
अजय कुमार
New Delhi: राजनीति जब जनसेवा का रास्ता छोड़कर जिद और अहंकार का प्रदर्शन बनने लगे, तब सबसे पहले आम आदमी की परेशानी हाशिये पर चली जाती है। दिल्ली के रामलीला मैदान में एक नवंबर को प्रस्तावित विपक्षी रैली को लेकर राहुल गांधी का रुख इसी सवाल को जन्म देता है। दिल्ली के व्यापारियों और उद्यमियों के संगठन चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री ने उनसे रैली को भाई दूज के बाद आयोजित करने का अनुरोध किया। वजह साफ थी। धनतेरस और दीपावली के आसपास कारोबारियों के लिए बिक्री का सबसे महत्वपूर्ण समय होता है।
ऐसे में यातायात बाधित होने और ग्राहकों की आवाजाही प्रभावित होने की आशंका उनके लिए गंभीर आर्थिक संकट खड़ा कर सकती है। सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी के लिए राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन इतना महत्वपूर्ण है कि उसके सामने व्यापारियों की रोजी-रोटी की चिंता भी कोई मायने नहीं रखती? लोकतंत्र में विरोध करना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार जनता की परेशानियों से आंखें मूंद लेने का लाइसेंस नहीं है। किसी राजनीतिक दल को यह तय करने का अधिकार नहीं कि व्यापारी अपनी साल भर की कमाई के महत्वपूर्ण अवसर पर नुकसान सहने के लिए मजबूर हों। जब तारीख बदलने का विकल्प मौजूद हो, तब केवल अपनी राजनीतिक योजना के कारण अड़े रहना संवेदनशील नेतृत्व की पहचान नहीं कहा जा सकता। राहुल गांधी स्वयं को आम आदमी, गरीबों और छोटे कारोबारियों की आवाज बताते हैं। फिर व्यापारियों की एक व्यावहारिक मांग पर विचार करने में उन्हें परेशानी क्यों होनी चाहिए? क्या आम आदमी की चिंता केवल भाषणों और राजनीतिक अभियानों तक सीमित है?

व्यापारिक संगठन ने दावा किया है कि धनतेरस के आसपास दिल्ली में लगभग 25 हजार करोड़ रुपये का कारोबार होता है। उसने प्रस्तावित रैली से करीब 10 हजार करोड़ रुपये के कारोबार पर असर पड़ने की आशंका जताई है। संगठन ने अक्टूबर में प्रदर्शनों और यातायात संबंधी बाधाओं के कारण लगभग तीन हजार करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान भी लगाया है। इन आंकड़ों को स्वतंत्र रूप से प्रमाणित नुकसान नहीं, बल्कि संगठन के दावों के रूप में देखना चाहिए। फिर भी इनका आकार इस बात की ओर ध्यान खींचता है कि विवाद केवल किसी राजनीतिक कार्यक्रम का नहीं, बल्कि व्यापारिक गतिविधियों और हजारों परिवारों की आजीविका का भी है। राहुल गांधी को इन आशंकाओं का जवाब संवेदनशीलता से देना चाहिए, न कि राजनीतिक कटाक्षों से।
दिल्ली के चांदनी चौक, सदर बाजार, खारी बावली, चावड़ी बाजार और भागीरथ पैलेस जैसे बाजारों की अर्थव्यवस्था ग्राहकों की नियमित आवाजाही पर निर्भर करती है। त्योहारों से पहले यहां खरीदारी बढ़ती है और दूसरे राज्यों से भी व्यापारी सामान लेने पहुंचते हैं। किसी बड़े आयोजन के कारण सड़कें बाधित हों, यातायात के रास्ते बदलें या ग्राहक बाजार आने से बचें, तो नुकसान केवल दुकान के मालिक को नहीं होता। उसका असर कर्मचारियों, माल ढोने वालों, छोटे आपूर्तिकर्ताओं और दिहाड़ी पर काम करने वाले लोगों तक पहुंचता है। बड़े राजनीतिक नेता शायद इसे एक दिन की असुविधा मानें, लेकिन छोटे दुकानदार के लिए यही एक दिन उसके कारोबार के हिसाब को बिगाड़ सकता है।

राहुल गांधी की राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वे सरकार से जवाबदेही की मांग करते हैं, लेकिन जब उनके अपने राजनीतिक कार्यक्रम से आम लोगों को संभावित परेशानी की बात सामने आती है, तब उनसे भी जवाबदेही की अपेक्षा की जाती है। लोकतंत्र में सवाल पूछने का अधिकार केवल विपक्ष के पास नहीं है। व्यापारी भी पूछ सकते हैं कि उनकी परेशानी को राजनीतिक नेतृत्व पर्याप्त महत्व क्यों नहीं दे रहा। विपक्ष यदि जनता के हितों की रक्षा का दावा करता है, तो उसे अपने फैसलों को भी उसी कसौटी पर कसना होगा।
जनता के लिए राजनीति करने और जनता को राजनीतिक कार्यक्रमों के हिसाब से चलने के लिए मजबूर करने में बड़ा अंतर है। इस पूरे विवाद का दूसरा पहलू राहुल गांधी की वह राजनीतिक रणनीति है, जिसमें मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर निर्वाचन आयोग पर गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। चुनाव में निष्पक्षता सुनिश्चित करना लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत है। यदि किसी दल के पास मतदाता सूची में गड़बड़ी के प्रमाण हैं, तो उसे सामने लाना चाहिए। निर्वाचन आयोग से जवाब मांगना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर अदालत का दरवाजा खटखटाना चाहिए। लेकिन आरोपों को बार-बार दोहराने भर से वे प्रमाणित तथ्य नहीं बन जाते। राजनीतिक भाषण और कानूनी साक्ष्य दो अलग चीजें हैं। विपक्ष को यह अंतर समझना होगा।
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मतदाता सूची के पुनरीक्षण पर सवाल उठाना अपने आप में अनुचित नहीं है। लेकिन पूरी प्रक्रिया को बिना पर्याप्त प्रमाण के वोट चोरी का पर्याय बना देना भी जिम्मेदार राजनीति नहीं कही जा सकती। यदि किसी निर्वाचन क्षेत्र में नाम हटाए जाने, गलत प्रविष्टियों या अन्य अनियमितताओं की शिकायत है, तो संबंधित विवरण, दस्तावेज और ठोस उदाहरण सामने आने चाहिए। व्यापक आरोपों को प्रमाणों से पुष्ट करना जरूरी है। ऐसा किए बिना जनता के मन में निर्वाचन व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा करने की कोशिश राजनीतिक लाभ की रणनीति तो हो सकती है, लेकिन उससे लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचने का खतरा भी है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की मांग पर भी राहुल गांधी को संवैधानिक व्यवस्था का ध्यान रखना चाहिए।
संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने जैसी संसदीय प्रक्रिया से जुड़ी है। इसके लिए निर्धारित संवैधानिक शर्तें पूरी करनी होती हैं। प्रधानमंत्री से सीधे बर्खास्तगी कराने की मांग इस व्यवस्था का विकल्प नहीं है। यदि विपक्ष को निर्वाचन आयोग के कामकाज पर आपत्ति है, तो उसे संवैधानिक रास्ते अपनाने चाहिए। कानून में निर्धारित प्रक्रिया से अलग किसी राजनीतिक मांग को दोहराने से न तो वह प्रक्रिया बदल जाती है और न ही आरोप अपने आप सिद्ध हो जाते हैं।

राहुल गांधी को यह भी समझना चाहिए कि संस्थाओं पर सवाल उठाना और उनके निर्णयों को पहले से ही अवैध मान लेना अलग-अलग बातें हैं। अदालत में मामला लंबित हो तो दोनों पक्षों को अपने तर्क और प्रमाण रखने चाहिए। निर्णय आने से पहले ही अपनी राजनीतिक व्याख्या को अंतिम सत्य घोषित कर देना न्यायिक प्रक्रिया पर अनावश्यक दबाव बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। विपक्ष को सरकार की आलोचना करने का पूरा अधिकार है, लेकिन उस अधिकार के साथ प्रमाण प्रस्तुत करने और संवैधानिक मर्यादाओं का सम्मान करने की जिम्मेदारी भी जुड़ी है।राहुल गांधी की समस्या यह नहीं कि वे सरकार से सवाल पूछते हैं। समस्या तब पैदा होती है, जब सवालों के साथ पर्याप्त प्रमाण और व्यावहारिक समाधान दिखाई नहीं देते। यदि उद्देश्य मतदाता अधिकारों की रक्षा है, तो अभियान का केंद्र ठोस शिकायतें, पारदर्शिता और सुधार होने चाहिए। यदि उद्देश्य व्यापारियों की चिंता से बेपरवाह हुए बिना लोकतांत्रिक विरोध करना है, तो रैली की तारीख और आयोजन व्यवस्था पर संवाद से पीछे हटने की जरूरत नहीं है।
राजनीति में हर असहमति को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना देना नेतृत्व की मजबूती नहीं, उसकी सीमाओं का संकेत है। अंततः राहुल गांधी को तय करना है कि वे अपनी राजनीति को केवल विरोध और आरोपों तक सीमित रखना चाहते हैं या जनता की वास्तविक समस्याओं के प्रति जिम्मेदारी भी दिखाना चाहते हैं। व्यापारी रैली पर प्रतिबंध नहीं मांग रहे; वे अपने महत्वपूर्ण कारोबारी दिनों को बचाने की अपील कर रहे हैं। इस मांग पर विचार करने से विपक्ष का आंदोलन कमजोर नहीं पड़ता। उलटे, इससे यह साबित होता है कि राजनीतिक दल जनता की जरूरतों को अपने कार्यक्रमों से ऊपर रख सकते हैं। लोकतंत्र में नेता की परीक्षा केवल इस बात से नहीं होती कि वह कितनी बड़ी रैली करता है, बल्कि इससे भी होती है कि वह अपने फैसलों से आम नागरिकों पर पड़ने वाले असर को कितना समझता है। यदि जनता की परेशानी के सामने भी राजनीतिक जिद ही सर्वोपरि रहे, तो जवाबदेही के बड़े-बड़े दावों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
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One thought on “राहुल की जिद के आगे व्यापारी क्यों भुगतें राजनीतिक लड़ाई का खामियाजा”
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