

UP Muslim vote bank: उत्तर प्रदेश की राजनीति का मिजाज एक बार फिर पूरी तरह से गरमा गया है, जहां आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर बिसात बिछनी शुरू हो गई है। इसी के चलते प्रदेश में हिंदू और मुस्लिमों के बीच राजनीति बंटती नजर आ रही है। हिंदुत्व के रहनुमा योगी बने हैं तो अखिलेश दलितों-पिछड़ों और खासकर मुस्लिम वोटों के सहारे अपनी नैया पार लगाने की कोशिश में लगे हैं। मगर इस बार मुस्लिम वोटों की लड़ाई तीन हिस्सों में बंटती नजर आ रही है। राज्य में मुस्लिम मतदाताओं को अपने पाले में करने के लिए इस बार तीन बड़े मोर्चे खुल चुके हैं, जिसके केंद्र में मुख्य रूप से समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) आमने-सामने आ खड़ी हुई हैं।
उत्तर प्रदेश की करीब 20 प्रतिशत मुस्लिम आबादी हमेशा से सत्ता की चाबी रही है, जिसे समाजवादी पार्टी अपना सबसे मजबूत और सुरक्षित वोट बैंक मानती आई है। अखिलेश यादव किसी भी कीमत पर इस वोट बैंक में सेंध नहीं लगने देना चाहते, लेकिन इस बार की राह बेहद पथरीली नजर आ रही है। एक तरफ कहने को तो कांग्रेस इंडिया गठबंधन के तहत समाजवादी पार्टी के साथ खड़ी दिखती है, लेकिन अंदरूनी तौर पर वह सपा को मुस्लिम वोटों के एकाधिकार को लेकर लगातार आंखें दिखा रही है। लोकसभा चुनाव के नतीजों से उत्साहित कांग्रेस को लगता है कि राहुल गांधी की आक्रामक राजनीति के बूते राज्य में उसके अच्छे दिन वापस लौट सकते हैं।

लगभग चार दशकों से उत्तर प्रदेश की सत्ता से दूर कांग्रेस इसी उम्मीद में समाजवादी पार्टी से आगामी चुनाव के लिए करीब पौने दो सौ सीटें मांग रही है। इसके उलट अखिलेश यादव कांग्रेस को 50 से 60 सीटों से अधिक देने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं। अखिलेश को अच्छी तरह से पता है कि अगर कांग्रेस को अधिक सीटें दी गईं, तो यह मुस्लिम वोटरों की कांग्रेस की तरफ स्थायी वापसी के दरवाजे खोलने जैसा होगा, जिससे सपा की परंपरागत सियासत ही दरक जाएगी। हालांकि सीट शेयरिंग को लेकर राहुल गांधी खुद अखिलेश के खिलाफ सीधा मोर्चा नहीं खोल रहे हैं, लेकिन उनके बेहद करीबी सांसद इमरान मसूद, यूपी कांग्रेस अध्यक्ष आराधना मिश्रा और चुनाव प्रभारी राजेंद्र कुमार गौतम जैसे रणनीतिकार खुलकर समाजवादी पार्टी की घेराबंदी कर रहे हैं।
इस द्विपक्षीय खींचतान के बीच सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं AIMIM के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी, जिन्होंने अखिलेश यादव की नाक में दम कर रखा है। ओवैसी ने सपा के इस परंपरागत वोट बैंक को झकझोरने के लिए बेहद आक्रामक और भावनात्मक रणनीति अपनाई है। वह जनसभाओं में घूम-घूमकर अल्पसंख्यकों के बीच यह संदेश दे रहे हैं कि उत्तर प्रदेश के मुस्लिम वोटरों ने चार बार सूबे में समाजवादी पार्टी की सरकार बनवाई, लेकिन इसके बदले में इस कौम को क्या मिला।
ओवैसी का सबसे मारक बयान यही रहा है कि सपा की हुकूमतों में मुस्लिमों की हैसियत पार्टी में सिर्फ दरी बिछाने और झंडा उठाने से ज्यादा नहीं बढ़ सकी है। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक हिस्सेदारी को लेकर वह लगातार समाजवादी पार्टी के नेतृत्व पर हमलावर हैं। वरिष्ठ नेता आजम खान के मुद्दे को उठाकर भी ओवैसी सपा प्रमुख को लगातार कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। ओवैसी का सीधा आरोप है कि आजम खान को जानबूझकर जेल में रहने दिया गया, क्योंकि अखिलेश यादव भली-भांति जानते हैं कि अगर आजम खान बाहर आ गए तो वह मुस्लिम वोटरों को अपनी पसंद के नेताओं की तरफ मोड़ देंगे और अखिलेश को अपनी पार्टी में किसी अन्य मजबूत मुस्लिम नेतृत्व का उभार पसंद नहीं है। इसके साथ ही ओवैसी लगातार राजनीतिक गलियारों में यह बात फैला रहे हैं कि पर्दे के पीछे समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी आपस में मिले हुए हैं और नूराकुश्ती खेल रहे हैं।

ओवैसी यहीं नहीं रुकते हैं, बल्कि अखिलेश के सबसे बड़े राजनीतिक गढ़ पर हमला बोलते हुए समाजवादी पार्टी को नया नाम समाजवादी यादव परिवार रखने का तंज कसते हैं। शामली के कैराना, बिजनौर और आजमगढ़ जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में गरजते हुए ओवैसी ने कुछ ऐसे तीखे उदाहरण दिए हैं, जिन्होंने सपा के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। ओवैसी ने सार्वजनिक मंचों से सवाल उठाया कि एक समय था जब आजमगढ़ और फिरोजाबाद जैसी लोकसभा सीटों से मुस्लिम उम्मीदवार जीतकर संसद पहुंचते थे, लेकिन अब वहां अखिलेश यादव के परिवार के लोग सांसद बन रहे हैं। उन्होंने बदायूं सीट का भी हवाला दिया और मुस्लिम समाज से सीधे मुखातिब होते हुए पूछा कि क्या कौम के अब्दुल का काम सिर्फ इतना रह गया है कि वह यादव परिवार के लोगों को सांसद और विधायक की सीट तोहफे में देता रहे, जबकि खुद हाशिए पर पड़ा रहे।
ओवैसी बेहद तल्ख लहजे में कहते हैं कि अगर सैफई के किसी यादव नेता पर कोई कानूनी आंच आती है या वह जेल जाता है, तो लखनऊ की सड़कों पर चक्का जाम हो जाता है, लेकिन जब जेल में बंद किसी अब्दुल के हक की बात आती है, तो समाजवादी पार्टी के नेता चुप्पी साध लेते हैं। ओवैसी की इस तीखी बयानबाजी ने मुस्लिम युवाओं के एक बड़े वर्ग को सोचने पर मजबूर किया है और वे पूछ रहे हैं कि वे कब तक दूसरों के लिए अपनी जवानी कुर्बान करते रहेंगे।
जीत-हार में आंकड़ों और जमीनी भूगोल की बात करें तो उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से लगभग 110 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम मतदाता 30 से 39 प्रतिशत के बीच हैं और निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा 44 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम आबादी का अनुपात 40 से 49 प्रतिशत तक जाता है, जबकि 11 सीटें तो ऐसी हैं, जहां यह आंकड़ा 50 से 65 प्रतिशत के पार चला जाता है। मटेरा, मेरठ, बहराइच, बेहट और मुबारकपुर जैसे विधानसभा क्षेत्रों में AIMIM ने अपनी जड़ें बेहद मजबूत करनी शुरू कर दी हैं। पिछले चुनावों के आंकड़ों पर गौर करें तो AIMIM का ग्राफ सूबे में लगातार बढ़ा है।
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साल 2017 के विधानसभा चुनाव में ओवैसी की पार्टी ने सिर्फ 38 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे 2,04,142 वोट मिले थे। वहीं 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने अपनी ताकत बढ़ाते हुए 94 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और उसका वोट बैंक दोगुने से अधिक होकर 4,50,929 वोटों तक पहुंच गया, भले ही वह कोई सीट जीतने में कामयाब नहीं रही। लेकिन आगामी चुनाव के लिए ओवैसी करीब 200 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं, जो सीधे तौर पर समाजवादी पार्टी के वोटों में बड़ी सेंधमारी की योजना है। मुबारकपुर जैसी सीट पर, जहां पिछले चुनाव में सपा ने 29 हजार वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी, वहां इस बार AIMIM का बढ़ता जनाधार अखिलेश यादव की मुश्किलें बढ़ा रहा है।
ओवैसी के इन तीखे हमलों से बौखलाए अखिलेश यादव ने भी उन पर पलटवार करते हुए उनकी तुलना भेष बदले रावण से कर दी, जिस पर ओवैसी ने चुटकी लेते हुए कहा कि वह सपा प्रमुख की जुबान से यही जहर उगलवाना चाहते थे, क्योंकि अखिलेश को टोपी और दाढ़ी वाला हर मुसलमान अब रावण दिखाई देने लगा है। कुल मिलाकर, कांग्रेस की तरफ से सीटों की भारी मांग और दूसरी तरफ से ओवैसी द्वारा मुस्लिम लीडरशिप की अस्मिता का सवाल खड़ा करने से उत्तर प्रदेश का यह त्रिकोणीय मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है, जिसमें अखिलेश यादव के सामने अपने सबसे पुराने दुर्ग को बचाने की बेहद कठिन चुनौती है।
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