जेल से सरकार चलाने के खिलाफ कानून-पक्ष-विपक्ष में टकराव के निहितार्थ

NayaLook 1

संजय सक्सेना

लखनऊ। भारतीय लोकतंत्र में संसदीय प्रक्रियाएँ वह रीढ़ हैं, जो जनता की आवाज को कानून के रूप में ढालती हैं। लेकिन जब विपक्ष, जो लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, इन प्रक्रियाओं से मुँह मोड़ लेता है, तो यह न केवल उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है, बल्कि लोकतंत्र की नींव को भी कमजोर करता है। संविधान (130वां संशोधन) विधेयक, 2025, जिसे ‘जेल से सरकार नहीं’ बिल के नाम से जाना जाता है, आज ऐसा ही एक मुद्दा बन गया है, जो सत्ता और विपक्ष के बीच तीखी जंग का केंद्र है। यह बिल गंभीर आपराधिक मामलों (5 वर्ष या अधिक सजा वाले) में 30 दिनों से अधिक हिरासत में रहने वाले प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, या मंत्रियों को स्वतः पद से हटाने का प्रावधान करता है। संसद के मॉनसून सत्र में पेश होने के बाद इसे संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को भेजा गया, लेकिन तृणमूल कांग्रेस (TMC), समाजवादी पार्टी (SP), और आम आदमी पार्टी (AAP) जैसे विपक्षी दलों का जेपीसी से किनारा करना गंभीर सवाल उठाता है। क्या विपक्ष इस बिल के खिलाफ लड़ाई को सड़क तक सीमित रखना चाहता है? क्या संसदीय प्रक्रिया से भागना लोकतंत्र के प्रति उनकी जिम्मेदारी को कमजोर नहीं करता? और सबसे अहम, क्या यह रवैया विपक्ष की रणनीतिक कमजोरी को उजागर करता है? केंद्र सरकार ने इस बिल को भ्रष्टाचार और अपराध के खिलाफ एक ऐतिहासिक कदम बताया है। गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में इसे पेश करते हुए कहा कि यह जनता की उस भावना को प्रतिबिंबित करता है, जो भ्रष्ट नेताओं को सत्ता में नहीं देखना चाहती। एक जनसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे ‘नए भारत’ का प्रतीक बताया, जहाँ भ्रष्टाचारियों की कोई जगह नहीं होगी। सरकार के आँकड़ों के मुताबिक, 2014 से 2024 तक केंद्रीय जांच एजेंसियों ने 1200 से अधिक नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार और आपराधिक मामलों में कार्रवाई की, जिनमें से 60% विपक्षी दलों से थे। यह बिल ऐसे नेताओं को सत्ता से बाहर रखने का दावा करता है।

लेकिन विपक्ष इसे केंद्र की एक साजिश के रूप में देखता है। TMC  सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने इसे ‘सुपर-इमरजेंसी’ करार देते हुए कहा कि यह बिल विपक्षी नेताओं को जेल भेजकर उनकी सरकारों को अस्थिर करने का हथियार है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इसे ‘लोकतंत्र पर हमला’ बताया, जबकि आप नेता संजय सिंह ने इसे ‘संवैधानिक हत्या’ कहा। विपक्ष का तर्क है कि केंद्रीय जांच एजेंसियों (CBI, ED) का दुरुपयोग पहले से ही विपक्षी नेताओं को निशाना बनाने के लिए हो रहा है। उदाहरण के लिए, 2023-24 में ईडी ने 45 विपक्षी नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की, जबकि सत्तारूढ़ दलों के केवल 8 नेताओं पर निशाना साधा गया। ऐसे में यह बिल विपक्ष के लिए एक ‘जाल’ बन सकता है।जेपीसी में विपक्षी दलों का बहिष्कार उनके रवैये को और गहराई से विश्लेषित करने की मांग करता है। टीएमसी, सपा, और आप का कहना है कि जेपीसी में एनडीए का बहुमत होने के कारण इसकी कार्यवाही निष्पक्ष नहीं होगी। लेकिन यह तर्क कितना तार्किक है? संसदीय समितियों में सत्तारूढ़ दल का बहुमत होना कोई नई बात नहीं। 2003 में बोफोर्स मामले की जेपीसी हो या 2011 में 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच, सत्तारूढ़ दल का दबदबा हमेशा रहा है। फिर भी, विपक्ष ने इन मंचों का उपयोग अपनी बात रखने और जनता को जागरूक करने के लिए किया।

जेपीसी से दूरी बनाकर विपक्ष क्या हासिल कर रहा है? पहला, वह सरकार को अपनी मनमानी करने की खुली छूट दे रहा है। अगर जेपीसी में विपक्षी सांसद शामिल नहीं होंगे, तो एनडीए के सांसद बिल के प्रावधानों को और सख्त कर सकते हैं। दूसरा, विपक्ष जनता के बीच यह संदेश दे रहा है कि वह संसदीय प्रक्रिया में विश्वास नहीं रखता। यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है, क्योंकि संसदीय समितियाँ जनता की आवाज को कानून में ढालने का एक संवैधानिक मंच हैं।कांग्रेस का रुख इस मामले में अपने सहयोगी दलों से अलग है। सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस जेपीसी में शामिल होने की पक्षधर है, क्योंकि वह मानती है कि यह मंच बिल के दुरुपयोग को उजागर करने का सबसे प्रभावी तरीका है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने हाल ही में एक बयान में कहा कि जेपीसी की कार्यवाही न केवल कानूनी रूप से महत्वपूर्ण होती है, बल्कि यह जनता को सरकार की मंशा से अवगत कराने का भी मौका देती है। लेकिन टीएमसी, सपा, और आप के बहिष्कार ने कांग्रेस को असमंजस में डाल दिया है। इंडिया गठबंधन की एकता इस समय विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती है। अगर कांग्रेस अपने सहयोगी दलों के दबाव में जेपीसी से बाहर होती है, तो यह गठबंधन की एकजुटता को कमजोर करेगा।

विपक्ष का यह रवैया नया नहीं है। इससे पहले भी कई मौकों पर विपक्ष ने औपचारिक प्रक्रियाओं से दूरी बनाई है। 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव के बाद ईवीएम में छेड़छाड़ का मुद्दा जोर-शोर से उठा था। मायावती, अखिलेश यादव, और अरविंद केजरीवाल ने बैलेट पेपर की मांग की थी। चुनाव आयोग ने मई 2017 में ईवीएम हैक करने की खुली चुनौती दी, लेकिन कोई भी दल इस चुनौती को स्वीकार नहीं कर सका। एनसीपी और सीपीएम के प्रतिनिधियों ने भी अपनी अक्षमता स्वीकार की।पेगासस जासूसी कांड में भी यही हुआ। विपक्ष ने संसद में हंगामा किया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की जांच समिति में सक्रिय रूप से शामिल नहीं हुआ। बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाया, लेकिन जब चुनाव आयोग ने आपत्ति दर्ज करने को कहा, तो कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। इन सभी मामलों में विपक्ष ने सड़क पर विरोध और बयानबाजी को प्राथमिकता दी, लेकिन औपचारिक प्रक्रियाओं से किनारा किया।

विपक्ष का यह रवैया कई सवाल खड़े करता है। क्या वह वास्तव में इन मुद्दों पर गंभीर है, या केवल राजनीतिक लाभ के लिए बयानबाजी कर रहा है? जेपीसी में शामिल होकर विपक्ष बिल के हर प्रावधान की गहन जांच कर सकता है। उदाहरण के लिए, वह यह मांग कर सकता है कि बिल में जांच एजेंसियों के दुरुपयोग को रोकने के लिए स्पष्ट प्रावधान हों। वह यह भी सुझा सकता है कि हिरासत की अवधि को 30 दिनों से बढ़ाकर 60 दिन किया जाए, ताकि नेताओं को कानूनी प्रक्रिया का पूरा मौका मिले। लेकिन बहिष्कार करने से वह अपनी आवाज को कमजोर कर रहा है।

विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष का यह रवैया उसकी रणनीतिक कमजोरी को दर्शाता है। सड़क पर विरोध और सोशल मीडिया पर बयानबाजी जनता का ध्यान खींच सकती है, लेकिन यह संसदीय प्रक्रिया का विकल्प नहीं हो सकता। जेपीसी में शामिल होकर विपक्ष न केवल सरकार को कठघरे में खड़ा कर सकता है, बल्कि जनता को यह भी दिखा सकता है कि वह लोकतंत्र की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।विपक्ष का जेपीसी से दूरी बनाना लोकतंत्र के लिए एक खतरनाक संदेश देता है। संसदीय समितियाँ जनता की आवाज को कानून में ढालने का एक संवैधानिक मंच हैं। अगर विपक्ष इस मंच का उपयोग नहीं करता, तो वह जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता खो सकता है। जनता यह सवाल पूछेगी कि अगर विपक्ष को अपनी बात पर भरोसा है, तो वह औपचारिक प्रक्रियाओं से क्यों भाग रहा है?

कांग्रेस को अपने सहयोगी दलों को यह समझाना होगा कि जेपीसी में शामिल होना न केवल रणनीतिक रूप से सही है, बल्कि यह विपक्षी एकता को भी मजबूत करेगा। टीएमसी, सपा, और आप को यह समझना होगा कि संसद और सड़क पर विरोध एक साथ चल सकता है। जेपीसी में शामिल होकर वे न केवल बिल के दुरुपयोग को उजागर कर सकते हैं, बल्कि जनता के बीच यह संदेश भी दे सकते हैं कि वे लोकतंत्र की हर लड़ाई संवैधानिक तरीके से लड़ने को तैयार हैं।’जेल से सरकार नहीं’ बिल निश्चित रूप से एक जटिल और संवेदनशील मुद्दा है। यह भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का प्रतीक हो सकता है, लेकिन इसका दुरुपयोग विपक्षी दलों के लिए खतरा भी बन सकता है। ऐसे में विपक्ष को चाहिए कि वह संसदीय प्रक्रिया में हिस्सा ले, अपनी बात को मजबूती से रखे और जनता को यह दिखाए कि वह लोकतंत्र की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। अगर विपक्ष इस मौके को गंवाता है, तो वह न केवल अपनी विश्वसनीयता खोएगा, बल्कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए भी एक बड़ा अवसर गंवा देगा।

Spread the love

Today's Horoscope
Astrology homeslider

आज लगेगा दुर्लभ सूर्यग्रहण, इन राशियों की चमकेगी किस्मत

Today’s Horoscope मेष: घरेलू जीवन को लेकर मन के भीतर उथल-पुथल रह सकती है। आज गृहस्थ जीवन में परेशानियों का अनुभव हो सकता है। घर गृहस्थी के उपयोग की कोई प्रिय वस्तु खरीदी जाएगी। शुभ व्यय होगा। नौकरी पेशा वर्ग को उन्नति मिल सकती है। मन को शांति मिलेगी। वृष: आपके खर्चे कम हो जाएंगे […]

Spread the love
Read More
West Bengal CM
National Politics West Bengal

CM शुभेंदु अधिकारी बाल-बाल बचे

अब सड़क मार्ग से जाएंगे CM West Bengal CM: पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के हेलिकॉप्टर की मंगलवार को कोलाघाट में इमरजेंसी लैंडिंग कराई गई है। CM शुभेंदु अधिकारी कोलकाता से पश्चिम मेदिनीपुर के केशपुर जा रहे थे, लेकिन रास्ते में हेलिकॉप्टर में तकनीकी खराबी और खराब मौसम के चलते इसे बीच रास्ते में […]

Spread the love
Read More
Abhijeet Deepke
Jharkhand National Politics

अभिजीत दीपके नहीं जाएंगे झारखंड

 छात्र आंदोलन से दूरी बनाने का किया ऐलान Abhijit Deepak, Jharkhand: छात्र आंदोलन को लेकर अभिजीत दीपके ने अपना रुख साफ कर दिया है। उन्होंने कहा है कि वह झारखंड में चल रहे छात्रों के आंदोलन में व्यक्तिगत रूप से शामिल होने के लिए नहीं जाएंगे। हालांकि, उन्होंने आंदोलन कर रहे छात्रों के प्रति अपना […]

Spread the love
Read More