नेपाल के 36 साल के युवक सुदन गुरुंग ने बिना हथियार के 24 घंटे में उखाड़ फेंकी केपी शर्मा ओली की सरकार

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  • दुनिया के इतिहास में कभी ऐसा नहीं हुआ

उमेश चन्द्र त्रिपाठी

काठमांडू। नेपाल की राजनीति अब उस मोड़ पर पहुंच चुकी है जहां प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के त्यागपत्र के बाद राष्ट्रपति रामचंद्र पौड़ेल ने सुशील कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाते हुए संसद को भंग कर दिया। बता दें कि नेपाल में प्रदर्शन उस वक्त शुरू हुआ जब सरकार ने चार सितंबर को अचानक फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप, यूट्यूब और एक्स समेत 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बैन लगा दिया। जिसके बाद काठमांडू में संसद के बाहर निकले छात्रों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन शुरू किया, जिसने जल्द ही हिंसक रूप ले लिया। पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी थी, जिसमें 19 छात्रों की मौत हो गई और 300 से ज्यादा लोग घायल हो गए थे। हालात काबू से बाहर होते ही गृह मंत्री रमेश लेखक ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया और सेना को संसद और अन्य प्रमुख इलाकों में सेना तैनात करना पड़ा। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने हिंसा के पीछे “घुसपैठियों” को जिम्मेदार ठहराया था। उन्होंने अपनी सरकार बचाने की काफी कोशिश की, लेकिन अंत में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।

नेपाल में चल रहे इस अभूतपूर्व जनांदोलन के केंद्र में हैं 36 साल के सुदन गुरुङ। जो “हामी नेपाल” नाम के एक एनजीओ के अध्यक्ष हैं। ये एनजीओ युवाओं के लिए काम करता है। सुदन ने सोशल मीडिया पर प्रदर्शन की रूपरेखा शेयर करते हुए छात्रों से स्कूल यूनिफॉर्म और किताबें लेकर आने की अपील की थी, जिससे यह आंदोलन अहिंसक प्रतिरोध का प्रतीक बन सके। गुरुङ की पहल से शुरू हुई रैलियां इतनी तेजी से फैलीं कि सोशल मीडिया ब्लैकआउट और इंटरनेट प्रतिबंधों के बावजूद युवाओं की भीड़ सड़कों पर उमड़ आई। संसद भवन की बैरिकेडिंग तोड़कर प्रदर्शन कारी अंदर घुसने लगे, जिसके बाद सरकार के आदेश पर पुलिस ने छात्रों को निशाना बनाकर फायरिंग की। जिसमें 19 छात्रों की जान चली गई।

सुदन गुरुङ का जीवन भी इस आंदोलन जितना ही नाटकीय रहा है। कभी एक इवेंट ऑर्गेनाइजर रहे गुरुङ की जिंदगी उस वक्त पूरी तरह से बदल गई, जब 2015 के विनाशकारी भूकंप में उन्होंने अपने बच्चे को खो दिया। उसी हादसे के बाद उन्होंने समाजसेवा और नागरिक आंदोलन का रास्ता चुना और “हामी नेपाल” की नींव रखी। यह संगठन पहले आपदा राहत में सक्रिय रहा और बाद में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों में कूद पड़ा। धरान में बीपी कोइराला इंस्टिट्यूट ऑफ हेल्थ साइंसेज की अनियमितताओं के खिलाफ “घोपा कैंप” आंदोलन से लेकर काठमांडू तक, गुरुङ धीरे-धीरे युवाओं और आम नागरिकों के बीच विश्वास और उम्मीद का चेहरा बन गए हैं। आज गुरुङ को “जनरेशन-जेड की आवाज” कहा जा रहा है, लेकिन उनका आंदोलन सिर्फ युवाओं तक सीमित नहीं है। काठमांडू से लेकर पोखरा, बुटवल, विराटनगर, बुटवल, भैरहवा, बेलहिया, नवलपरासी दांग,झापा,धरान, नेपालगंज, जनकपुर और दमक तक, हर वर्ग के लोग इस संघर्ष में शामिल हुए हैं।

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