अनुशासन को तोड़ेंगे तो नहीं छोड़ेंगे शनिदेव, जानिए पूरा रहस्य

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  • जीवन में कुछ भी पाना है तो प्रसन्न करिए इस ग्रह को,

लखनऊ। प्रत्येक इंसान के जीवन में उतार चढ़ाव लगे ही रहते हैं। इनका मुख्य कारण पुर्व जन्म कृत कर्म ही होते है। ज्योतिषी मान्यताओं के अनुसार हमारे कर्मो के अनुसार ही ग्रह फल देते है। पौराणिक ग्रंथो में शनि देव को न्यायाधीध के रूप में दर्शाया गया है। शनि देव सदैव से जिज्ञासा का केंद्र रहे हैं। पौपौराणिक कथाओं के अनुसार शनिदेव कश्यप वंश की परंपरा में भगवान सूर्य की पत्नी छाया के पुत्र हैं। शनिदेव को सूर्य पुत्र के साथ साथ पितृ शत्रु भी कहा जाता है। शनिदेव के भाई-बहन मृत्यु देव यमराज, पवित्र नदी यमुना व क्रूर स्वभाव की भद्रा हैं। शनिदेव का विवाह चित्ररथ की बड़ी पुत्री से हुआ था। ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को शनिदेव का जन्म उत्सव मनाया जाता है। शनिदेव का जन्म स्थान सौराष्ट्र में शिंगणापुर माना गया है। हनुमान, भैरव, बुध व राहू को वे अपना मित्र मानते हैं। शनिदेव का वाहन गिद्ध है और उनका रथ लोहे का बना हुआ है।

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शनि देव के दस नाम  

यम, बभ्रु, पिप्पलाश्रय, कोणस्थ, सौरि, शनैश्चर, कृष्ण, रोद्रान्तक, मंद, पिंगल। शनिदेव अपना शुभ प्रभाव विशेषत: कानून, राजनीति व अध्यात्म के विषयों में देते हैं। शनि के बुरे प्रभाव से गुर्दा रोग, डायबिटीज, मानसिक रोग, त्वचा रोग, वात रोग व कैंसर हो सकते है जिनसे राहत के लिये शनि की वस्तुओं का दान करना चाहिये।

 शनिदेव का रंग काला क्यों है?

जब शनिदेव अपनी माता छाया के गर्भ में थे, तब शिव भक्तिनी माता ने तेजस्वी पुत्र की कामना हेतु भगवान शिव की घोर तपस्या की जिस कारण धूप व गर्मी की तपन में शनि का रंग गर्भ में ही काला हो गया लेकिन मां के इसी तप ने शनिदेव को अपार शक्ति भी दी।

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 शनि की गति अन्य ग्रहों से मंद क्यों है?

शनि एक धीमी गति से चलने वाला ग्रह है। पुराणों में यह कहा गया है कि शनिदेव लंगड़ाकर चलते हैं जिस कारण उनकी गति धीमी है। उन्हें एक राशि को पार करने में लगभग ढाई वर्ष का समय लगता है।

शनिदेव पर तेल क्यों चढ़ाया जाता है?

नन्द रामायण में लिखा है कि जब भगवान राम की सेना ने सागर सेतु बांध लिया था, तब राक्षस उन्हें हानि न पंहुचा सकें, उसके लिये पवनसुत हनुमान को उसकी देखभाल की जिम्मेदारी सौंपी गई। जब हनुमान जी शाम के समय राम के ध्यान में मग्न थे, तभी सूर्य पुत्र शनि ने अपना काला कुरूप चेहरा बनाकर क्रोधपूर्ण कहा- हे वानर, मैं देवताओं में शक्तिशाली शनि हूं। सुना है तुम बहुत बलशाली हो। आंखें खोलो और मेरे साथ युद्ध करो। इस पर हनुमान जी ने विनम्रता से कहा – इस समय मैं अपने प्रभु को याद कर रहा हूं। आप मेरी पूजा में विध्न मत डालिये। जब शनि देव लडऩे पर उतर ही आये तो हनुमान जी ने उन्हें अपनी पूंछ में लपेटना शुरु कर दिया।

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शनि देव उस बंधन से मुक्त न होकर पीड़ा से व्याकुल होने लगे। शनि के घमंड को तोडऩे के लिये हनुमान ने पत्थरों पर पूंछ को पटकना शुरु कर दिया जिससे शनिदेव लहुलुहान हो गये। तब शनिदेव ने दया की प्रार्थना की जिस पर हनुमान  ने कहा – मैं तुम्हें तभी छोडूग़ा जब तुम मुझे वचन दोगे कि श्री राम के भक्त को कभी परेशान नहीं करोगे।

शनि ने गिड़गिड़ाकर कहा – मैं वचन देता हूं कि कभी भूलकर भी आपके और श्रीराम के भक्तों की राशि पर नहीं आऊंगा। तब हनुमान जी ने शनि को छोड़ दिया और उसके घावों पर लगाने के लिये जो तेल दिया तो उससे शनिदेव की सारी पीड़ा मिट गई। उसी दिन से शनिदेव को तेल चढ़ाया जाता है जिससे उनकी पीड़ा शांत होती है और वे प्रसन्न हो जाते हैं।

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