
यशोदा श्रीवास्तव
बिहार में विधानसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान के बाद बीस साल पुराने मामले में लालू परिवार के खिलाफ आरोप तय होने का न्यायालयीय फरमान आया है। इसमें लालू यादव,उनकी पत्नी राबड़ी देवी, उनके पुत्र पूर्व उपमुख्यमंत्री और बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव सहित कुछ बड़े होटल मालिक और अफसरों के खिलाफ आरोप तय हुआ है। काफी संभावना है कि अक्टूबर बीतते-बीतते इन सभी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई और तेज हो। ऐन चुनाव के वक्त इस कार्रवाई को दो नजरिए से देखा जा रहा है। एक यह कि कानून अपना काम कर रहा है और दूसरा यह कि चुनाव के वक्त भाजपा विरोधियों के साथ ऐसा करती रहती है। ये दोनों तर्क अब बिहार की जनता की कसौटी पर है।
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इस बीच यदि बिहार की राजनीति में लालू परिवार के राजनीतिक दबदबे को देखें तो पता चलता है कि 2014 के बाद जब जब इस परिवार पर कानूनी शिकंजा कसा गया है तब तब यह परिवार राजनीतिक रूप से बहुत कमजोर नहीं हुआ है। चाहे 2015 का चुनाव रहा हो या 2020 का। दोनों ही बार गठबंधन में रहकर चुनाव में आए और गठबंधन के प्रमुख सहयोगियों से अधिक सीटें जीतने में कामयाब हुए। आरजेडी के साथ गठबंधन में लड़े गए 2015 के चुनाव में आरजेडी को 80 सीटों पर कामयाबी मिली थी जबकि जनता दल यूनाइटेड को 71 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। भाजपा 53 सीटों पर जीत हासिल की थी। जदयू और आरजेडी की गठबंधन सरकार सत्ता में आई थी। अधिक सीटें जीतने के बाद भी आरजेडी ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया था। 2020 के चुनाव में आरजेडी को 75 सीटों पर जीत हासिल हुई और जदयू को 49 सीटों पर जीत मिली जबकि भाजपा 74 सीटों पर जीत हासिल की थी। इस चुनाव के शुरुआती दौर में भाजपा और जदयू गठबंधन की सरकार थी। बाद में आरजेडी और जदयू की सरकार बनी और अब फिर भाजपा और जदयू की सरकार है। 2015 के मुकाबले 2020 में आरजेडी की सीटें घटकर 75 हो गई वहीं जदयू भी 71 से घटकर 49 पर आ गई लेकिन भाजपा आश्चर्यजनक रूप से 53 से बढ़कर 74 सीटों तक पहुंच गई। 2020 में बढ़ी सीटों को पैमाना मानते हुए 2025 के चुनाव में भाजपा ने जदयू के साथ बराबर बराबर सीटों पर समझौता किया है ताकि चुनाव परिणाम बाद सरकार के नेतृत्व का फैसला करने में कोई अड़चन न आए। भाजपा गठबंधन यदि सत्ता में वापसी करता है और वह जदयू से दो चार सीटें भी अधिक पा लिया तो नितीश बखूबी जानते हैं कि उन्हें महाराष्ट्र के एक नाथ शिंदे ही होना है।
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2025 का बिहार विधानसभा चुनाव पिछले दो तीन चुनावों से हटकर होने जा रहा है। नीतीश कुमार ने पहले ही बिहार की महिलाओं के लिए ढेर सारी योजनाओं का अंबार लगा दिया है दूसरे प्रधानमंत्री मोदी ने जो 75 लाख महिलाओं के खाते में दस दस हजार नगदी की इमदाद दी है,वह भी कहीं न कहीं चुनाव को प्रभावित करेगा ही। हालांकि प्रधानमंत्री के इस दस हजार के इमदाद को विपक्ष प्रधानमंत्री के दो लाख के वायदे के सापेक्ष महज झुनझुना करार दिया है लेकिन जनता यह मानें तब न!
इसके अलावा 2020 में चिराग पासवान अकेले दम पर चुनाव लड़े थे। माना जा रहा है कि तब वे भाजपा को ही नुकसान पहुंचाए थे इस बार वे 39 सीटों के साथ भाजपा के साथ चुनाव मैदान में हैं। मुमकिन है कि भाजपा के सहयोगी जीतन राम मांझी संतोष जनक समझौता न होने पर भाजपा गठबंधन को थोड़ा बहुत नुक्सान करने की कोशिश करें लेकिन यह कोई गुल खिला पाए,यह मुमकिन नहीं है।
इस चुनाव में दूसरा जो बड़ा फैक्टर है वह हैं पीके यानी प्रशांत किशोर। बिहार विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज को अंडर स्टीमेट करना सत्ता की दौड़ में शामिल किसी भी राजनीतिक दल के लिए भूल होगी। दो साल में उन्होंने अपनी चुनाव प्रवंधन की विशेष पहचान से अलग एक ईमानदार राजनीतिक चेहरे की पहचान भी स्थापित की है। वैसे भी जो शख्स अपने कुशल चुनावी प्रवंधन से दूसरे को सत्ता दिला सकता है वह क्या अपने लिए थोड़ा बहुत भी नहीं कर पाएगा वह भी उस बिहार में जहां की राजनीति जंगलराज और कथित सुशासन और कुशासन के बीच उलझ कर रह गया हो। कहना न होगा कि बिहार विधानसभा चुनाव में पीके के जन सुराज की इंट्री ने मुकाबला तितरफा बना दिया है। जबसे बिहार में विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां बढ़ी है तब से देखा जाए तो यह साफ दिखता है कि पीके की पार्टी आरजेडी गठबंधन और जदयू गठबंधन दोनों को बराबर बराबर नुकसान पहुंचा रही है। और ये दोनों बड़ी पार्टियां इसे लेकर मुंह भले न खोलें अंदर अंदर परेशान बहुत हैं। 35 साल से आरजेडी और जदयू के बीच उलझा बिहार पीके के रूप में एक तीसरे विकल्प को भी देख रहा है।
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इस चुनाव में पीके अपनी साफ-सुथरी छवि के लिए खासा चर्चित हुए हैं। जाति से ब्राह्मण प्रशांत किशोर खूब जानते हैं कि जाति के जाल में फंसे बिहार की राजनीति को उसी जाल में फंसाकर ही बदला जा सकता है। जन सुराज के अबतक घोषित करीब 140 उम्मीदवारों को देखें तो जातीय समीकरण का ख्याल बहुत सोच-समझकर कर किया हुआ जान पड़ता है। पीके ने ईमानदार छवि के कुछ पूर्व नौकरशाहों पर भी दांव लगाया है तो भोजपुरी फिल्म स्टार पवन सिंह की पूर्व पत्नी ज्योति सिंह को टिकट देकर महिलाओं को आकर्षित करने का इमोशनल कार्ड भी खेला है। बिहार की राजनीति में अन्दर तक पकड़ रखने वाले विशेषज्ञ मान रहे हैं कि वोटों में थोड़ा-सा झुकाव भी चौंकाने वाले परिणाम ला सकता है। चुनाव बाद बिहार के संभावित सरकार में पीके की भूमिका क्या होगी,यह कहना मुश्किल है लेकिन वे खुद कहते हैं यह चुनाव उनकी आगे की राजनीति के लिए’अर्श या फर्श’ जैसा है।

