंदिरा जी ने देश का परमाणु परीक्षण करवाया और देश को गर्व की अनुभूति करवाया।

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अब 31 अक्टूबर को लोग इंदिरा गाँधी के नाम पर एकत्रित नहीं होना चाहते। संस्थानों में कार्यरत लोग गाँधी पर कोई परिचर्चा नहीं करना चाहते बल्कि वे अब सम्मिलित होते हैं सरकार प्रायोजित सरदार पटेल के जन्म दिवस को मनाने के लिए। समय बदलते ही सभ्यतागत रूप से बदलाव कर चुका भारतीय जनमानस को आखिर हुआ क्या है, समझ में नहीं आता। देश के प्रथम उप प्रधान मंत्री व गृह मंत्री के जन्मदिन को अवश्य मनाना चाहिए लेकिन इंदिरा गाँधी की शहादत तिथि पर उन्हें भी याद करना चहिए। स्टैच्यू ऑफ यूनिटी भारत के प्रथम उप प्रधानमंत्री तथा प्रथम गृहमंत्री वल्लभभाई पटेल को समर्पित एक स्मारक है। यह भारतीय राज्य गुजरात में स्थित है। गुजरात के इस स्थल पर और अपने अपने स्थान पर 31 अक्टूबर को सरदार पटेल के जन्मदिवस के मौके पर स्मरण करना चाहिए, यह भी एक बड़े पैमाने पर किया जाना चाहिए लेकिन गाँधी को भूलकर या उन्हें अवॉयड करके कोई भी आयोजन ठीक नहीं लगता। वैसे आज आचार्य नरेंद्रदेव का भी जन्मदिन है। वह एक समाजवादी राजनेता के रूप में लोगों के मानस में अंकित हैं। उन्हें भी स्मरण करना चाहिए।

आज जब देश में मेरे और तुम्हारे में बंटे देश के महासपूत व महान महिलाएं देखने का चलन आ गया तो ऐसे देश में एकीकरण की कोई संभावना नहीं दिखती। यह समझना ज़रूरी है कि देश के लिए, देशहित में और भारत के भविष्य के निर्माण में अपने पूर्वजों का विशेष योगदान है। उनके बनायीं हुई नींव पर हम भारत के विकास की बात आज कर पा रहे हैं। इसलिए कम से कम एक बात पर सभी को एकमत होना चाहिए कि हमारे देश में जिन्होंने भी योगदान दिया है, उन्हें हम सब मिलकर स्मरण करेंगे और उनके अच्छे कार्यों की प्रशंसा करते हुए उसे आगे की पीढ़ी तक ले जाने का प्रयास करेंगे।

इंदु से इंदिरा बनने की उनकी महान यात्रा को हम जब भी स्मरण करें निःसंदेह भारत के प्रथम प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा लिखित इंदिरा जी के नाम पत्र को पढ़ना चाहिए, जहाँ यह पता चलता है कि एक पिता द्वारा इंदिरा गाँधी को शिक्षाएं कैसी मिली थी। इसके बाद हमें इंदिरा जी के संपूर्ण जीवन का अवलोकन करना चाहिए और समझना चाहिए। सब पढ़कर ऐसा लगेगा कि इंदिरा गाँधी का जीवन बहुत ही रचनात्मक और संवेदनशील रहा है जो केवल भारत के लिए जिया और जिसने भारत को केवल बनाने का कार्य किया।

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परमाणु कार्यक्रम, बांग्लादेश मुक्ति, पर्यावरण कार्यक्रम, अंतरिक्ष मुक्ति, हरित क्रांति व बैंक राष्ट्रीयकरण जैसे अभूतपूर्व कार्य करने वाली इंदिरा गाँधी कहा करती थीं कि हमारे युवाओं के लिए यह ज़रूरी है कि वे साहस, दृढ़ संकल्प और दृढ़ता रखें ताकि किसी अवसर को आकर्षित किया जा सके और जब वह आए तो उसका भरपूर लाभ उठाया जा सके। वर्ष 2008 के लिए शांति, निरस्त्रीकरण और विकास हेतु इंदिरा गांधी पुरस्कार प्रदान करते समय निवर्तमान राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटील एक अभिभाषण दिया था। उनके साथ मुझे भी कार्य करने का अवसर मिला राष्ट्रपति भवन में इसलिए उनके शब्द याद आते हैं। श्रीमती पाटील ने कहा था कि दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का मानना था कि राष्ट्र तभी समृद्ध होंगे जब वे आपस में सद्भावना से रहेंगे। उनका इस विचार में अटूट विश्वास था कि संपूर्ण मानवता का भाग्य एक है, और विश्व में शांति और पृथ्वी ग्रह पर जीवन को बनाए रखने के लिए सभी को सामूहिक रूप से मिलकर काम करना चाहिए। आज गाँधी के शहादत दिवस पर प्रतिभा देवीसिंह पाटील के अच्छे शब्दों का बरबस स्मरण हो आता है। हमें भारत को आगे ले जाना है और विश्व में स्थापित करना है तो निःसंदेह सामूहिक रूप से मिलकर काम करके हम इसे आगे ले जा सकते हैं और उस महान आत्मा को शांति पहुंचा सकते हैं।

 

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