गणगौर पूजा आज: सुहाग, सौभाग्य और मनोकामनाओं का पावन पर्व

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राजेन्द्र गुप्ता

सनातन धर्म में गणगौर व्रत का विशेष महत्व है। इसे तृतीया तीज के नाम से भी जाना जाता है। इस पावन दिन देवी गौरी और भगवान शंकर की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। यह व्रत खासतौर पर विवाहित महिलाओं और कुंवारी कन्याओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। जहां विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं, वहीं अविवाहित कन्याएं मनचाहा वर पाने के लिए यह व्रत रखती हैं। इस वर्ष गणगौर पर रवि योग का शुभ संयोग बन रहा है, जिससे इस पर्व का महत्व और भी बढ़ गया है।

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गणगौर पूजा तिथि

पंचांग के अनुसार, चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि 21 मार्च 2026 को प्रातः 02:31 बजे से आरंभ होकर रात्रि 11:57 बजे तक रहेगी। ऐसे में शनिवार, 21 मार्च को गणगौर व्रत और पूजा का विशेष विधान किया जाएगा।

गणगौर पूजा-विधि

गणगौर के दिन महिलाएं प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं। इसके बाद मिट्टी या लकड़ी की ईसर-गौर (भगवान शिव और माता पार्वती) की प्रतिमा स्थापित की जाती है। पूजा के दौरान सुहाग सामग्री जैसे चुनरी, सिंदूर, मेहंदी, चूड़ी आदि अर्पित की जाती हैं। रोली, अक्षत, पुष्प और जल से विधिवत पूजन किया जाता है। महिलाएं पारंपरिक गणगौर गीत गाती हैं और अंत में प्रसाद अर्पित कर परिवार में वितरित करती हैं। कई स्थानों पर इस अवसर पर भव्य शोभायात्राएं भी निकाली जाती हैं।

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गणगौर का महत्व

गणगौर पर्व वैवाहिक सुख, प्रेम और सौभाग्य का प्रतीक है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से पूजा करने पर दांपत्य जीवन में प्रेम और सामंजस्य बढ़ता है। अविवाहित कन्याओं को योग्य वर की प्राप्ति होती है, जबकि विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है। विशेषकर राजस्थान में यह पर्व अत्यंत धूमधाम और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है, जहां महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सजकर गीत-नृत्य के साथ इस उत्सव को जीवंत बनाती हैं।

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