हिन्दुओं के बंटने से अखिलेश के ‘पीडीए’ को मिलता है खाद्य पानी

Yogi Akhilesh
 संजय सक्सेना

उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के सरकारी स्कूलों के मर्जर के फैसले ने सियासी तूफान खड़ा कर दिया है। विपक्षी पार्टियां बुरी तरह से योगी सरकार पर हावी हो गई हैं,जिसके चलते सरकार को यह कहना पड़  गया कि जहां पचास से ज्यादा बच्चे वाले और एक किलोमीटर से ज्यादा दूरी वाले स्कूलों का मर्जर नहीं होगा। फिर भी राजनीति थमने का नाम नहीं ले रही है। यहां तक की समाजवादी पार्टी के रामपुर के एक मुस्लिम नेता ने इस नीति के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए ‘पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक)पाठशाला’ ही खोल दी, जिसने न केवल शिक्षा के क्षेत्र में हलचल मचाई, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए एक बड़े सियासी दांव के रूप में भी उभरा है। गरीब, दलित और पिछड़े वर्गों के बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करने का दावा करके अपना पीडीए मजबूत करना चाहती है, उधर, भारतीय जनता पार्टी  ने इसे राजनीतिक प्रचार का हथियार बताकर तीखी आलोचना कर रही है। दोनों पक्षों के बीच बयानबाजी और कार्रवाइयों ने यूपी की सियासत को और गरमा दिया है। योगी सरकार द्वारा तर्क दिया जा रहा है कि कम छात्र संख्या वाले प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों को मर्ज करने का फैसला इस लिये लिया गया है।

ताकि संसाधनों का बेहतर उपयोग हो और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हो। सरकार के मुताबिक, प्रदेश में लगभग 1.4 लाख प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूल हैं, जिनमें 29,000 स्कूलों में छात्रों की संख्या 50 से कम है। इन स्कूलों को बड़े परिसरों और बेहतर सुविधाओं वाले स्कूलों में मर्ज करने की योजना है। इस संबंध में बेसिक शिक्षा मंत्री संदीप सिंह का कहना कि 50 से ज्यादा छात्रों वाले स्कूलों का मर्जर नहीं होगा, और एक किलोमीटर से ज्यादा दूरी वाले स्कूलों को भी मर्ज नहीं किया जाएगा। सरकार का दावा है कि यह नीति बच्चों को अटल आवासीय विद्यालय और मुख्यमंत्री अभ्युदय विद्यालय जैसी आधुनिक सुविधाओं से जोड़ेगी। खाली हुए स्कूल भवनों को बाल वाटिका और आंगनवाड़ी केंद्रों में बदला जाएगा, लेकिन इस फैसले का विपक्ष  पुरजोर विरोध कर रहा है। सपा ने इसे गरीब और हाशिए पर रहने वाले बच्चों, खासकर लड़कियों, की शिक्षा पर हमला करार दिया। अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि सरकार उन इलाकों में स्कूल बंद कर रही है, जहां सपा को चुनाव में बढ़त मिलती थी। उन्होंने संसद में कहा कि यह राजनीतिक फैसला है। सरकार पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समाज के बच्चों से शिक्षा छीन रही है। इस विरोध को और धार देने के लिए अखिलेश ने ‘पीडीए पाठशाला’ की शुरुआत की। उन्होंने कार्यकर्ताओं, शिक्षित युवाओं और रिटायर्ड शिक्षकों से अपील की कि वे बंद होने वाले स्कूलों के गांवों में पाठशालाएं चलाएं। अखिलेश ने कहा, “हम बच्चों की पढ़ाई रुकने नहीं देंगे। जब तक सरकार शिक्षकों की भर्ती नहीं करती, पीडीए पाठशाला और ट्यूशन चलता रहेगा।”

सपा के इस अभियान ने सहारनपुर, कानपुर, मिर्जापुर, भदोही, मऊ और संभल जैसे जिलों में रफ्तार पकड़ी। लेकिन इन पाठशालाओं में पढ़ाए जा रहे पाठ्यक्रम ने विवाद खड़ा कर दिया। सहारनपुर में सपा नेता फरहाद आलम गाड़ा ने अपने घर में पाठशाला शुरू की, जहां बच्चों को ‘ए फॉर अखिलेश’, ‘बी फॉर बाबा साहेब’, ‘डी फॉर डिंपल’ और ‘एम फॉर मुलायम’ जैसे उदाहरण पढ़ाए गए। संभल में सपा के पार्टी ऑफिस में बच्चों को ‘बी फॉर बेरोजगारी’ और ‘बीजेपी यानी बहुत झूठी पार्टी’ सिखाया गया। इन वीडियो के वायरल होने के बाद बीजेपी ने इसे बच्चों के दिमाग में “राजनीतिक जहर” घोलने की साजिश करार दिया। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी ने कहा कि यह शिक्षा नहीं, समाजवादी ब्रेनवॉश है। बच्चों को राजनीति की प्रयोगशाला नहीं बनने दिया जाएगा।

विवाद तब और बढ़ा जब लखनऊ, कानपुर, मऊ और अन्य जगहों पर सपा नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुईं। लखनऊ में सपा नेत्री पूजा शुक्ला पर सरकारी स्कूल परिसर में बिना अनुमति पाठशाला चलाने का आरोप लगा। कानपुर में सपा नेता रचना सिंह गौतम और मऊ में सपा के छात्र सभा अध्यक्ष अखिलेश भारती के खिलाफ भी मुकदमे दर्ज हुए। प्रशासन ने इसे शिक्षा के अधिकार अधिनियम-2009 का उल्लंघन बताया। लेकिन सपा नेताओं ने इन कार्रवाइयों को दमनकारी नीति करार दिया। मऊ के सपा विधायक सुधाकर सिंह ने कहा, “मुकदमा नेताओं का गहना है। हम डरने वाले नहीं हैं।” सपा विधायक रविदास मेहरोत्रा ने बीजेपी को शिक्षा विरोधी करार देते हुए कहा, “हम 250 बार जेल जा चुके हैं। पीडीए पाठशाला तब तक चलेगी, जब तक स्कूल फिर से नहीं खुलते।

इस बीच अखिलेश यादव ने योगी सरकार पर तीखे हमले जारी रखे। जनेश्वर मिश्र की जयंती पर उन्होंने कहा  कि पुलिस के बल पर पीडीए पाठशाला को नहीं रोका जा सकता। सरकार ने खुद माना है कि स्कूल बंद करना गलत था। मर्जर योजना खत्म होनी चाहिए। उन्होंने एक्स पर तंज कसते हुए लिखा कि यूपी में नवयोगी काल- शिक्षा के मंदिर बंद, शराब के ठेके चालू। एक चार्ट शेयर करते हुए उन्होंने दावा किया कि यूपी में शराब के ठेके (27,308) न्यूयॉर्क (3,800) और कैलिफोर्निया (14,227) से ज्यादा हैं। अखिलेश ने बीजेपी पर नशे को बढ़ावा देने और गरीबों की शिक्षा छीनने का आरोप लगाया।मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस हमले का जवाब देते हुए सपा पर पलटवार किया। मुरादाबाद में उन्होंने कहा, “कल्याण सिंह की सरकार में बच्चों को ‘ग से गणपति’ पढ़ाया जाता था, लेकिन सपा ने ‘ग से गधा’ पढ़ाया। अब वे ‘ए से अखिलेश’ पढ़ा रहे हैं।

इस पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सपा पर शिक्षा व्यवस्था को चौपट करने का आरोप लगाया और दावा किया कि बीजेपी सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत आधुनिक शिक्षा केंद्र स्थापित किए हैं। डिप्टी CM ब्रजेश पाठक ने तो सपा की पाठशाला को “ए से अलकायदा” वाली करार दे दिया। हालांकि, सपा का दावा है कि सरकार के दबाव में मर्जर नीति में संशोधन हुआ, जो पीडीए पाठशाला की जीत है। अखिलेश ने इसे जनता की आवाज की जीत बताया। लेकिन सीतापुर जैसे इलाकों में अभिभावकों ने मर्जर के खिलाफ चिंता जताई। उनका कहना है कि मर्ज किए गए स्कूल दूर हैं, जिससे बच्चों, खासकर बेटियों की सुरक्षा खतरे में है। सीतापुर में एक महीने से बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे, और कोर्ट में इस मामले की सुनवाई 21 अगस्त को होनी है। बहरहाल, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पीडीए पाठशाला सपा का स्मार्ट मूव है। यह अभियान न केवल शिक्षा के अधिकार का मुद्दा उठाता है, बल्कि बेरोजगार युवाओं, शिक्षामित्रों और गरीब तबकों को सपा के साथ जोड़ सकता है,लेकिन इसके लिये सपा को काफी संसाधनों की जरूरत होगी,जो फिलहाल उसके पास नहीं हैं। बता दें 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा को दलित और ओबीसी वोटों से बढ़त मिली थी, इसी लिये सपा नेतृत्व को लगता है। कि पार्टी का यह अभियान 2027 के चुनाव के लिए उसके पीडीए वाले आधार को और मजबूत करेगा। लेकिन बीजेपी इसे सियासी स्टंट बताकर शिक्षा को कमजोर करने की कोशिश करार दिया है। कई बीजेपी और हिन्दू नेता आरोप लगा रहे हैं कि समाजवादी पार्टी के पीडीए को तभी खाद्य पानी मिलता है जब वह हिन्दुओं को आपस में लड़ाने और बांटने में सफल रहती है।इस सियासी जंग में एक बात साफ है- शिक्षा अब यूपी की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन चुका है। सपा की पीडीए पाठशाला और बीजेपी की शिक्षा नीतियों के बीच यह टकराव आने वाले दिनों में और तेज होगा।

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