- …जब अपने टिकट की बारी आई तो जनता के बीच दिखने लगे ‘विधायक जी’
- डिप्टी सीएम समेत पूरी भाजपा अब जनता के दरवाजे पर, चाय से लेकर सम्मेलन तक शुरू
- दिल्ली दूर है, कवायद शुरू… टिकटार्थियों का बड़ा रेला लखनऊ से क्षेत्र की ओर कर गया कूंच

अस्सी में 80 का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने सपने में भी नहीं सोचा था कि उनकी इतनी दुर्गति होगी और वो 40 से न केवल नीचे चली जाएगी, बल्कि सूबे में उसका ओहदा दोयम दर्जे का हो जाएगा। समाजवादी पार्टी (SP) ने BJP को जोर का झटका दिया और अयोध्या समेत उनकी तमाम सीटें झटक लीं, जो कभी बीजेपी का ‘स्टेटस सिम्बल’ हुआ करती थीं। करारी हार से बौखलाए कुछ जाति विशेष के लोगों ने इसका ठीकरा गृहमंत्री अमित शाह के सिर पर फोड़ दिया। कहा-‘जब महराज जी के लोगों को टिकट नहीं मिला, तब हारना तो तय था’। यह जुमला तेजी से गढ़ा गया और हार की जिम्मेदारी सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनके दो नायब (केशव प्रसाद मौर्य व बृजेश पाठक) की बजाय अमित शाह और सुनील बंसल के नाम कर दी गई। लोगों ने यहां तक कहा कि सुनील बंसल ने अपने प्रत्याशियों को सीट दिलाने के लिए प्रदेश भाजपा के किसी भी पदाधिकारी की कुछ नहीं चलने दी। अब पार्टी नेतृत्व ने संकेत दिए हैं कि केवल वही उम्मीदवार टिकट पाएंगे, जो जनता की कसौटी पर खरे उतरेंगे और जीत की संभावना को मजबूत करेंगे। हालांकि यह प्रक्रिया न केवल पार्टी की रणनीति को दर्शाती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि यूपी की सियासत में जनता की नाराजगी अब नजरअंदाज नहीं की जा सकती।
कुछ दिनों पहले ‘मनीष दीक्षित का झोला, उसमें प्रवक्ता सोलह’ के प्रचलित मुहावरे में से केवल ब्राह्मण प्रवक्ता मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दरबार में पेश किए गए। सभी ने सोशल मीडिया पर इस मुलाकात का भौकाल पेश किया। हालांकि इस सूची में एकमात्र हरीश श्रीवास्तव ऐसे प्रवक्ता थे, जो ब्राह्मण नहीं कायस्थ समाज से ताल्लुक रखते हैं। एक दो प्रवक्ता आगे-पीछे मुख्यमंत्री से मिलकर अपनी बात करके आए। पार्टी के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि सूबे में ब्राह्मण प्रताड़ित हैं, ऐसी आम चर्चा स्थापित कर दी गई है, इसे दूर करने के लिए सीएम योगी से मुलाकात रखी गई। साथ ही जो शख्स आम चुनाव 2027 में आपके लिए चर्चा/डिबेट में हर जगह शामिल रहेंगे, उनसे सीधी मुलाकात भी जरूरी है। राजनीति के जानकार कहते हैं कि ‘कुछ सम्मानित’ होने के बाद पार्टी प्रवक्ता जनमानस तक यह बात पहुंचाना चाहेंगे कि भाजपा जाति विशेष की पार्टी नहीं है। यह केवल सपा और बसपा में देखने को मिलता है। लेकिन मलाल उनके मन में भी रहेगा, यह काफी हद तक संभव है।
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बताते चलें कि साल 2024 के चुनाव के पहले सूबे में बीजेपी के पास 62 सीटे थीं। सहयोगी अपना दल (सोनेलाल) ने दो सीट जीती थीं। बाद में रामपुर और आजमगढ़ में हुए उपचुनाव में भाजपा ने दो और सीटें जीत ली थीं। इस तरह NDA के पास कुल 66 सीटें हो गईं थीं। बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने 10 तो सपा ने पांच सीटों पर जीत हासिल की थी। लेकिन अब सपा के पास 80 में से 37 सीटें हैं और बड़ी-बड़ी डीगें हांकने वाली BJP के पास महज 33 सीटें हैं। शायद यही कारण है कि अबकी बार BJP ने 403 विधानसभा सीटों पर अपने विधायकों और प्रमुख नेताओं के प्रदर्शन का गंभीरता से आंकलन शुरू कर दिया है।
BJP यूपी में हैट्रिक लगाना चाहती है और इसके लिए उसके पास योगी आदित्यनाथ जैसा दबंग चेहरा भी मौजूद है। लेकिन कहावत है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। इसी के चलते पार्टी ने तय किया कि टिकट उस व्यक्ति को ही दिया जाए, जिसकी क्षेत्र में पकड़ हो, विरोध न हो और लोकप्रिय हो। इस प्रक्रिया में विधायकों की क्षेत्रीय सक्रियता, जनता से संवाद, विकास कार्यों की प्रगति, बजट उपयोग और उनकी छवि जैसे मापदंडों पर गहन मूल्यांकन किया जा रहा है। खास तौर पर उन विधायकों पर नजर है, जिनसे जनता नाराज है या जो किसी विवाद में फंसे हैं। सूत्रों का कहना है कि ऐसे विधायकों के टिकट कटने की संभावनाएं प्रबल हैं। भाजपा अबकी बार जीत की गारंटी देने वाले उम्मीदवारों को ही मैदान में उतारना चाहती है। राजनीति के जानकारों का कहना है कि जिस पार्टी ने अपने विधायकों को ‘सपेरों का नाग’ बना दिया है, उनके बारे में वह क्या पता करना चाह रही है। एक विधायक की न तो थानेदार सुनता है और न तहसीलदार। शायद ही कोई SDM ऐसा हो, जो स्थानीय विधायक को इज्जत के बिठाकर, प्यार से छोड़ता हो। अब ऐसे ‘कमजोर’ शख्स के बारे में आप क्या पता करना चाहते हैं?
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साल 2024 की हार से बौखलाई भाजपा अपने हिसाब से लोगों का आंकलन कर रही है। पार्टी सूत्रों के अनुसार विधायकों का यह ऑडिट गोपनीय तरीके से कराया जा रहा है। विधायकों को तीन श्रेणियों (A, B और C) में बांटा गया है। जिनका प्रदर्शन कमजोर है या जिनकी छवि विवादों से घिरी है, उन्हें C श्रेणी में रखा जा रहा है और उन पर टिकट कटने का खतरा तेजी से मंडरा रहा है। इसके अलावा, कुछ विधायकों के विवादित बयान और कानूनी मसले भी पार्टी के लिए सिरदर्द बने हुए हैं। कुछ विधायकों के नाम इस इस सूची में जुड़े हुए हैं। बलिया के भाजपा विधायक आनंद स्वरूप शुक्ल का नाम विवादों से जुड़ा रहा है। उनके कुछ बयानों और स्थानीय स्तर पर जनता से दूरी की शिकायतें सामने आई हैं, जिससे उनकी स्थिति कमजोर मानी जा रही है। इसी तरह मेरठ के एक विधायक पर भी स्थानीय लोगों ने उपेक्षा का आरोप लगाया है और उनके खिलाफ पार्टी के अंदर भी असंतोष की बातें सामने आ रही हैं। कुछ दिनों पहले पूर्व मंत्री फतेह बहादुर ने आरोप लगाया था कि यूपी पुलिस के अधिकारी कुछ माफिया के साथ मिलकर उनकी हत्या कराना चाहते हैं। इस बयान से उन्होंने उन्होंने अपनी ही सरकार की किरकिरी करा दी थी। परिवहन मंत्री और बलिया विधायक दयाशंकर सिंह ने पुल उद्घाटन मसले को इतना तूल दिया कि पार्टी की किरकिरी हो गई।
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हालांकि भाजपा की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन यह साफ है कि पार्टी कमजोर कड़ियों को हटाने में देर नहीं करेगी। दूसरी ओर, विपक्षी दल के लोग भी इस स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं। सपा ने हाल के उपचुनावों में अपने प्रदर्शन को साल 2027 का सेमीफाइनल मानते हुए रणनीति बनानी शुरू कर दी है। BJP की इस प्रक्रिया से उन विधायकों में बेचैनी है, जिनका प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा। अब जनता भी इसे ‘चुनावी जुगाड़’ ठहराने लगी है। कुछ लोग मुंह चिढ़ाते हुए कहते हैं- “पांच साल बाद याद आया जनता का दुख?” अब देखना ये है कि ये हथकंडे कितना रंग लाते हैं। जनता का मूड और आलाकमान का फैसला ही तय करेगा कि कौन पास होता है और कौन फेल!
टिकट की रेस शुरू तो सभी हो गए एक्टिव
भाजपा आलाकमान कमजोर विधायकों का रिपोर्ट कार्ड बना रहा है, यह जानकारी आते ही कई विधायकों ने जनता से संवाद बढ़ा दिया है। BKT विधायक योगेश शुक्ल सुबह-सुबह गांव की चौपाल पर चाय की चुस्कियां लेते दिखते हैं। वहीं गोरखपुर से विधायक और पूर्व मंत्री फतेह बहादुर ब्रहमभोज तक नहीं छोड़ रहे हैं। कुछ विधायक रात-रात भर कथित तौर पर जनसुनवाई कर रहे हैं। खलीलाबाद के विधायक अंकुर राज तिवारी को पहली बार कार्यकर्ताओं और जनता की याद आई है। यूपी के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक अपनी विधानसभा के छोटे-छोटे कार्यक्रमों की फोटो सोशल मीडिया पर तेजी से अपडेट कर रहे हैं। गोंडा विधायक प्रतीक भूषण का इंस्टाग्राम पेज तेजी से अपडेट हो रहा है। आजमगढ़ के राकेश पांडेय ने मुफ्त राशन बांटने का ढोल पीट डाला, जबकि राशन की दुकान तो पहले से चल रही थी। आलम यह है कि कहीं मंदिरों में दर्शन, तो कहीं नुक्कड़ सभाओं में बड़े-बड़े वायदे। हर जगह अब चुनावी चकल्लस देखने को मिलने लगा है। एक विधायक तो पिछले हफ्ते हर गांव में पौधरोपण करवाने पहुंच गए, पर गांव वालों ने पूछ लिया, “साहब, पिछले पांच साल कहां थे?
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कानुपर के विधायक महेश त्रिवेदी भी सोशल मीडिया पर हर दिन फोटो डाल रहे हैं। पिछले दिनों उन्होंने कानपुर में एक सरकारी कर्मचारी को कान पकड़ कर माफी मांगने को मजबूर कर दिया था, यह विधायक नगर आयुक्त को भी मुर्गा बनाने की बात कह चुके हैं। वहीं कानपुर के एक और विधायक अभिजीत सांगा जनता के बीच अपने ठेके-पट्टे को लेकर चर्चा में रहते हैं। वह खुलेआम लोगों को टेंडर न डालने की धमकी देते रहते हैं। लेकिन जब बात टिकट की आई तो उन्होंने सिंहपूर में एक कार्यकर्ता सम्मेलन किया और पूर्व जिलाध्यक्ष कृष्ण मुरारी शुक्ला को मुख्य अतिथि बनाकर ब्राह्मण कार्ड भी खेल दिया। लखनऊ के एक और विधायक नीरज बोरा का सोशल मीडिया पेज रावण दहन से लेकर सौजन्य भेंट से लदा-फदा हुआ है। कानपुर देहात की मंत्री प्रतिभा शुक्ला तो अकबरपुर कोतवाली में इंस्पेक्टर के खिलाफ धरने पर बैठ गईं, ताकि जनता को लगे वो उनके हक के लिए लड़ रही हैं। बलिया के विधायक और परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह, जो पहले विवादों में रहे, अब अपने क्षेत्र में हर छोटे-बड़े कार्यक्रम में दिख रहे हैं। कुछ दिनों पहले ही एक पुल के उद्घाटन की सूचना न मिलने पर वो नाराज हो गए और अधिकारियों को खरी-खोटी सुनाई। यानी अब तक सत्ता की मलाई चाटने वाले विधायक, मंत्री और टिकटार्थियों को जनता व कार्यकर्ताओं की याद आ गई है।
