- राजनीति में सीखना जरूरी है, वरना कुर्सी बोझ बन जाती है,
- नगर पंचायत चलाने में विफलता अध्यक्ष की अक्षमता का प्रमाण
विजय श्रीवास्तव
बढनी/लखनऊ । नेपाली नेता के समर्थन और अपनी जाति-विरादरी के संख्या बल से नगर पंचायत अध्यक्ष तो बना जा सकता है, और मीडिया को मैनेज कर कुछ दिनों तक विकास का ढिंढोरा भी पीटा जा सकता है, लेकिन चुनाव से पहले जनता से किए गए विकास के वादों को कतई पूरा नहीं किया जा सकता। इसके लिए अनुभव होना आवश्यक है छल-कपट, सेटिंग-गेटिंग, लेन-देन प्रतिशत, झूठ-सच की समझ और मौजूदा माहौल की जानकारी बेहद जरूरी प्रतीत होती है। जिसे ये सारे गुण राजनीतिक परिवार से विरासत में मिले हों, वह अधिकारियों से तालमेल बैठाकर आसानी से जनसेवा कर लेता है। जैसे एक बहू को अपनी अनुभवी सास से घर चलाने का तरीका, सास-ससुर, पति और बच्चों को संभालने के साथ-साथ घर में सम्पन्नता लाने का गुण सीखना चाहिए, तभी उस परिवार में बरकत दिखती है।
उसी प्रकार जो व्यक्ति राजनीतिक विरासत की पृष्ठभूमि से नहीं आया है, उसे पहले सब कुछ सीखना चाहिए। इसके लिए पुराने और अनुभवी अध्यक्षों के सान्निध्य में बैठकर नगर चलाने का गुरुमंत्र लेना चाहिए। कहा जाता है कि जब महान विद्वान रावण युद्धभूमि में पड़े थे, तब श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा—रावण महाज्ञानी है, जाकर उनसे कुछ ज्ञान ले लो। लक्ष्मण गए और सिरहाने खड़े हो गए। तब रावण ने कहा किसी से कुछ सीखना हो तो सिर के पास नहीं, चरणों के पास बैठा जाता है।
प्रदेश के मुखिया योगी जी भी अपने प्रशासन की अक्षमता को तब समझ जाते हैं जब जनता दर्शन में हजारों लोग आवेदन पत्र लिए अपनी बारी का इंतजार करते दिखाई देते हैं। योगी जी त्वरित निर्णय लेकर पीड़ित को न्याय दिलाने के लिए निर्देश देते हैं, जबकि होना यह चाहिए कि अधिकारी-कर्मचारी जहां हैं, वहीं ईमानदारी से विकास के सहभागी बनें। एक ईमानदार कप्तान से बढ़नी डाक-बंगले में हमने पूछा था आपके पुलिस विभाग में अधिकतर लोग भ्रष्ट हैं, तो आप अकेले ईमानदार होकर क्या कर लेंगे? बड़ी दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ उन्होंने प्रेस मीटिंग में कहा था, मैं अकेला 99 भ्रष्ट लोगों को ईमानदार बनाकर दिखाऊंगा। जो जहां है, उसे वहीं रखकर ईमानदारी से काम करने को विवश कर दूंगा। इतिहास गवाह है, उन्होंने सचमुच करके दिखाया।
थोड़ा कहना, ज्यादा समझना-अभी ढाई वर्ष बचे हैं। डीएम से मिलने से कुछ नहीं होगा। नगर चलाने का गुरुमंत्र आपको स्वयं सीखना पड़ेगा। डीएम को आवेदन देकर यह कहना कि कोई अधिकारी-कर्मचारी हमारी नहीं सुनता, आपकी अपरिपक्वता और अक्षमता को ही दर्शाता है। इसी तरह सत्ता दल से गठबंधन कर विधायक का टिकट लेकर विधायक तो बना जा सकता है, लेकिन विकास के लिए रोज-रोज अधिकारियों से टकराव लेकर विधानसभा क्षेत्र का विकास नहीं किया जा सकता। शोहरतगढ़ विधायक को भी राजनीति और प्रशासन के साथ तालमेल बैठाकर विकास का गुरुमंत्र सीखना होगा।
स्कूल हों, अस्पताल हों या ब्लॉक-हर जगह अपने बने हुए नियम, रिवाज और खुले प्रतिशत में काम करने की व्यवस्था है। अगर कोई अचानक आकर सबको ईमानदार बनाकर अपने तरीके से काम कराना चाहेगा, तो सभी एकजुट होकर आपको झगड़ालू नेता के रूप में प्रचारित कर देंगे। जैसा कभी शोहरतगढ़ के दिवंगत विधायक स्व. शिवलाल मित्तल जी के साथ किया गया था। 2027 का चुनाव सिर पर है। वैरिहवा, ढेकहरी खुर्द जैसी आपके क्षेत्र की दर्जनों सड़कें आज भी अधर में लटकी हैं। जनता को परिणाम चाहिए, आश्वासन नहीं। पानी मिलाकर दूध बेचने वाले ग्वाले को एक ईमानदार दुग्ध निरीक्षक नहीं सुधार सकता, लेकिन सभी ग्वाले मिलकर उस निरीक्षक को अपने साँचे में जरूर ढाल सकते हैं।
