समय रहते भू-उपयोग को नियंत्रित नहीं किया तो आने वाले समय में पड़ जायेंगे भोजन के लाले

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डाँ. सीमा जावेद वरिष्ठ पत्रकार, पर्यावरणविद


जलवायु परिवर्तन के लिए केवल प्रदूषण या चिमनियों से उगलता काला धुआं, वाहनों और मशीनों के इस्तेमाल से निकली ग्रीन हाउस गैस ही इसके लिये जिम्मेदार नहीं है, बल्कि जिस तरह से पूरी दुनिया में भू-संपदा का दोहन किया जा रहा है, वह भी क्लाइमेट चेंज का एक कारण है। जमीन को लेकर हमारी मांगे अभूतपूर्व तरीके से बढ़ती जा रही है। मानवीय गतिविधियों के माध्यम से भूमि का उपयोग के पैटर्न में बदलाव कई तरीकों से होता है| इसके उदहारण कुछ इस प्रकार से दिये जा सकते हैं- इंडोनेशिया में प्रत्येक वर्ष 500 वर्ग किलोमीटर के वन-क्षेत्र का सफाया किया जाता है| दूसरा उदहारण है दुनिया के विभिन्न देशों में शहरीकरण के लिये जंगलों का काटा जाना| भारत सहित तमाम देशों में शहरों का विस्तारीकरण औपचारिक सीमाओं से बाहर भी किया जा रहा है| गाँव दर गाँव उजाड़ कर शहर बस रहे हैं।

संयुक्त राष्‍ट्र के इंटरगवर्नमेंटल पैनल फॉर क्लाइमेट चेंज (IPCC) ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों के जरिेये दुनिया भर में भूमि के प्रयोग पर अध्‍ययन किया है। उसी अध्‍ययन की रिपोर्ट आज-कल में जिनेवा में जारी की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर समय रहते भू-उपयोग को नियंत्रित नहीं किया गया तो आने वाले समय में भोजन की समस्‍या पैदा हो सकती है। जलवायु परिवर्तन की सबसे ज्यादा मार कृषि क्षेत्र पर पड़ेगी, जिसकी उत्पादकता में काफी गिरावट आ सकती है । इसका मतलब कि जलवायु परिवर्तन नहीं रोका तो हमें खाने के लाले पड. जायेंगे गौरतलब है कि यह मन जा रहा है कि वर्ष 2027तक भारत की जनसँख्या चीन से ज्यादा होगी। साफ़ ज़ाहिर है कि खाने कि कमी का असर भी हमारे देश पर ज्यादा पड़ेगा इसलिए जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए भी हमें और ज्यादा जागरूक होना पड़ेगा। इस साल की शुरूआत में प्रकाशित IPBES (The Intergovernmental Science-Policy Platform on Biodiversity and Ecosystem Services) रिपोर्ट में यह पता चलता है कि, एक ओर जहां पूरे विश्व में अभूतपूर्व दर से जैव विविधता घटती जा रही है, वहीं दूसरी ओर जहां पर आदिवासी, वनवासी आबादी है और वह अपने ईलाके का खुद व्यवस्था कर रहे हैं वहां पर जैव विविधता के घटने का दर काफी कम है।

अब तक हमें जो देखने के मिला है उससे यह साबित होता है की हमारे अखंड वनों और बस्तीयों की सुरक्षा के लिए आदिवासी, वनवासी सर्वश्रेष्ठ संरक्षक / हथियार हैं। इस के अलावा कुछ किस्सों में तो हमने यह भी देखा है की जलवायु में आ रहे परिवर्तन को सबसे पहले उन्होनें महसूस किया है। उन्होंने यह भी महसूस किया है कि निहित स्वार्थों की वजह से जब स्थानिय संपदा को नुकसान पहुंचता है तो उसे बचाने के लिए लडना भी पडता है। जमीन, भू-उपयोग तथा भू-प्रबन्‍धन हमारे जलवायु तंत्र का महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा हैं। धरती की मिट्टी, जंगल तथा अन्‍य पौधे, उसकी भू प्रणाली वगैरह ग्रीनहाउस गैसों का उत्‍सर्जन करते हैं लेकिन वे उन गैसों को सोखते भी हैं। कार्बन जमीन और पर्यावरण के बीच चक्रानुसार घूमता है और यह मिट्टी तथा बायोमास में भरा रहता है। जब जमीन क्षतिग्रस्‍त या खराब होती है, जब मिट्टी की परत पतली हो जाती है, जब जंगल काटे जाते हैं, या फिर उनके स्‍थान पर पौधे लगाये जाते हैं तब वह खराब हो चुकी जमीन अपने पास जमा कार्बन को छोड़ना शुरू करती है। इससे ग्रीनहाउस गैस के बढ़े हुए उत्‍सर्जन के कारण जलवायु परिवर्तन की रफ्तार तेज हो जाती है।

जहां तक कार्बन डाई ऑक्‍साइड का सवाल है तो एक अनुमान के मुताबिक वर्ष 2007 से 2016 के बीच इंसान द्वारा छोड़ी गयी कुल कार्बन डाई ऑक्‍साइड में से 12 प्रतिशत के बराबर उत्‍सर्जन तो जमीन से ही हुआ है। यह ज्‍यादातर इंसान की हरकतों की वजह से हुआ है। खासकर उष्‍णकटिबंधीय जंगलों को काटने और वन के अन्‍य प्रकार के प्रबन्‍धन कार्यों से ऐसा हुआ। सिर्फ जमीन की गुणवत्ता में गिरावट से ही पूरी दुनिया में भोजन के उत्पादन में 12% की कमी आने का अनुमान है। तापमान में हर एक डिग्री की बढ़ोत्‍तरी होने से फसलों का रकबा, उत्पादकता और पशुधन उत्पादन में गिरावट आएगी, जिसके प्रभाव उनसे संबंधित क्षेत्रों के हिसाब से अलग-अलग होंगे। वर्ष 1981 से 2009 के बीच भारत में तापमान बढ़ने से खेती के रकबे में 5.2% की कमी आई थी। ऐसे में भविष्य में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए भारत को अपनी ज़मीन के संरक्षण की तरफ ध्यान देना होगा । रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर समय रहते भू-उपयोग को नियंत्रित नहीं किया गय तो आने वाले समय में भोजन की समस्‍या पैदा हो सकती है।

 डा.सीमा जावेद वरिष्ठ पत्रकार, पर्यावरणविद

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