दिल्ली दंगों के UAPA मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

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  • उमर खालिद और शरजील इमाम को नहीं मिली जमानत

नई दिल्ली। वर्ष 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े UAPA मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने इस केस में आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं, जबकि अन्य पांच आरोपियों को राहत देते हुए जमानत मंजूर की गई है। यह फैसला न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की पीठ ने सुनाया, जिसे उन्होंने “विस्तृत और गंभीर कानूनी विश्लेषण वाला निर्णय” बताया।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह स्पष्ट किया कि गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA जैसे कठोर कानूनों के मामलों में ट्रायल में देरी एक गंभीर संवैधानिक चिंता है। अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सर्वोपरि है और ट्रायल से पहले की कैद को सजा नहीं माना जा सकता। हालांकि, इसका यह अर्थ भी नहीं है कि जमानत स्वतः दी जाए, खासकर जब मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हो। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि UAPA एक विशेष कानून है, जिसमें जमानत के लिए सख्त मानदंड तय किए गए हैं। धारा 43D(5) के तहत अदालत को यह देखना होता है कि क्या आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं। कोर्ट ने यह भी कहा कि जमानत सुनवाई का उद्देश्य पूरे मुकदमे का ट्रायल करना नहीं होता, बल्कि केवल यह जांचना होता है कि आरोपी की भूमिका का कथित अपराध से कोई तार्किक संबंध है या नहीं।

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 उमर खालिद और शरजील पर आरोप

उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य पर फरवरी 2020 में हुए दिल्ली दंगों के “मुख्य साजिशकर्ता” होने का आरोप है। जांच एजेंसियों के अनुसार, इन दंगों का उद्देश्य राजधानी में व्यापक अशांति फैलाना और सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित करना था। इसी आधार पर इनके खिलाफ UAPA और IPC की विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया गया।

कोर्ट ने माना कि कठोर कानूनों के मामलों में लंबे समय तक सुनवाई न होना न्याय व्यवस्था के लिए चुनौती है। अदालत ने सवाल उठाया कि यदि वर्षों तक ट्रायल शुरू नहीं होता, तो ऐसे मामलों में संतुलन कैसे बनाया जाए। हालांकि, कोर्ट ने यह भी दोहराया कि हर आरोपी की स्थिति एक जैसी नहीं होती, इसलिए सभी को एक साथ समान राहत नहीं दी जा सकती।

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