दल-बदल से नहीं, जनविश्वास से टूटेगा भाजपा का किला

संजय सक्सेना
  संजय सक्सेना

UP Assembly Elections: उत्तर प्रदेश में 2027 की चुनावी लड़ाई का असली शोर अभी शुरू नहीं हुआ है, लेकिन सत्ता की बिसात पर मोहरे तेजी से बदले जा रहे हैं। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने जिस तरह भाजपा और बसपा के पुराने चेहरों को अपने खेमे में लाना शुरू किया है, वह महज दल-बदल की सामान्य कवायद नहीं है। यह भाजपा की उस सामाजिक ताकत को कमजोर करने की कोशिश है, जिसने 2014 के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति का चरित्र बदल दिया था।

बदायूं से मुजफ्फरनगर तक शाक्य, मौर्य, प्रजापति, पासी और सवर्ण नेताओं को जोड़कर अखिलेश भाजपा को उसी जातीय मैदान में चुनौती देना चाहते हैं, जहां कभी सपा की सीमाएं और भाजपा की ताकत साफ दिखाई देती थीं। लेकिन सवाल बड़ा है। क्या दूसरे दलों के असंतुष्ट नेताओं के सहारे सत्ता परिवर्तन की मजबूत जमीन तैयार हो सकती है? इस सवाल का जवाब उत्तर प्रदेश के पिछले चुनावी आंकड़ों में छिपा है। वर्ष 2017 में भाजपा ने 312 विधानसभा सीटें जीतकर सपा की सत्ता समाप्त कर दी थी।

पांच वर्ष बाद 2022 में भाजपा की सीटें घटकर 255 रह गईं, लेकिन वह सरकार बचाने में सफल रही। दूसरी ओर सपा 2017 की 47 सीटों से बढ़कर 2022 में 111 तक पहुंची। भाजपा को 2022 में 41.29 प्रतिशत और सपा को 32.06 प्रतिशत वोट मिले। लगभग नौ प्रतिशत अंकों का यह अंतर बताता है कि भाजपा को सत्ता से हटाने के लिए केवल मुस्लिम-यादव समीकरण पर्याप्त नहीं है। अखिलेश इसी राजनीतिक सीमा को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

बदायूं में सिनोद शाक्य और कुशाग्र सागर की सपा में एंट्री को इसी नजरिए से देखना चाहिए। सिनोद शाक्य दो बार दातागंज से बसपा विधायक रहे हैं। उनका राजनीतिक सफर बसपा, सपा और भाजपा से गुजरते हुए फिर सपा तक पहुंचा है। कुशाग्र सागर 2017 में भाजपा के टिकट पर बिसौली से विधायक बने थे। वर्ष 2022 में उन्हें सपा के आशुतोष मौर्य ने केवल 1,834 वोटों से हराया। यह अंतर बताता है कि बिसौली में मामूली राजनीतिक बदलाव भी नतीजा पलट सकता है। लेकिन यहीं अखिलेश के सामने असहज सवाल खड़ा होता है।

जिस नेता को हराकर सपा ने सीट जीती, उसी को पार्टी में लाने से मौजूदा विधायक और उनके समर्थकों का भरोसा कितना मजबूत रहेगा?दरअसल, उत्तर प्रदेश में दल-बदल की राजनीति का सबसे बड़ा भ्रम यही है कि नेता के साथ उसकी पूरी जाति भी पार्टी बदल लेती है। ऐसा होता तो चुनाव में जातीय समीकरणों के सारे अनुमान हमेशा सही निकलते। शाक्य समाज का नेता सपा में आने से भाजपा का पूरा शाक्य वोट स्वतः सपा का नहीं हो जाएगा।

इसी तरह पासी या प्रजापति नेता के आने से संबंधित समुदाय का एकमुश्त समर्थन मिलने की गारंटी नहीं है। जातीय प्रतिनिधित्व और जातीय मतदान के बीच बड़ा अंतर होता है। अखिलेश की रणनीति तभी सफल होगी, जब नए नेता अपनी व्यक्तिगत स्वीकार्यता को संगठनात्मक ताकत में बदल सकेंगे। बदायूं के आंकड़े इस चुनौती को और स्पष्ट करते हैं। वर्ष 2022 में जिले की छह विधानसभा सीटों में भाजपा और सपा ने तीन-तीन सीटें जीती थीं।

भाजपा दातागंज, बिल्सी और बदायूं में सफल रही, जबकि सपा ने बिसौली, सहसवान और शेखूपुर पर कब्जा किया। यानी यहां किसी एक दल का एकतरफा प्रभुत्व नहीं है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा के आदित्य यादव की जीत ने पार्टी का आत्मविश्वास जरूर बढ़ाया, लेकिन विधानसभा चुनाव में छह अलग-अलग स्थानीय समीकरणों से मुकाबला करना होगा। लोकसभा की जीत को विधानसभा की गारंटी मान लेना राजनीतिक भूल होगी। अखिलेश की नई घेराबंदी में शिवपाल यादव की भूमिका भी निर्णायक है। बदायूं में पुराने समाजवादी नेताओं के बीच मतभेद कोई छिपी हुई बात नहीं है। मौजूदा विधायकों, पूर्व मंत्रियों और नए दावेदारों की महत्वाकांक्षाओं को साधना आसान नहीं होगा।

शिवपाल की राजनीतिक पहचान संगठन के भीतर संवाद और स्थानीय समीकरणों की समझ से बनी है। लेकिन इस बार चुनौती पहले से कठिन है। सपा को भाजपा से आए नेताओं का स्वागत भी करना है और उन कार्यकर्ताओं का सम्मान भी बचाना है, जिन्होंने कठिन समय में पार्टी का झंडा उठाए रखा। यदि टिकट वितरण में यही संतुलन बिगड़ा तो भाजपा को बाहर से हमला करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव दिखाया था। सपा ने 37 और कांग्रेस ने छह सीटें जीतकर भाजपा को 33 सीटों पर रोक दिया।

मगर इस नतीजे का दूसरा पक्ष भी है। भाजपा को प्रदेश में लगभग 41 प्रतिशत वोट मिले, जबकि सपा का मत प्रतिशत लगभग 33.6 रहा। यानी संसदीय सीटों पर झटका खाने के बावजूद भाजपा का सामाजिक आधार पूरी तरह बिखरा नहीं था। यही कारण है कि 2027 की लड़ाई को अभी से भाजपा की हार या सपा की जीत बताना चुनावी वास्तविकता से आंखें मूंदना होगा। भाजपा के लिए भी खतरे की घंटी साफ है। जिस गैर-यादव पिछड़े वर्ग को उसने लंबे समय तक राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संगठनात्मक भागीदारी के जरिए अपने साथ रखा, उसी वर्ग के नेताओं का विपक्ष की तरफ जाना असंतोष का संकेत हो सकता है। हालांकि कुछ नेताओं के पार्टी छोड़ने को पूरे समुदाय की नाराजगी मानना भी गलत होगा।

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भाजपा की असली परीक्षा यह होगी कि वह अपने स्थानीय कार्यकर्ताओं की शिकायतों, टिकट की दावेदारी और सामाजिक संतुलन को कैसे संभालती है। केवल शीर्ष नेतृत्व की लोकप्रियता के सहारे हर विधानसभा क्षेत्र की नाराजगी दूर नहीं की जा सकती। बसपा की स्थिति इस मुकाबले को और पेचीदा बनाती है। वर्ष 2022 में बसपा को केवल एक विधानसभा सीट मिली थी, लेकिन उसका मत प्रतिशत लगभग 12.9 रहा। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी कोई सीट नहीं जीत सकी।

इसके बावजूद उसके परंपरागत समर्थकों को राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक समझना बड़ी भूल होगी। सपा दलित नेताओं को जोड़कर इसी आधार में सेंध लगाना चाहती है। लेकिन दलित मतदाता केवल भाजपा विरोध के कारण सपा के साथ आ जाएगा, यह मान लेना भी उतना ही कमजोर तर्क है।असली कसौटी पीडीए की राजनीति है। यदि पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों की भागीदारी केवल चुनावी मंचों तक सीमित रही तो यह प्रयोग भी पुराने जातीय गठबंधनों की तरह कमजोर पड़ सकता है।

सवाल यह भी है कि क्या सपा सामाजिक न्याय के साथ रोजगार, शिक्षा, महंगाई और प्रशासनिक जवाबदेही का विश्वसनीय विकल्प पेश कर पाएगी? रुहेलखंड में अखिलेश ने भाजपा की घेराबंदी जरूर शुरू की है, लेकिन सत्ता का रास्ता दल-बदल की तस्वीरों से नहीं निकलता। भाजपा को अपने सामाजिक आधार में दरार रोकनी होगी और सपा को साबित करना होगा कि उसका विस्तार केवल नेताओं की अदला-बदली नहीं है। आखिरकार चुनाव में चेहरे बदलने से ज्यादा जरूरी जनता का भरोसा बदलना है। यही 2027 की सबसे कठिन राजनीतिक परीक्षा होगी।

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