चेहरा चमकाने के लिये अब केजरीवाल का न्यायपालिका पर निशाना

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अजय कुमार

आम आदमी पार्टी के अध्यक्ष और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल एक बार फिर अपने पुराने ढर्रे आरोप लगाकर भाग जाने वाली राजनीति करने लगे हैं। पहले उनके आरोप की जद में प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी के अन्य नेता अमित शाह आदि शामिल होते थे। कांग्रेस पर भी खूब हमला बोलते थे, लेकिन अब वह न्यायपालिका पर आरोप लगाने लगे हैं। शराब घोटाले में फंसे केजरीवाल चाहते हैं कि राउज एवेन्यू कोर्ट की तरह उन्हें हाईकोर्ट से भी क्लीन चिट मिल जाये, जब केजरीवाल को ऐसा होता नहीं लगा तो वह हाईकोर्ट की जज पर ही हमलावर हो गये। अब तो शराब घोटाले में फंसे केजरीवाल यह तक कहने लगे हैं कि वह गांधी की तरह आंदोलन करेंगे और हाईकोर्ट की उस जज के सामने पेश नहीं होंगे, जिनको लेकर वह आशंकित है। दरअसल, बीती 27 फरवरी 2026 को दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया जिसने पूरे राजनीतिक परिदृश्य को हिला दिया। पूर्व दिल्ली मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को दिल्ली शराब नीति घोटाले के मामले में बरी कर दिया गया। जज ने साफ कहा कि जांच एजेंसियों के पास ठोस सबूतों का अभाव है। आरोपों को महज कयासों पर टिकाए रखना न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है। कोर्ट ने न केवल केजरीवाल बल्कि अन्य आरोपियों को भी सबूतों की कमी के चलते बरी कर दिया। इस फैसले के बाद केजरीवाल भावुक हो गए। उन्होंने कहा, यह सत्य की जीत है। वर्षों की सुनवाई के बाद मिली यह राहत आम आदमी पार्टी के लिए ऐतिहासिक पल था। लेकिन यह अंत नहीं, बल्कि एक नई कानूनी जंग की शुरुआत साबित हुई।

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राउज एवेन्यू कोर्ट के फैसले ने केंद्र सरकार और जांच एजेंसियों को झटका दिया। सीबीआई ने तुरंत अपील दायर करने का फैसला किया। मात्र चार दिन बाद, 3 मार्च 2026 को दिल्ली हाईकोर्ट में मामला पहुंच गया। सीबीआई ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को गलत ठहराते हुए कहा कि सबूतों को नजरअंदाज किया गया। केजरीवाल को बरी करने को जल्दबाजी का फैसला करार दिया। हाईकोर्ट ने स्टे नहीं दिया, लेकिन सुनवाई की तारीखें तय कर दीं। इसी बीच केजरीवाल ने अपनी रणनीति बदली। उन्होंने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा पर पक्षपात का आरोप लगाया। जस्टिस शर्मा हाईकोर्ट की बेंच का हिस्सा हैं, जो इस मामले की सुनवाई कर रही हैं। केजरीवाल ने दावा किया कि जस्टिस शर्मा का राजस्थान प्रशासनिक सेवा, आरएएस से पुराना नाता है। इससे उन पर पूर्वाग्रह का सवाल उठता है।यह विवाद 10 अप्रैल 2026 को चरम पर पहुंचा। केजरीवाल ने हाईकोर्ट में आवेदन दायर किया। उन्होंने जस्टिस शर्मा को मामले से हटाने की मांग की। तर्क दिया कि जस्टिस शर्मा का पति भी राजस्थान सिविल सेवा में हैं। केजरीवाल ने इसे आरएएस का नेटवर्क करार दिया। उन्होंने कहा कि राजस्थान सरकार से जुड़े होने के कारण जस्टिस शर्मा निष्पक्ष नहीं रहेंगी। भाजपा शासित केंद्र के दबाव में फैसला करेंगी। यह आरोप हाईकोर्ट में गरमा गया। जस्टिस शर्मा ने व्यक्तिगत टिप्पणी की। उन्होंने केजरीवाल पर कोर्ट की अवमानना का आरोप लगाया। कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री ऐसी भाषा का इस्तेमाल नहीं कर सकते। हाईकोर्ट ने केजरीवाल को नोटिस जारी किया। सुनवाई 18 अप्रैल को हुई। सुनवाई के दौरान केजरीवाल के वकील ने सबूत पेश किए। जस्टिस शर्मा के पुराने फैसलों का हवाला दिया। दावा किया कि कई मामलों में भाजपा नेताओं के हक में फैसले आए। उदाहरण के तौर पर 2024 का एक केस, जहां जस्टिस शर्मा ने एडीएम को जमानत दी, जो भाजपा से जुड़े थे। दूसरी ओर सीबीआई ने इसे राजनीतिक स्टंट बताया। कहा कि केजरीवाल ट्रायल कोर्ट की बरीगी बचाने के लिए जज को बदनाम कर रहे हैं। हाईकोर्ट ने केजरीवाल को फटकार लगाई। जस्टिस स्वर्णकांता ने खुद कहा कि उनके फैसले हमेशा कानून पर आधारित रहे। आरएएस का कोई प्रभाव नहीं। फिर भी, बेंच ने फैसला सुरक्षित रखा। 25 अप्रैल 2026 को अंतरिम आदेश आया। जस्टिस शर्मा मामले में बनी रहीं, लेकिन केजरीवाल को बोलने की छूट दी गई।

इस पूरे घटनाक्रम ने उस समय राजनीतिक रंग ले लिया, जब अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी ने इसे न्यायिक साजिश का नाम दिया। केजरीवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। कहा कि सिस्टम भ्रष्ट है। भाजपा न्यायपालिका को भी कब्जे में लेना चाहती है। विपक्षी दलों ने समर्थन किया। कांग्रेस और सपा ने केजरीवाल के पक्ष में बयान दिए। वहीं भाजपा ने पलटवार किया। कहा कि केजरीवाल भ्रष्टाचार के आरोपी हैं। जज पर कीचड़ उछालकर बच निकलना चाहते हैं। शराब घोटाले में 336 करोड़ के नुकसान का मामला है। ईडी की चार्जशीट में दक्षिणी दिल्ली की 21 सबसे महंगी शराब दुकानों को कंपनियों को देने का खुलासा हुआ। केजरीवाल की सरकार ने नीति बदली, जिससे निजी कंपनियों को फायदा पहुंचा। सीबीआई का दावा है कि पैसे चुनावी फंड में गए।अब सवाल उठता है कि केजरीवाल इन आरोपों से क्या साबित करना चाहते हैं। मुख्यतः तीन बातें। पहली, जांच एजेंसियों का दुरुपयोग। वे कह रहे हैं कि सीबीआई और ईडी भाजपा के इशारे पर काम कर रही हैं। जस्टिस शर्मा पर आरएएस कनेक्शन का आरोप इसी का हिस्सा है। दूसरी, न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल। केजरीवाल ट्रायल कोर्ट के फैसले को मजबूत करना चाहते हैं। अगर हाईकोर्ट जज बदल दे, तो अपील कमजोर पड़ सकती है। तीसरी, राजनीतिक लाभ। यह मुद्दा आम आदमी पार्टी को पीड़ित का चेहरा दे रहा है। केजरीवाल की छवि भ्रष्टाचार विरोधी नेता की बनी रहेगी। समर्थकों में सहानुभूति बढ़ेगी। भाजपा पर तानाशाही का ठप्पा लगेगा।

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इससे केजरीवाल को कई फायदे हो रहे हैं। कानूनी तौर पर, अगर जज बदले या हाईकोर्ट अपील खारिज कर दे, तो सुप्रीम कोर्ट का रास्ता साफ। राजनीतिक रूप से, यह मुद्दा चुनावी एजेंडा बन गया। आप ने सोशल मीडिया पर अभियान चला रखा। सर्वे बताते हैं कि दिल्ली में केजरीवाल की लोकप्रियता बढ़ी है। 40 प्रतिशत वोटर अब उन्हें निर्दोष मानते हैं। आर्थिक नुकसान कम हुआ। घोटाले के दाग से मुक्ति मिली। भविष्य में केंद्र की राजनीति में वापसी आसान। लेकिन जोखिम भी हैं। अगर हाईकोर्ट ने बरीगी पलट दी, तो जेल की नौबत। अवमानना का केस अलग से चल सकता है।शराब घोटाला 2021 से चला आ रहा है। अरविंद केजरीवाल की सरकार ने नई शराब नीति लाई। कोविड के बाद राजस्व बढ़ाने का लक्ष्य था। लेकिन आरोप लगा कि सांठगांठ से कंपनियों को फायदा पहुंचाया। मनीष सिसोदिया गिरफ्तार हुए। केजरीवाल को भी नोटिस मिले। ट्रायल कोर्ट ने सबूतों की कमी बताई। सीबीआई ने चार्जशीट में 100 पेज के दस्तावेज पेश किए। लेकिन कोर्ट ने उन्हें अपर्याप्त माना। बहरहाल, यह मामला भारतीय न्याय व्यवस्था की पड़ताल कराता है। क्या राजनीतिक दबाव जजों पर असर डालता है। केजरीवाल का दांव चालाकी भरा है। वे जानते हैं कि जज बदलना मुश्किल, लेकिन विवाद पैदा करना आसान। इससे मीडिया कवरेज मिलता है। जनता का समर्थन बढ़ता है। भाजपा सरकार पर दबाव बनता है। अंततः, यह केजरीवाल की रणनीति का हिस्सा लगता है। सत्य की जीत का नारा दोहराते हुए वे सत्ता की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन कानूनी फैसला ही अंतिम सत्य तय करेगा।


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