
Mumbai: अभिनेता गुलशन देवैया और रसिका दुग्गल की पारिवारिक फिल्म ‘लिटिल थॉमस’ इन दिनों सिनेमाघरों में दर्शकों के बीच मौजूद है। फिल्म की खास बात इसकी भावनात्मक कहानी के साथ-साथ इसके पीछे काम करने वाली अनुभवी रचनात्मक टीम भी है। इस फिल्म के जरिए तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता एक साथ आए हैं, जिन्होंने कहानी, निर्देशन और संगीत के जरिए इसे एक खास पहचान देने की कोशिश की है।
परिवार और रिश्तों की भावनात्मक कहानी
‘लिटिल थॉमस’ की कहानी 1990 के दशक के गोवा में बुनी गई है। फिल्म के केंद्र में सात साल का एक बच्चा है, जो अपनी मासूम कोशिशों के जरिए परिवार को फिर से एक साथ लाना चाहता है। बच्चे की यह इच्छा कहानी को भावनात्मक बनाती है और परिवार के सदस्यों के बीच रिश्तों की अहमियत को सामने लाती है।
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फिल्म में गुलशन देवैया और रसिका दुग्गल मुख्य भूमिकाओं में नजर आते हैं, जबकि युवा कलाकार हृदांश पारेख भी अहम किरदार निभा रहे हैं। पारिवारिक रिश्तों, बचपन की मासूमियत और अपनों को करीब लाने की कोशिशों पर आधारित यह कहानी दर्शकों को एक आत्मीय अनुभव देने का प्रयास करती है।
कौशल ओझा के निर्देशन में तैयार हुई फिल्म
फिल्म का लेखन और निर्देशन कौशल ओझा ने किया है। वह अपनी शॉर्ट फिल्मों ‘वैष्णव जन तो’ और ‘आफ्टरग्लो’ के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत चुके हैं। ‘लिटिल थॉमस’ में उन्होंने पारिवारिक संबंधों और एक बच्चे की भावनात्मक दुनिया को कहानी का आधार बनाया है।
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इस परियोजना को आगे बढ़ाने में निर्माता रंजन सिंह की भी अहम भूमिका रही। सिंह इससे पहले ‘मसान’, ‘क्वीन’, ‘एनएच10’ और ‘उड़ता पंजाब’ जैसी चर्चित फिल्मों से जुड़े रहे हैं। उन्हें ‘लिटिल थॉमस’ की पटकथा पसंद आई और वह इसे फिल्ममेकर अनुराग कश्यप के पास लेकर गए।
अनुराग कश्यप ने भी दिखाई कहानी में दिलचस्पी
‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’, ‘देव डी’ और ‘अग्ली’ जैसी फिल्मों के लिए पहचाने जाने वाले अनुराग कश्यप भी इस प्रोजेक्ट का हिस्सा बने। वह राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म ‘मसान’ के सह-निर्माताओं में भी शामिल रहे हैं। फिल्म की कहानी में परिवार और आपसी रिश्तों से जुड़ी संवेदनशीलता ने उन्हें आकर्षित किया। इस तरह कौशल ओझा, अनुराग कश्यप और संगीतकार शैलेन्द्र बर्वे के रूप में तीन राष्ट्रीय पुरस्कार विजेताओं की प्रतिभा इस फिल्म से जुड़ी है।
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संगीत में भी दिखेगा खास अंदाज
फिल्म के संगीत की जिम्मेदारी शैलेन्द्र बर्वे ने संभाली है। उन्हें फिल्म ‘संहिता’ के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। संगीत तैयार करते समय कहानी की गर्मजोशी, भावनात्मक गहराई और 1990 के दशक के गोवा के माहौल को ध्यान में रखा गया।
बर्वे ने फिल्म के लिए ऐसा साउंडट्रैक तैयार किया है, जिसमें ध्वनिक संगीत की सादगी और सुकून भरे सुरों को प्रमुखता दी गई है। उनके संगीत का उद्देश्य कहानी के भावनात्मक पहलुओं को और प्रभावशाली बनाना है।
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