पुरातनकाल से चली आ रही परम्परा आज भी देती है बाजार को ‘बूस्टर डोज’

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  • पांच त्यौहारों का पर्व दीपावली, कल धनतेरस से हो गई शुरुआत
  • आज मनाया जाएगा रूप चौदस पर्व, कल धूमधाम से मनेगी दीपावली
  • पंच दिवसीय दिवाली पर्वः यह त्यौहार नहीं भारतीयता की पहचान है,

    संजय सक्सेना
        संजय सक्सेना

लखनऊ। अक्टूबर के उतरते हुए दिनों में पूरी सृष्टि मानो दीपों के प्रकाश में निहाल होने की तैयारी में जुट गई है। हर गली, हर मोहल्ला और हर घर का कोना-कोना अब दीपावली की रौनक में सराबोर है। दुकानों में नई साज-सज्जा, मिठाइयों की खुशबू और दीपकों की झिलमिल रोशनी सब मिलकर एक ही संदेश दे रहे हैं कि खुशियों का महापर्व आ रहा है। कल से शुरू हो रहे धनतेरस के साथ ‘पांच दिनों का यह पर्व’ पूरे देश को उत्सव की लहर में डुबो देगा। दीपावली पर्व की शुरुआत ’’धनतेरस’’ से होती है। यह दिन स्वास्थ्य, समृद्धि और आयु के देवता धन्वंतरि की पूजा को समर्पित है। मान्यता है कि इसी दिन समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इस अवसर पर घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में नए बर्तन, चांदी के सिक्के और सोने के आभूषण खरीदे जाते हैं। धनतेरस व्यापारियों के लिए अत्यंत शुभ दिन माना जाता है, क्योंकि माना जाता है कि इस दिन किया गया कोई भी नया आरंभ दीर्घकालिक सफलता लाता है। शाम को दीप प्रज्ज्वलित कर यमराज की पूजा भी की जाती है, जिसे यमदीपदान कहा जाता है।

नरक चतुर्दशी अंधकार से प्रकाश की ओर

धनतेरस के अगले दिन ’’नरक चतुर्दशी’’ या ’’छोटी दीपावली’’ मनाई जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान कृष्ण ने नरकासुर राक्षस का संहार कर संसार को भयमुक्त किया था। इसी कारण यह दिन बुराई पर अच्छाई की विजय और अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रतीक है।सुबह लोग स्नान कर विशेष तेल का उपयोग करते हैं और मिट्टी के दीपक जलाकर घरों को प्रकाशमय करते हैं। यह दिन सफाई, पवित्रता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।

दीपावली प्रकाश का महोत्सव

तीसरा दिन सबसे महत्वपूर्ण है दीपावली यह वह दिन है जब पूरी धरती प्रकाश से नहा उठती है। लोग सुबह से ही देवी लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की तैयारी में जुट जाते हैं। बाजारों में भीड़ उमड़ पड़ती है, हर घर में रंगोली बनती है और दीप जलाए जाते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, अयोध्या वासी इसी दिन श्री राम के चौदह वर्ष के वनवास समाप्त कर अयोध्या लौटने पर दीप प्रज्वलित कर स्वागत करते हैं। इसलिए दीपावली को प्रकाश और आशा का पर्व कहा जाता है।लक्ष्मी पूजन की बेला पर घरों में सुंदर दीप आरती होती है और परिवार एकत्र होकर समृद्धि एवं सौभाग्य की कामना करते हैं। इस दिन धन की देवी लक्ष्मी और विघ्नहर्ता गणेश की पूजा का विशेष महत्व है।मिठाइयाँ बाँटना, उपहार देना और पटाखे चलाना इस पर्व को उमंग व उत्साह से भर देते हैं, हालांकि हाल के वर्षों में पर्यावरणीय जागरूकता के चलते ‘ग्रीन दिवाली’ का संदेश भी तेजी से फैल रहा है।

गोवर्धन पूजा प्रकृति के प्रति आभार

दीपावली के अगले दिन ’’गोवर्धन पूजा’’ या ’’अन्नकूट’’ का उत्सव आता है। यह दिन भगवान कृष्ण के गोवर्धन पर्वत उठाने की कथा से जुड़ा है। कहते हैं, बृज के लोगों ने इंद्र से वर्षा के नियंत्रण के लिए कृष्ण की प्रेरणा पर गोवर्धन पर्वत की पूजा की थी। इस पर नाराज होकर इंद्र ने प्रलयंकारी वर्षा की, तब कृष्ण ने अपनी छोटी ऊंगली पर पूरा पर्वत उठा लिया और गांव वालों को सुरक्षा दी।आज भी लाखों लोग इस दिन पर्वत के प्रतीक के रूप में गोबर से गोवर्धन बनाकर उसकी पूजा करते हैं। मथुरा-वृंदावन सहित उत्तर प्रदेश और बिहार के गाँवों में यह पर्व विशेष उत्साह से मनाया जाता है। इस दिन मंदिरों में ‘अन्नकूट प्रसाद’ के रूप में सैकड़ों पकवानों का भोग लगाया जाता है।

भाई दूज स्नेह और सुरक्षा का बंधन

पांचवें और अंतिम दिन आता है ’’भाई दूज’’, जिसे बहनें अपने भाइयों के प्रति स्नेह और दीर्घायु की प्रार्थना के रूप में मनाती हैं। यह पर्व रक्षाबंधन की तरह भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक है।पौराणिक कथा के अनुसार, इस दिन यमराज अपनी बहन यमी (यमुना) के घर गए थे, जहाँ यमी ने भाई का अभिनंदन कर तिलक किया और दीर्घायु का आशीर्वाद माँगा। तभी से यह परंपरा चली आ रही है।इस दिन बहनें अपने भाइयों को घर बुलाकर तिलक करती हैं, मिठाई खिलाती हैं और भाई उपहार देकर उनके स्नेह का सम्मान करते हैं। इन पांच दिनों में बाजारों की रौनक देखते ही बनती है। दीपक, रंगोली रंग, मिट्टी से बने गणेश-लक्ष्मी के प्रतिमाएं, सजावटी झालरें, मिठाई और वस्त्र सबकी बिक्री में जबरदस्त वृद्धि होती है।

देश के बड़े शहरों से लेकर छोटे कस्बों तक सजे गलियारे, रोशन इमारतें और भीड़भाड़ भरे बाज़ार इस पर्व की लोकप्रियता को दर्शाते हैं। ऑनलाइन खरीदारी का चलन बढ़ने के बावजूद दुकानों पर ग्राहकों की मौजूदगी यह बताती है कि त्योहारों में लोगों का सामाजिक जुड़ाव आज भी बरकरार है। हर साल बढ़ते प्रदूषण और पटाखों के दुष्प्रभावों को देखते हुए इस बार सरकार और समाज दोनों ही पर्यावरण-संवेदनशील दीपावली की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। कई विद्यालयों और नगर निगमों ने ‘नो क्रैकर’ अभियान चलाया है। लोग मिट्टी के कुल्हड़, पुनः उपयोग योग्य दीप और फूलों से बनी सजावट को प्राथमिकता दे रहे हैं। धार्मिक परंपरा के साथ स्वच्छता और हरियाली का संदेश जोड़ने की यह पहल आने वाले वर्षों में एक नई परंपरा को जन्म दे रही है।

बहरहाल, दीपावली सिर्फ धार्मिक या सांस्कृतिक पर्व नहीं है, यह एक सामाजिक अवसर भी है, जब लोग आपसी मतभेद भूलकर मेल-मिलाप करते हैं। अनेक संस्थाएं इस अवसर पर गरीबों में वस्त्र और मिठाइयाँ बाँटती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष रूप से यह समय रिश्तों को जोड़ने और कृषि कार्यों के बाद विश्राम का प्रतीक होता है। किसान अपने नए फसलों की उपज से माता लक्ष्मी को चढ़ावा चढ़ाते हैं और नए वर्ष की समृद्धि की कामना करते हैं। कुल मिलाकर धनतेरस से भाई दूज तक चलने वाला यह पांच दिवसीय पर्व भारत की सांस्कृतिक गाथा का जीवंत स्वरूप है। इसके हर दिन में कुछ न कुछ नया सीखने, अनुभव करने और मन को शुद्ध करने का अवसर छिपा है। आज जब लोग भागदौड़ भरी जिंदगी में सुकून के पलों की तलाश में हैं, दीपावली का यह पर्व प्रकाश, प्रेम और एकता की वह अनुभूति लाता है जो हर हृदय में आशा का दीप जला देती है।

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