भारत की कूटनीति रंग लाई, ईरान से भारत पहुंचे तेल टैंकर

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संजय सक्सेना

भारत के मुसलमान और अन्य कुछ राजनीतिक दल  भले ही मोदी सरकार को ईरान का साथ न देने के लिए कोस रहे हो लेकिन ईरान में माहौल दूसरा है. जब दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतों को लेकर हर तरफ बेचैनी का माहौल है, तब भारत सरकार ने कूटनीतिक मोर्चे पर एक अहम कामयाबी हासिल की है। ईरान ने भारत के झंडे वाले तेल टैंकरों को होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने की इजाजत दे दी है। यह राहत ऐसे वक्त में मिली है जब पूरी दुनिया की निगाहें इस संकरे लेकिन बेहद अहम समुद्री रास्ते पर टिकी हुई हैं। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर की सक्रिय कूटनीति और ईरान के साथ सीधी बातचीत को इस सफलता की सबसे बड़ी वजह माना जा रहा है। जानकारों का कहना है कि जयशंकर और ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची के बीच हाल ही में हुई बातचीत के बाद ईरान ने यह फैसला लिया। भारत ने अपने तेल आयात को लेकर ईरान के सामने अपनी जरूरत साफ तौर पर रखी और यह समझाया कि भारतीय टैंकरों का इस रास्ते से गुजरना दोनों देशों के हित में है। ईरान ने भारत की इस बात को माना और होर्मुज से भारतीय जहाजों के गुजरने का रास्ता खोल दिया। यह भारत की उस परंपरागत विदेश नीति की जीत है जिसमें बातचीत और संवाद को हथियार की जगह प्राथमिकता दी जाती है।

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होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त और सबसे संवेदनशील समुद्री रास्तों में से एक है। दुनिया भर में होने वाले कच्चे तेल के कुल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। फारस की खाड़ी के देशों से निकलने वाला तेल इसी संकरे समुद्री दरवाजे से होकर दुनिया के बाकी हिस्सों तक पहुंचता है। भारत जैसे देश के लिए, जो अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है, इस रास्ते का बंद होना या खतरनाक हो जाना सीधे तौर पर तेल की उपलब्धता और कीमतों पर असर डालता है। ईरान की तरफ से राहत मिलने के बाद भारत के दो तेल टैंकर पुष्पक और परिमल सुरक्षित रूप से होर्मुज से गुजरे हैं। यह खबर उन लाखों लोगों के लिए राहत भरी है जो देश में तेल की कमी और कीमतों में उछाल को लेकर चिंतित थे। इससे पहले एक और टैंकर जिसका कप्तान भारतीय बताया जा रहा है, वह भी इस रास्ते से सफलतापूर्वक पार हो गया। यह जहाज युद्ध शुरू होने के बाद से इस मार्ग को पार कर भारत आने वाला पहला जहाज था। रिपोर्टों के मुताबिक सऊदी अरब का कच्चा तेल लेकर चल रहा यह लाइबेरिया के झंडे वाला जहाज दो दिन पहले होर्मुज से गुजरा और अभी मुंबई बंदरगाह पर रुका हुआ है।

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‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़’ में बढ़ती टकराहट, पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट की आहट

भारत की ऊर्जा जरूरतें साल दर साल बढ़ती जा रही हैं। देश की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, उद्योगों की मांग और आम जनता की जरूरतें पूरी करने के लिए कच्चे तेल की निर्बाध आपूर्ति बेहद जरूरी है। भारत अपनी जरूरत का करीब पचासी फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल बाहर से मंगाता है और इसमें खाड़ी देशों की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है। ऐसे में अगर होर्मुज जैसा अहम रास्ता लंबे समय तक बंद रहे तो इसका असर सिर्फ तेल कंपनियों पर नहीं, बल्कि हर उस भारतीय परिवार पर पड़ता है जो रोजाना किसी न किसी रूप में पेट्रोल, डीजल या गैस का इस्तेमाल करता है।जयशंकर की यह कामयाबी इसलिए भी खास है क्योंकि यह उस दौर में आई है जब दुनिया के कई बड़े देश खाड़ी क्षेत्र में तनाव के चलते अपने तेल आपूर्ति के रास्तों को लेकर परेशान हैं। कई देशों के जहाज होर्मुज से गुजरने में झिझक रहे थे और तेल बाजार में इसका सीधा असर कीमतों पर दिख रहा था। भारत ने इस मुश्किल घड़ी में चुप बैठने की बजाय सक्रिय कदम उठाया, ईरान से सीधे बातचीत की और नतीजा सबके सामने है।

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भारत और ईरान के बीच संबंध ऐतिहासिक रूप से गहरे रहे हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार, संस्कृति और कूटनीति के रिश्ते सदियों पुराने हैं। हालांकि बीते कुछ सालों में अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से भारत और ईरान के बीच तेल व्यापार में कमी आई थी, लेकिन दोनों देशों के बीच राजनीतिक और कूटनीतिक संबंध हमेशा बने रहे। भारत की यह कोशिश रही है कि वह एक तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों से अच्छे संबंध बनाए रखे और दूसरी तरफ ईरान जैसे पड़ोसी मुल्कों से भी रिश्ते खराब न हो। इस संतुलन की कूटनीति का ही नतीजा है कि आज भारत ईरान से यह राहत हासिल करने में कामयाब रहा जो शायद किसी और देश के बस की बात नहीं थी।

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इस पूरे घटनाक्रम से यह भी साफ होता है कि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर कितना गंभीर है। सरकार ने न सिर्फ वैकल्पिक तेल आपूर्ति के रास्ते तलाशने शुरू कर दिए हैं, बल्कि मौजूदा रास्तों को सुरक्षित और खुला रखने के लिए कूटनीतिक स्तर पर पूरी ताकत लगा दी है। यह कदम देश की आर्थिक स्थिरता और आम जनता के हितों की रक्षा के नजरिए से बेहद जरूरी था।पुष्पक और परिमल जैसे टैंकरों का होर्मुज से सुरक्षित गुजरना महज एक खबर नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि भारत की कूटनीति काम कर रही है। यह इस बात की मिसाल है कि जब सही समय पर सही तरीके से बातचीत की जाए तो बड़ी से बड़ी रुकावटें भी हट जाती हैं। भारत सरकार की यह सक्रियता आने वाले दिनों में देश की तेल आपूर्ति को स्थिर रखने में मददगार साबित होगी और कीमतों पर काबू रखने में भी सहायक रहेगी।

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