‘लोगों की आलोचनाओं से मिलने वाले दुःख से कैसे बचें?’

कमलेश कमल
कमलेश कमल

क्या आपने ग़ौर किया है कि क्रिकेट के किसी कप्तान की अल्पकालिक असफलता से आलोचनाओं के कई द्वार खुल जाते हैं। कई पूर्व खिलाड़ी, जो उस कप्तान की तुलना में कहीं नहीं ठहरते; उनकी कप्तानी पर उंगली उठाने लगते हैं। इतना ही नहीं, हर गली में अमूमन ऐसे एक अथवा दो क्रिकेट पंडित तो मिल ही जाएंगे, जो आपको बताएँगे कि उस कप्तान में क्या कमी है और उसे क्या सीखना चाहिए। जब कोई ऐसा कहे, तो उचित यह है कि उस कप्तान के पूरे रिकॉर्ड को देख कर बात करें कि किससे कम और किससे ज़्यादा है। लेकिन उतना देखने और तुलना करने का धैर्य किसके पास है? लोग प्रतिकार करते हैं, प्रतिवाद करते हैं, विरोध करते हैं, आलोचना करते हैं। यह उदाहरण हमें सिखाता है कि दुनिया कमी निकालने के लिए तैयार बैठी है। बहुत बड़ा लेंस है अथवा कहिए कि माइक्रोस्कोप लेकर कमी के एक-एक कीटाणु खोज लेने की पूरी तैयारी की जाती है।

हज़ार अच्छी चीज़ें भुला दी जाती हैं, एक बुराई याद रहती है। एक व्यक्ति, जो हो सकता है कि अतिशय भावुक हो, दूसरों के लिए मर मिटने वाला हो, ईमानदार हो…पर एक दिन शराब पीकर शोर-शराबा कर दे, तो पूरी इज़्ज़त दो कौड़ी की हो सकती है। यही दुनिया की रीति है।

ऊपर के उदाहरण में ही देखें, तो यही आलोचक कप्तान के किसी शतक के बाद अथवा टीम की जीत के बाद उसकी स्तुति करते मिलते हैं, उसे महान् बैट्समैन और कप्तान बताते नहीं थकते हैं। ध्यान दें कि कप्तान नहीं बदलता, परिणाम बदलते हैं और तदनुसार अपने सौकर्य से लोग प्रतिक्रिया बदल लेते हैं।

मुखर्जीनगर दिल्ली में संघ लोक सेवा आयोग की तैयारी में जुटे अभ्यर्थियों के बीच एक डायलॉग आम है– “सफलता के हज़ार बाप होते हैं, पर असफलता अनाथ होती है।” अगर एक अभ्यर्थी किसी से बात न करे, जब-तब सिगरेट का धुआँ उड़ाता दिखे और सफल हो जाए तो लोग कहेंगे कि बहुत परिश्रमी था, जबकि अगर वही असफल हो जाए तो लोग कहेंगे घमंडी था, किसी से बात तक नहीं करता था और माँ-बाप के पैसे को सिगरेट के धुएँ में उड़ाता रहता था…यह तो कभी सफल हो ही नहीं सकता था। तो, लोगों की प्रतिक्रियाओं को कभी भी पहली प्राथमिकता न दें, सही क्या है…उसे प्राथमिकता दें, परिश्रम को प्राथमिकता दें। किसी ने क्या ख़ूब लिखा है–

“उन्नति कर सकता नहीं, जिसको है यह रोग!

क़दम-क़दम पर सोचना, क्या सोचेंगे लोग!!”

मनोवैज्ञानिक रूप से देखें, तो दूसरे की परवाह करना संवेदनशील मन का अभिलक्षण है, पर दूसरों की राय को अधिक महत्त्व देना कमज़ोर इच्छाशक्ति अथवा अल्प-आत्मबल का परिचायक है। जो सच है, वह महत्त्वपूर्ण है न कि जो लोग चाहते हैं, वह महत्त्वपूर्ण है। (Get oriented towards true north principles, care about what is right and not about who says what.)

दरअसल लोगों के लिए वे स्वयं महत्त्वपूर्ण हैं, आप नहीं। आप तो उनके लिए उतना ही महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं, जितना कि उन्हें आपसे कोई मूर्त-अमूर्त, भौतिक-भवनात्मक लाभ हो। इस नियम का कोई अपवाद नहीं है। ऐसे, में महत्त्वपूर्ण है कि हमें अपनी गुणवत्ता में वृद्धि अथवा क़ीमत बढ़ाने (value addition) का प्रयास करना चाहिए और लोगों की प्रतिक्रियाओं को इसका उपोत्पाद (by product) समझना चाहिए। किसी के चुनाव जीतने के पश्चात् लोगों से मान-सम्मान, शुभकामनाएँ आदि की जो प्रतिक्रियाएँ मिलती हैं, वह चुनाव हारने के बाद कभी मिल ही नहीं सकतीं। इससे यह सिद्ध होता है कि प्रतिक्रिया महत्त्वपूर्ण है ही नहीं, वह तो आनुषंगिक है; मुख्य है सही परिश्रम, जिससे परिणाम मिलता है।

जो विद्यार्थी, गृहिणी, कर्मचारी अथवा मित्र हरदम बड़ाई अथवा प्रशंसा पाने के लिए प्रयास (fishing for compliments) करते हैं, वे थोड़े समय के लिए इसे पा भी लें, पर अंततोगत्वा पिछड़ जाते हैं और दुःख पाते हैं; क्योंकि परिणाम तो सच्चे प्रयासों से ही संभव है, इच्छामात्र से नहीं, भावनात्मक जालों और उलझनों से नहीं। कोई बड़ा काम करने का बलवान् विचार अथवा संकल्प व्यक्ति को बाँधता है। इसे हम ऐसे भी देख सकते हैं कि लगन के पक्के लोग, थोड़े सनकी और बोरिंग होते हैं। कभी-कभी वे अपने आस-पास के प्रति बेख़बर हो जाते हैं अथवा किसी को सही प्रतिक्रिया नहीं दे पाते हैं। ऐसे में, उनकी आलोचना होने लगती है। ऐसे में उनके स्वभाव की समझ और संवेनशीलता से काम लेना चाहिए और आलोचना करने से बचना चाहिए; यह पृथक् बात है कि असंवेदनशीलता हमारे दैनिक व्यवहार में बुरी तरह घुल-मिल गई है।

ध्यातव्य है कि ऐसे लोक-व्यवहार में संवेदनशीलता का परिचय तीनों आयामों में होना चाहिए– संवाद में भी, शब्दों में भी और क्रियाओं में भी। उदाहरण के लिए, किसी भी तरह की आलोचना करने के पहले संबंधित व्यक्ति की थोड़ी प्रशंसा भी अवश्य करनी चाहिए। सीधी बात है निंद्य से पहले श्लाघ्य हो, तभी सकारात्मक प्रभाव हो सकता है। शब्दों का विशेष ध्यान रखना चाहिए और भाव-भंगिमा प्रेमपूर्ण तथा स्नेहस्निग्ध होनी चाहिए। सामने वाले को ठीक से समझ लेने भर से आलोचना बंद हो सकती है। हम जिसकी आलोचना करने जा रहे हैं, उन्हें और उनकी वर्तमान मनःस्थिति को हम कितनी अच्छी तरह जानते हैं? इसी तरह जो हमारी आलोचना कर रहे हैं, वे हमें और हमारी वर्तमान मनःस्थिति को कितनी अच्छी तरह जानते हैं– इसका भी स्मरण कर लेना चाहिए।

(नोट : दुःख शृंखला के मेरे 32 मनोवैज्ञानिक निबंधों में से सुधी पाठकों के अवलोकनार्थ।)

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