
West Bengal पश्चिम बंगाल में मदरसों की कार्यप्रणाली और फंडिंग को लेकर सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। राज्य सरकार ने जिला प्रशासन को करीब 8,000 मदरसों की सूची सौंपते हुए 5 जुलाई तक विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। इस जांच में मदरसों की फंडिंग, शिक्षकों की योग्यता, पाठ्यक्रम, बुनियादी सुविधाओं और भूमि संबंधी दस्तावेजों की पड़ताल की जाएगी।
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सरकारी सूत्रों के अनुसार, यह कवायद उन मदरसों की पहचान करने के लिए की जा रही है जो निजी स्तर पर संचालित हो रहे हैं या जिनकी गतिविधियों और वित्तीय स्रोतों को लेकर स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। जांच के दौरान यदि किसी मदरसे में अनियमितता, संदिग्ध फंडिंग या अन्य गंभीर गड़बड़ियां सामने आती हैं तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सकती है। अवैध रूप से कब्जाई गई जमीन पर संचालित संस्थानों पर प्रशासनिक कार्रवाई की संभावना भी जताई जा रही है।
जिला प्रशासन को सौंपा गया जिम्मा
राज्य सरकार ने 5 जून को सभी जिलाधिकारियों को संबंधित मदरसों की सूची भेजते हुए निर्धारित समय सीमा के भीतर रिपोर्ट उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। रिपोर्ट मिलने के बाद सरकार आगे की कार्रवाई पर निर्णय लेगी। सूत्रों के मुताबिक मदरसों की आर्थिक गतिविधियों और फंडिंग स्रोतों की गहन जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) गठित किए जाने पर भी विचार किया जा रहा है।
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फंडिंग और गतिविधियों पर रहेगी नजर
अधिकारियों का कहना है कि जांच का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सभी शैक्षणिक संस्थान निर्धारित नियमों और मानकों का पालन कर रहे हैं। सरकार यह भी जानना चाहती है कि इन संस्थानों में पढ़ाई का स्वरूप क्या है, शिक्षक कितने योग्य हैं और संस्थानों को आर्थिक सहायता किन स्रोतों से प्राप्त हो रही है।
मदरसों की संख्या को लेकर अलग-अलग दावे
सरकारी अधिकारियों के अनुसार पश्चिम बंगाल में मदरसों की वास्तविक संख्या को लेकर पहले कभी कोई आधिकारिक और व्यापक आंकड़ा सार्वजनिक नहीं किया गया। हालांकि 2015 में राज्य में लगभग 11,000 मदरसों के होने का अनुमान लगाया गया था। इनमें सरकारी सहायता प्राप्त, पंजीकृत गैर-सहायता प्राप्त और निजी स्तर पर संचालित विभिन्न श्रेणियों के मदरसे शामिल हैं।
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क्या हैं खारिजी मदरसे?
खारिजी मदरसे वे संस्थान माने जाते हैं जो किसी सरकारी या बोर्ड प्रणाली से औपचारिक रूप से संबद्ध नहीं होते। इनका संचालन आमतौर पर मस्जिद समितियों, वक्फ संस्थाओं या स्थानीय धार्मिक संगठनों द्वारा किया जाता है। इनमें मुख्य रूप से धार्मिक और अरबी शिक्षा पर जोर दिया जाता है। सरकार की मौजूदा कवायद में ऐसे संस्थानों की भी स्थिति और संचालन व्यवस्था की समीक्षा किए जाने की संभावना है।
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इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। जहां सरकार इसे प्रशासनिक और नियामकीय प्रक्रिया बता रही है, वहीं कुछ अल्पसंख्यक संगठनों ने इसे समुदाय विशेष को निशाना बनाने की कोशिश बताया है। फिलहाल सभी की नजर 5 जुलाई तक आने वाली जिला प्रशासन की रिपोर्ट पर टिकी हुई है।
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