
उत्तर प्रदेश की सियासत में मुस्लिम मतदाता सदैव निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। करीब 125 सीटों पर इनका असर सीधे नतीजों को प्रभावित करता है, खासकर पश्चिमी इलाके में जहां मुस्लिम आबादी चालीस फीसद तक पहुंच जाती है। भाजपा को छोड़ अन्य सभी दल इन मतों को हथियाने के लिए होड़ लगाए रहते हैं, और समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव इस दौड़ में सबसे आगे दिखते हैं। जेल में बंद आजम खान से लेकर बसपा और कांग्रेस छोड़ हाल ही में पार्टी में आए नसीमुद्दीन सिद्दीकी तक पर वे दांव लगा रहे हैं, ताकि यूपी में मुस्लिम वोटों के एक और सौदागर ओवैसी की बढ़ती चुनौती का मुकाबला हो सके। आज हालात यह है कि जेल में बंद आजम खान की कमी सपा के लिए गहरी चोट साबित हो रही है, क्योंकि रामपुर से सहारनपुर तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश की उन 60 से अधिक सीटों पर उनका जादू बरकरार है जहां मुस्लिम मतदाता जीत हार तय करते हैं। जेल की चारदीवारी में बंद होते हुए भी उनके समर्थक बाहर चिल्ला रहे हैं, पश्चिमी इलाके के छह जिलों में मुस्लिम आबादी पैंतालीस फीसद से ऊपर होने के कारण वहां सपा का वोट बैंक डगमगाने लगा है। नसीमुद्दीन सिद्दीकी इस कमी को कितना भर पाएंगे, यह सवाल खड़ा हो गया है, क्योंकि बसपा से होते हुए कांग्रेस तक अपनी यात्रा में उन्होंने बुंदेलखंड के दर्जन भर जिलों में मुस्लिम मतों को संगठित करने का लोहा मनवा लिया है। हाल ही में पंद्रह फरवरी को सपा में शामिल होने के बाद वे बुंदेलखंड की उन पचास सीटों पर फोकस कर रहे हैं जहां मुस्लिम आबादी तीस फीसद के आसपास है, और पूर्व में बसपा के प्रमुख मुस्लिम नेता के रूप में उन्होंने वहां सत्रह विधायकों को जुटाया था।
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नसीमुद्दीन की ताकत उनकी रणनीतिक चतुराई में है, जो आजम की जमीनी पकड़ से अलग लेकिन पूरक साबित हो सकती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आजम के खालीपन को वे पूरी तरह न भर सकें, क्योंकि वहां सहारनपुर से मुरादाबाद तक की इक्कीस मुस्लिम बहुल सीटों पर आजम का नाम ही वोट जुटाता रहा है। लेकिन बुंदेलखंड में उनकी पैठ गहरी है, जहां झांसी, बांदा, चित्रकूट जैसे जिलों की अट्ठारह सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक हैं और नसीमुद्दीन ने बसपा काल में इनमें से आधे पर असर डाला था। सपा को कुल मिलाकर एक सौ पचास सीटों पर फायदा हो सकता है, क्योंकि नसीमुद्दीन पूर्वांचल से बुंदेलखंड तक सौ से अधिक सीटों पर मुस्लिम युवाओं को लुभाने का दावा कर रहे हैं। ओवैसी की पार्टी हर ग्राम पंचायत में इकसठ सदस्यीय समितियां गढ़ रही है, जो पश्चिमी इलाके की पचास सीटों पर सेंध लगा सकती है, लेकिन नसीमुद्दीन का अनुभव इस खतरे को कम कर सकता है। सपा के अन्य मुस्लिम नेताओं द्वारा नसीमुद्दीन को स्वीकारना आसान नहीं होगा, क्योंकि पार्टी में पहले से इमरान मसूद जैसे सहारनपुर के दिग्गज हैं जिन्होंने पश्चिमी इलाके में दर्जन भर सीटों पर असर जमाया है। आशु मलिक जैसे नेता भी जिले के निकाय चुनावों में इमरान से टकरा चुके हैं, और सिसामऊ से इरफान सोलंकी तक सपा के छत्तीस मुस्लिम विधायकों में आंतरिक खींचतान पुरानी है। नसीमुद्दीन को बुंदेलखंड संभालने का मौका मिला तो इमरान सहारनपुर की आठ सीटों पर असहज हो सकते हैं, क्योंकि दोनों का वोट बैंक ओवरलैप करता है। लेकिन अखिलेश की चतुराई से यह संतुलन बन सकता है, क्योंकि पिछले चुनावों में सपा ने इक्यावन मुस्लिम बहुल सीटों पर मजबूत प्रदर्शन किया था और नसीमुद्दीन जैसे चेहरे से वह संख्या सत्तर तक पहुंच सकती है।
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आजम की कमी का असर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उन छब्बीस जिलों में सबसे ज्यादा दिखेगा जहां मुस्लिम आबादी छब्बीस फीसद है, और सपा को वहां सत्तावन सीटें गंवाने का डर सता रहा है। नसीमुद्दीन इसकी भरपाई बुंदेलखंड से कर सकते हैं, जहां उन्होंने बसपा में अठारह नेताओं को संगठित किया था और अब सपा के सत्रह पूर्व विधायकों के साथ मिलकर चालीस सीटों पर दबदबा बना सकते हैं। ओवैसी का भूत सपा के सिर सवार है, क्योंकि उनकी पार्टी पंचायत स्तर पर बूथ मजबूत कर रही है और मुस्लिम युवाओं को छीनने की कोशिश में जुटी है, लेकिन नसीमुद्दीन का आना सपा को सांस लेने का मौका देगा। शिवपाल सिंह यादव की जेल मुलाकातें आजम का आशीर्वाद दिला सकती हैं, और अगर आजम ने हामी भरी तो नसीमुद्दीन को आगे बढ़ाया जाएगा।सपा की भाषा शैली अब बदल रही है, क्योंकि नसीमुद्दीन जैसे नेता मुस्लिम वोटों को जोड़ने के साथ जाट और पिछड़े समीकरण भी साधेंगे। उत्तर प्रदेश की कुल मुस्लिम आबादी पांच करोड़ के करीब पहुंच चुकी है, जो सवा सौ सीटों प
