उमेश चन्द्र त्रिपाठी
भैरहवा/नेपाल। नेपाल की राजनीतिक जमीन पर अब असंतोष की गूंज तेज होती जा रही है। भैरहवा के मौर्य होटल में आयोजित एक विशेष सामाजिक-राजनीतिक संगोष्ठी में नेपाली सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी और मानवाधिकार कार्यकर्ता ने देश की मौजूदा स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि नेपाल इस समय नैतिकता, जवाबदेही और लोकतांत्रिक मूल्यों के गंभीर पतन से गुजर रहा है।
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उन्होंने कहा कि यह देश के लिए अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण समय है क्योंकि जिन नेताओं को जनता ने रक्षक समझकर सत्ता सौंपी थी, वही अब जनता के विश्वास को तोड़ रहे हैं। उनका कहना था कि आज सत्ता में बैठे लोग जनता की आवाज दबाने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर दुश्मनीपूर्ण रवैया अपना रहे हैं। उन्होंने बताया कि सरकार ने अचानक कई डिजिटल प्लेटफार्मों को बंद कर दिया, सिर्फ इसलिए क्योंकि वहां से जनता की आवाज और सरकार की आलोचनाएं उठ रही थीं।
वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी ने कहा कि जो युवा और आत्मनिर्भर लोग अपने दम पर रोजगार और शिक्षा के नए डिजिटल मॉडल बना रहे थे, सरकार ने उन्हीं की राह रोक दी है। उन्होंने कहा कि सरकार जनता को रोजगार देने में विफल रही है और जो लोग खुद के बल पर आगे बढ़ रहे थे, उनकी भी रोजी-रोटी छीनने का काम किया गया है। इससे जनता में भारी असंतोष फैला है और अब देश में डिजिटल विद्रोह की लहर दिखाई दे रही है। सभा में उपस्थित युवाओं ने “Gen Z Revolution for Change” के नारे लगाए और कहा कि अब नेपाल को नई सोच, नई राजनीति और नई नैतिकता की आवश्यकता है। वरिष्ठ अधिवक्ता ने युवाओं से कहा कि अब समय आ गया है जब नागरिक, विशेषकर नई पीढ़ी, सिर्फ दर्शक नहीं बल्कि परिवर्तन की असली ताकत बने। उन्होंने कहा कि बदलाव अब कोई विकल्प नहीं बल्कि एक आवश्यकता है।
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उन्होंने मीडिया जगत से भी अपील की कि वह सत्ता के दबाव में झुके बिना जनता की सच्ची आवाज को उठाए। उनका कहना था कि मीडिया लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन अगर वही सत्ता के इशारों पर चलने लगे तो लोकतंत्र एक दिखावा बनकर रह जाएगा। कार्यक्रम के समापन पर उन्होंने कहा कि नेपाल को अब नैतिक और जवाबदेह नेतृत्व की आवश्यकता है। यदि अब भी बदलाव की राह नहीं चुनी गई, तो आने वाली पीढ़ियां इस चूक को कभी माफ नहीं करेंगी। उन्होंने अंत में कहा कि बदलाव अब अपरिहार्य है।
