राजेश श्रीवास्तव
अमेरिकी सेनाएं वेनेजुएला पर हमला करके वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उनकी पत्नी समेत जिस तरह उठा लाईं, वह राष्ट्रपति ट्रंप की मनमानी की पराकाष्ठा है। ट्रंप ने सैन्य एवं आर्थिक शक्ति के मामले में अमेरिका के मुकाबले कहीं अधिक कमजोर देश में दादागीरी दिखाकर यही साबित किया कि उनका जोर दुर्बल देशों पर ही चलता है। उन्होंने यह आरोप लगाकर वेनेजुएला पर हमला किया कि वहां से अमेरिका में मादक पदार्थों की तस्करी हो रही थी और निकोलस मादुरो की दमनकारी नीतियों से इस देश के लोग अवैध तरीके से उनके यहां आ रहे थे। यह बहाना ही अधिक है, क्योंकि अमेरिका में न तो नशीले पदार्थ केवल वेनेजुएला से आते हैं और न ही वहां के लोग।
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हालांकि ट्रंप ने इसके प्रमाण नहीं दिए कि वेनेजुएला के अपराधियों के गिरोह मादुरो की शह पर अमेरिका के खिलाफ आतंकियों की तरह काम कर रहे थे। इस बारे में मादुरो ने ट्रंप से बातचीत का प्रस्ताव भी रखा था, पर उन्होंने उसकी अनदेखी कर दी। साफ है कि ट्रंप केवल इससे चिढ़े हुए थे कि सबसे अधिक तेल भंडार वाले देश का राष्ट्रपति उनके मनमाने रवैये के समक्ष झुकने को तैयार नहीं था, बहाना उन्होंने नशे का लिया। अमेरिका और वेनुजएला के संबंध तबसे बिगड़े, जब वहां वामपंथी रुझान वाले शासक सत्ता में आए और उन्होंने कच्चे तेल और खनिज के स्रोतों का राष्ट्रीयकरण करना शुरू किया। इससे अमेरिकी तेल कंपनियों को वेनेजुएला से बाहर होना पड़ा। ट्रंप मादुरो से इसलिए भी खार खाए हुए थे, क्योंकि उन्होंने रूस और चीन से संबंध प्रगाढ़ कर लिए थे। चूंकि ट्रंप का रूस और चीन पर जोर नहीं, इसलिए उन्होंने वेनेजुएला को निशाना बना लिया। यह सही है कि मादुरो चुनावों में धांधली करके सत्ता में आए और एक तरह से तानाशाही शासन चला रहे थे, लेकिन क्या वे ऐसे इकलौते शासक हैं? इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि ट्रंप किस्म-किस्म के तानाशाहों और यहां तक सीरिया में काबिज हुए आतंकी सरगना को भी गले लगा रहे हैं। वे पाकिस्तान के अघोषित तानाशाह आसिम मुनीर की भी पीठ थपथपा रहे हैं जबकि वे आतंकी संगठनों को पाल रहे हैं। पाकिस्तान अमेरिका को धोखा तो देता ही रहा है, वह उन देशों में भी प्रमुख है, जहां से बड़े पैमाने पर मादक पदार्थों की तस्करी होती है। यह तस्करी सेना और उसकी खुफिया एजेंसी की शह से होती है, लेकिन ट्रंप की नजर में पाकिस्तान महान देश है। दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद बेलगाम होकर विश्व व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर रहे ट्रंप अपने साथ अमेरिका की भी फजीहत करा रहे हैं। वेनेजुएला पर हमला करके उन्होंने बची-खुची नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अराजकता की ओर धकेल दिया है।
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सवाल यह है कि अमेरिका अब किस मुंह से चीन से कहेगा कि ताइवान पर हमला मत करो? वह रूस की आलोचना कैसे करेगा? जब अमेरिका ने हमला किया, तब चीन का प्रतिनिधिमंडल वेनेजुएला में ही मौजूद था। रूस इस हमले की पहले ही निदा कर चुका है। वेनेजुएला के पास तेल का सबसे बड़ा भंडार मौजूद है। इस घटना को अमेरिका की दादागिरी ही कहेंगे। अमेरिका की मंशा साफ है। ट्रंप विश्वास के संकट को गहरा करने का काम करते हैं। होना तो यह चाहिए कि वेनेजुएला की जनता तय करे कि वहां सत्ता पर कौन बैठेगा? अमेरिका को यह तय करने का अधिकार किसने दिया? अमेरिका ने वादा किया था कि वह यूरोप के मामलों में दखल नहीं देगा, लेकिन अब यह स्थापित हो चुका है कि उसकी दखलंदाजी लातिन अमेरिका में बढ़ गई है। यह कोई लोकतंत्र के लिए संघर्ष नहीं है। यह संघर्ष तेल और खनिज पदार्थों के लिए है। ज्यादा लोगों को यह पता नहीं है कि वेनेजुएला के पास दुनिया में सबसे बड़ा तेल भंडार है। उसके पास जो भंडार है, वह सऊदी अरब से भी ज्यादा है। यह तेल भंडार 3०० अरब बैरल से ज्यादा है। ट्रंप इसी वजह से वेनेजुएला पर नियंत्रण चाहते हैं। रूस और चीन यह जाहिर कर चुके हैं कि वह वेनेजुएला में अमेरिकी दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं करेंगे। अगर वेनेजुएला टकराव का नया बिदु हो जाता है, तो दुनियाभर में इसके गंभीर नतीजे देखने को मिल सकते हैं।
मालुम हो कि पिछली बार भी जब ट्रंप राष्ट्रपति बने थे, तब भी उन्होंने वेनेजुएला को धमकियां दी थीं, तो इस बार जो हुआ, उससे आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इस बार उन्होंने जंगी जहाज भेजे और सीआईए को जिम्मा सौंप दिया। हालांकि, इस घटना से भारत पर असर नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि हम कच्चे तेल के लिए वेनेजुएला पर निर्भर नहीं हैं। 2013-14 में हम 1० अरब डॉलर मूल्य का कच्चा तेल वेनेजुएला से आयात कर रहे थे। तब हम हमारी जरूरत का सात-आठ फीसदी तेल वहां से ले रहे थे। अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद हमारी निर्भरता वेनेजुएला पर नहीं रही है। भारतीय तेल कंपनियों का वहां पर कुछ निवेश जरूर है, लेकिन इस घटना का इस निवेश पर ज्यादा असर नहीं पड़ने वाला। लेकिन अब बड़ी या छोटी शक्तियां ट्रंप से प्रेरणा लेंगी। यह दुर्भाग्यपूणã है। चीन कल को ताइवान पर हमला कर सकता है। चीन भी यह सोचेगा कि जब अमेरिका ऐसा कर सकता है, तो हम क्यों नहीं कर सकते। लातिन अमेरिका को लेकर अमेरिकी नीतियों पर कभी भी भरोसा नहीं रहा है। हालांकि, इस पर कोई देश कुछ नहीं कर पाया क्योंकि अमेरिका महाशक्ति है। दुनियाभर में अब यह चिताएं हैं कि अब ट्रंप का ‘एंड गेम’ क्या है? असल में ट्रंप कामयाब होते नजर आ रहे हैं। अगर ट्रंप अमेरिका को वेनेजुएला के कच्चे तेल पर नियंत्रण दिलवा देते हैं और ईरान में कुछ कर पाते हैं,जिसके लिए उनके इरादे आक्रामक हैं, तो अमेरिका और खासकर ट्रंप के परिवार के पास दुनिया के प्राकृतिक संसाधनों के बड़े हिस्से का नियंत्रण आ सकता है। यह दुनिया के लिए ठीक नहीं होगा।
